Wednesday, July 4, 2012


काफ़ी इंतज़ार के बाद रात की हुई भारी बारिश एक भीगी सुबह लेकर आई है / कालोनी के अन्दर की सड़क पर पानी अब भी जमा हुआ है और इस पर चलते हुए चप्पलों की छपाक छपाक की आवाज़ चिर परिचित लगती है / पेड़ पौधों के रंग बदले हुए हैं; हलकी हवा में गमलों में लगे पौधे कुछ गर्व से हिलते हैं , उसी तरह जैसे गाँव का लड़का नौकरी मिलने के बाद अकड़ कर चलता है / सड़क उस पार से काफ़ी मिटटी पानी के साथ बहकर इस ओर चली आई है कीचड़ की शक्ल में / लोग नाप तोल कर कदम रखते हैं और कीचड़ से बचकर उस ओर पहुँचते हैं जहाँ सुबह दूध की थैलियाँ बिकती हैं; सड़क पर पैदल चलने वाले लोग सामने से आती गाड़ी देख अपनी रफ़्तार तेज़ और धीमी कर लेते हैं; ताकि गाड़ियों के द्वारा सड़क से उछले पानी से उनका मिलाप बच सके / सब कुछ वैसा ही है जैसा कल था / सात आठ महीने के अंतराल के बाद बारिश हुई और पहले ही दिन सब कुछ कितना जान पहचाना सा लगता है / जैसे ये तो रोज़ की बात है; हम इन जानी पहचानी स्थितियों को कितनी आसानी से जी लते हैं / ये जितना सरल है उतना ही आश्चर्यजनक भी है / समय की दूरी भी हमारे मौसम को एक दिन के लिए भी हमसे अलग नहीं कर पाती / पर क्या इंसानी रिश्तों पर भी ये बात लागू होती है ? ये सरल भी है और आश्चर्यजनक भी /

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