Tuesday, October 17, 2017

आती है जिन वीर घरों से,आवाज़ें बस सिसकी की,
आज हमारी दीवाली है, कर्ज़दार उस हिचकी की,

छाती पर गोली खाने से,वह प्रहरी जो न सकुचाया,
सीमाओं की रक्षा में,जो पौरुष ज़िंदा लौट न पाया;
हमने हर बीती दीवाली, रौशन रक्खा अपना धाम,
चलो जलाएँ अब की बार,एक दिया उनके भी नाम।

Friday, October 6, 2017

वो रातों का बिछड़ा ख़्वाब,
दिन की धूप में नहीं दिखता,
अरसा हो गया उसको पढ़े लेकिन,
शायद वो अब कुछ नया नहीं लिखता;
यूँ तो सोचने की प्रक्रिया ज़ारी है,
पर वास्तविकता कल्पना पर भारी है;

चाहे जो हो, भला उम्मीद कब हारी है,
अब भी जीवन उम्मीदों  का आभारी है;
कुछ पुराने ख्वाबों का नन्हा चाँद,

जब दिनों में पलेगा,
जाड़े में नंगे पाँव फर्श पर चलना,
तब फिर अच्छा लगेगा।

Thursday, September 14, 2017

कभी सोचा था की एक दिन जब दर्द नहीं रहेगा तब फिर अठखेलियाँ होंगी जीवन में ; फिर किक लगाएंगे फुटबॉल को या कलाकारियाँ करेंगे बास्केटबॉल से। फिर महसूस करेंगे हांफती साँसों के बीच रिसते खारे पानी को ; फिर सो सकेंगे थकान की लोरियों में ; फिर कूद कर फांद सकेंगे इन सीढ़ियों को या लांघ सकेंगे एक छलांग में इन ड्योढ़ियों को। फिर उन वादियों में जाएंगे और फिर. . . . . . . . . . अच्छे दिन आएंगे।
पर ये उन दिनों के स्लिप डिस्क का दर्द है जो जाते जाते भी कभी नहीं गया।

Friday, April 7, 2017

ब्रांडेड कपड़े , ब्रांडेड जूते,
ब्रांडेड घड़ी, चश्मा ब्रांडेड,
मोबाइल ब्रांडेड, बटुआ ब्रांडेड,
चड्ढी बनियान भी ब्रांडेड,
जो दिखता है सब ब्रांडेड,
जो नहीं वह भी ब्रांडेड,
जिस दिन कर लोगे खुद को ब्रांडेड,
लोग पहनने लगेंगे तुम्हे भी,
तब तक........
मेरी नज़र में तुम लोकल ही रहोगे।

Wednesday, January 11, 2017

कोशिशें कर लें जितनी पर रुकता नहीं,
वह पानी जो पलकों में अटक जाता है,
हमारी नींदों में गुज़रता है रोज़ राही कोई,
जो ख़्वाब न देखें तो रस्ता भटक जाता है;