Monday, June 29, 2015

वो बागों में छिपी किलकारियां अब याद आती हैं,
वो पीतल की बड़ी पिचकारियाँ अब याद आती हैं,
जहाँ हम थे कदम रखते, जहां सारा हमारा था,
मगर दिल की जो थीं लाचारियाँ अब याद आती हैं,

Monday, June 15, 2015

पूजते हैं हम जिसे हर पर्व में, नवरात में,
क्यूँ वो ऐसे कोसती है तिमिर को, सुनसान को;

सीट पर बेफिक्र बैठे देखते ही रह गए,
भीड़ में जो पिस रही थी उस सिसकती जान को;

शोर सब करते रहे बस इक अदद कानून का,
पर किसी ने क्यूँ न देखा लाज के आह्वान को;
दोष देते ही रहे हम सोच को, माहौल को,
क्या कभी देखा है हमने अपने ही हैवान को;​

ये कहाँ हम आ गए हैं, भूख की इस दौड़ में,
खोजना पड़ता है देखो इक अदद इंसान को;

--
​नीरज त्रिपाठी ​

Friday, June 5, 2015

जब स्याह लगे दुनिया सारी,
बीते सदमों की डाह रहे,
जब लगे तिमिर की है बारी,
औ भीतर बस इक आह रहे;

तब रखना सिहरन हाथों में,
औ रखना थिरकन साँसों में,
बेशक अंधियारा बढ़े चले,
पर रखना जुगनू आँखों में,

तब आशाओं की धरती पर,
ठहरा सा नीर भी चमकेगा,
तब स्याह में भी किरणें होंगी,
​तब चाँद ज़मीं पर उतरेगा;​

Thursday, June 4, 2015

तुम भूले बिसरे गीत सही


गुज़रे पहाड़ में वादी सी,
इस जटिल समय में सादी सी,
स्वपनों के मीठे आँगन में,
यादों की तुम आबादी सी,
तुम इतने अधिक ज़रूरी हो,
ज्यों किसान को जोत बही,
तुम भूले बिसरे गीत सही;
बोध अबोध अकिंचन सी,
माथे पर ठहरी चिंतन सी,
मूरत दधीच के अर्पण सी,
प्रतिबिम्ब ज्ञान के दर्पण सी,
तुम अब भी व्याख्या चाहत की,
जब कोई चाहत रही नहीं ,
​तुम भूले बिसरे गीत सही;​

अनवरत प्रेम की पाती सी,
तुम सांयकाल की बाती सी,
सावन में महके गांवों की,
तुम जोगन वही बिसाती सी,
तुम ही उस बात के साखी हो,
जो हमने अब तक कही नहीं,
तुम भूले बिसरे गीत सही;

Saturday, January 17, 2015

बहुत करीब से देखा था तुम्हें, जब तुम जा रहे थे।
मेरे अंदर जो डर कुछ दिनों से धुएँ सा दुबका था, उसे हवा दे दी तुमने।
एक तना  …… पीड़ा और उम्मीद से लड़ता,
टहनी बन जाता है,
कितनी ही सोच, इच्छा, जिज्ञासा,
कितना कुछ……………  अधूरा,
फिर ख़ामोशी  .... शान्ति।
​तुम यहाँ थे भी और नहीं भी।
विजयदशमी  .... और तुम्हारा जाना,
अब महसूस होता है,
कोई साज़िश नहीं  .............  सच था।