Friday, October 6, 2017

वो रातों का बिछड़ा ख़्वाब,
दिन की धूप में नहीं दिखता,
अरसा हो गया उसको पढ़े लेकिन,
शायद वो अब कुछ नया नहीं लिखता;
यूँ तो सोचने की प्रक्रिया ज़ारी है,
पर वास्तविकता कल्पना पर भारी है;

चाहे जो हो, भला उम्मीद कब हारी है,
अब भी जीवन उम्मीदों  का आभारी है;
कुछ पुराने ख्वाबों का नन्हा चाँद,

जब दिनों में पलेगा,
जाड़े में नंगे पाँव फर्श पर चलना,
तब फिर अच्छा लगेगा।

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