Thursday, July 19, 2012

सुने सुनाये रास्तों का माप रह जाऊंगा,
आंच न दो इस तरह बस भाप रह जाऊंगा,
जब लिखोगे चेहरे इन चंद गुज़रे कहकहों में,
खूँटी की दीवार पर बस छाप रह जाऊंगा;

Monday, July 16, 2012

पलकों से निकलने का अब भ्रम नहीं होता,
यादों का ठहराव लेकिन कम नहीं होता,
ये जो गम बिखरा हुआ है, नयनों से ही छलका था,
बादलों का पानी इतना नम नहीं होता;

Wednesday, July 11, 2012

गीला मन

कपड़ों के साथ ही शायद,
धुल गया था गीला मन,
और सूखने के इंतज़ार में,
पल बीतते रहे,
पर बाहर डोरियों पर टंगे कपड़े,
बारिश में भीगते रहे,
फिर उन्हें उठाकर,
घर के अन्दर टांग दिया गया,
दरवाज़ों के ऊपर, सीढ़ियों की रेलिंग में,
फैला कर उन्हें बाँट दिया गया,
पंखे की हवा और उमस की शर्मिंदगी में,
वे दो दिन में सूख गए,
तह कर के अलमारियों में पहुंचे,
जैसे बाहरी दुनिया से रूठ गए,
धूप न मिलने से,
कमीज़ की जेब पर लगा पेन का निशान,
नीला ही रहा,
कपड़े तो सूख गए पर,
मन गीला ही रहा....

ऐसा क्यों कर होता है,
न समझता है, न रोता है,
न ज़ख्म रहता है न निशाँ,
फिर भी दर्द होता है,
पर ये दर्द खराब भी नहीं लगता,
ये किसी अधूरेपन की पहचान है,
यूँ तो हम हरदम सांस लेते हैं,
पर ये दर्द भी हमारी जान है,
इस दर्द पर उंगली नहीं रख पाते,
कहाँ हो रहा है, नहीं जान पाते,
दिखाते नहीं हैं पर तरसते हैं,
घिर आये बादलों को यूँ देखते हैं,
जैसे पानी नहीं, ये दर्द ही बरसते हैं...

ये दर्द कुछ भी हो सकता है,
कुछ मिलने की ख्वाहिश,
या खोने का ग़म हो सकता है,
तुम्हारा परिपूर्ण होना,
हमारा अधूरापन हो सकता है,
ये कुछ कमी को जताता है,
ठीक से नहीं जान पाते,
पर ये एक उम्मीद जगाता है,
उफनता है, उबलता है, तड़पता है,
यह मिश्रित दर्द,
इसी गीले मन में पनपता है,
यह बताता है,
कितना भी सूखे रहो, अन्दर नमी है,
और किसी कमी का न होना भी,
एक कमी है....

Tuesday, July 10, 2012

कल रात शुरू हुई फुहारें बंद नहीं हुईं / धरती का सीना तर हो गया है, पर ये हैं की अब नहीं रुकतीं / ये मौसम कितना कुछ याद दिला जाता है; सर पर स्कूल का बस्ता रख कर भागना, या फिर इन फुहारों के बीच फुटबाल खेलना, या दोस्तों के साथ यूँ ही सड़क पर टहलते हुए इनसे आलिंगन करना, या माँ के बनाये पकौड़ों और चाय में खुद को सेंकना, भीगना, सूखना और फिर भीगना / पर अब यह सब कुछ नहीं होता; बस यादें भीगती हैं / ये फुहारें अब भी बुलाती हैं, उसी तन्मयता से, उसी लगन से, उसी स्नेह से / पर अब क्या हो गया है; स्कूल के दिन कोसों पीछे छूट गए, फुटबाल टी वी पर आता है, दोस्त बहुत दूर दूर रह कर दोस्ती निभा रहे हैं, माँ साथ नहीं रहती, भीगने, सूखने और फिर भीगने का सुख बचकाना लगता है / हम बड़े हो गए हैं और हमारी खुशियों के मापदंड छोटे; आज कुछ मिनट खड़ा होकर इस गिरते जल को निहारता रहा और देखा उस पत्ते को जिसे मर कर भी सुख भोगना जिंदा रह रहे इंसान से बेहतर आता है  /

Saturday, July 7, 2012

आदमी अपनी पुरानी ठोकरों से सीखता है,
जो दिखा परिचित सा मंज़र, याद में फिर भीगता है,
पर ये आँखें डबडबा जाती हैं 'नीरज' खुद-ब-खुद,
जब कभी मुझको मेरा उजड़ा ठिकाना दीखता है;

Thursday, July 5, 2012

सुनता आया था मैं अपने बचपन से,
बिना चाहत हम कुछ नहीं पाते हैं;

पर इन चाहतों की हद्द कौन तय करे,
ये उड़ते परिंदे हैं, बस में कहाँ आते हैं;

रास्ते अनेक पर जिंदगी मिली एक हमें,
खोने पाने की कश्मकश में पछताते हैं;

लेकिन अनुभवी समाज के ये बाशिंदे,
सदा सीधा ही चलने में सुख बताते हैं;

अंत तक रहेगा ये सवाल हरदम 'नीरज',
ये अनचले टेढ़े मेढ़े रास्ते किधर जाते हैं;

Wednesday, July 4, 2012


काफ़ी इंतज़ार के बाद रात की हुई भारी बारिश एक भीगी सुबह लेकर आई है / कालोनी के अन्दर की सड़क पर पानी अब भी जमा हुआ है और इस पर चलते हुए चप्पलों की छपाक छपाक की आवाज़ चिर परिचित लगती है / पेड़ पौधों के रंग बदले हुए हैं; हलकी हवा में गमलों में लगे पौधे कुछ गर्व से हिलते हैं , उसी तरह जैसे गाँव का लड़का नौकरी मिलने के बाद अकड़ कर चलता है / सड़क उस पार से काफ़ी मिटटी पानी के साथ बहकर इस ओर चली आई है कीचड़ की शक्ल में / लोग नाप तोल कर कदम रखते हैं और कीचड़ से बचकर उस ओर पहुँचते हैं जहाँ सुबह दूध की थैलियाँ बिकती हैं; सड़क पर पैदल चलने वाले लोग सामने से आती गाड़ी देख अपनी रफ़्तार तेज़ और धीमी कर लेते हैं; ताकि गाड़ियों के द्वारा सड़क से उछले पानी से उनका मिलाप बच सके / सब कुछ वैसा ही है जैसा कल था / सात आठ महीने के अंतराल के बाद बारिश हुई और पहले ही दिन सब कुछ कितना जान पहचाना सा लगता है / जैसे ये तो रोज़ की बात है; हम इन जानी पहचानी स्थितियों को कितनी आसानी से जी लते हैं / ये जितना सरल है उतना ही आश्चर्यजनक भी है / समय की दूरी भी हमारे मौसम को एक दिन के लिए भी हमसे अलग नहीं कर पाती / पर क्या इंसानी रिश्तों पर भी ये बात लागू होती है ? ये सरल भी है और आश्चर्यजनक भी /

Tuesday, July 3, 2012

बहुत सा दम निकलता है नियति जब ग्रास लेती है,
ज़रा सुस्ताना पड़ता है, छीन जो आस लेती है,
अभी बोझिल से लगते हैं मगर फिर फड़फड़ाएंगे ,
 मेरी आशा है जो डाली पर बैठी सांस लेती है,
बागों में लगाया अपना पेड़,
कैसे जान पाऊंगा,
उन हथेलियों पर सुर्ख लहू,
कैसे पहचान पाउँगा,
कुछ रहे या बिखरे 'नीरज',
अब लौट कर नहीं जाऊंगा !
सूख कर पलकों पे ये नींदों से नागा करते हैं,
कंटीले रास्ते हैं, हम जहाँ पर रोज़ भागा करते हैं,
कि रखना हौसला नीरज छलकते इन अंधेरों में,
दिवस के कुछ सपन रातों में जागा करते हैं ;