सुनता आया था मैं अपने बचपन से,
बिना चाहत हम कुछ नहीं पाते हैं;
पर इन चाहतों की हद्द कौन तय करे,
ये उड़ते परिंदे हैं, बस में कहाँ आते हैं;
रास्ते अनेक पर जिंदगी मिली एक हमें,
खोने पाने की कश्मकश में पछताते हैं;
लेकिन अनुभवी समाज के ये बाशिंदे,
सदा सीधा ही चलने में सुख बताते हैं;
अंत तक रहेगा ये सवाल हरदम 'नीरज',
ये अनचले टेढ़े मेढ़े रास्ते किधर जाते हैं;
बिना चाहत हम कुछ नहीं पाते हैं;
पर इन चाहतों की हद्द कौन तय करे,
ये उड़ते परिंदे हैं, बस में कहाँ आते हैं;
रास्ते अनेक पर जिंदगी मिली एक हमें,
खोने पाने की कश्मकश में पछताते हैं;
लेकिन अनुभवी समाज के ये बाशिंदे,
सदा सीधा ही चलने में सुख बताते हैं;
अंत तक रहेगा ये सवाल हरदम 'नीरज',
ये अनचले टेढ़े मेढ़े रास्ते किधर जाते हैं;
No comments:
Post a Comment