Wednesday, July 11, 2012

गीला मन

कपड़ों के साथ ही शायद,
धुल गया था गीला मन,
और सूखने के इंतज़ार में,
पल बीतते रहे,
पर बाहर डोरियों पर टंगे कपड़े,
बारिश में भीगते रहे,
फिर उन्हें उठाकर,
घर के अन्दर टांग दिया गया,
दरवाज़ों के ऊपर, सीढ़ियों की रेलिंग में,
फैला कर उन्हें बाँट दिया गया,
पंखे की हवा और उमस की शर्मिंदगी में,
वे दो दिन में सूख गए,
तह कर के अलमारियों में पहुंचे,
जैसे बाहरी दुनिया से रूठ गए,
धूप न मिलने से,
कमीज़ की जेब पर लगा पेन का निशान,
नीला ही रहा,
कपड़े तो सूख गए पर,
मन गीला ही रहा....

ऐसा क्यों कर होता है,
न समझता है, न रोता है,
न ज़ख्म रहता है न निशाँ,
फिर भी दर्द होता है,
पर ये दर्द खराब भी नहीं लगता,
ये किसी अधूरेपन की पहचान है,
यूँ तो हम हरदम सांस लेते हैं,
पर ये दर्द भी हमारी जान है,
इस दर्द पर उंगली नहीं रख पाते,
कहाँ हो रहा है, नहीं जान पाते,
दिखाते नहीं हैं पर तरसते हैं,
घिर आये बादलों को यूँ देखते हैं,
जैसे पानी नहीं, ये दर्द ही बरसते हैं...

ये दर्द कुछ भी हो सकता है,
कुछ मिलने की ख्वाहिश,
या खोने का ग़म हो सकता है,
तुम्हारा परिपूर्ण होना,
हमारा अधूरापन हो सकता है,
ये कुछ कमी को जताता है,
ठीक से नहीं जान पाते,
पर ये एक उम्मीद जगाता है,
उफनता है, उबलता है, तड़पता है,
यह मिश्रित दर्द,
इसी गीले मन में पनपता है,
यह बताता है,
कितना भी सूखे रहो, अन्दर नमी है,
और किसी कमी का न होना भी,
एक कमी है....

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