Tuesday, July 10, 2012

कल रात शुरू हुई फुहारें बंद नहीं हुईं / धरती का सीना तर हो गया है, पर ये हैं की अब नहीं रुकतीं / ये मौसम कितना कुछ याद दिला जाता है; सर पर स्कूल का बस्ता रख कर भागना, या फिर इन फुहारों के बीच फुटबाल खेलना, या दोस्तों के साथ यूँ ही सड़क पर टहलते हुए इनसे आलिंगन करना, या माँ के बनाये पकौड़ों और चाय में खुद को सेंकना, भीगना, सूखना और फिर भीगना / पर अब यह सब कुछ नहीं होता; बस यादें भीगती हैं / ये फुहारें अब भी बुलाती हैं, उसी तन्मयता से, उसी लगन से, उसी स्नेह से / पर अब क्या हो गया है; स्कूल के दिन कोसों पीछे छूट गए, फुटबाल टी वी पर आता है, दोस्त बहुत दूर दूर रह कर दोस्ती निभा रहे हैं, माँ साथ नहीं रहती, भीगने, सूखने और फिर भीगने का सुख बचकाना लगता है / हम बड़े हो गए हैं और हमारी खुशियों के मापदंड छोटे; आज कुछ मिनट खड़ा होकर इस गिरते जल को निहारता रहा और देखा उस पत्ते को जिसे मर कर भी सुख भोगना जिंदा रह रहे इंसान से बेहतर आता है  /

No comments:

Post a Comment