वो बागों में छिपी किलकारियां अब याद आती हैं,
वो पीतल की बड़ी पिचकारियाँ अब याद आती हैं,
जहाँ हम थे कदम रखते, जहां सारा हमारा था,
मगर दिल की जो थीं लाचारियाँ अब याद आती हैं,
वो पीतल की बड़ी पिचकारियाँ अब याद आती हैं,
जहाँ हम थे कदम रखते, जहां सारा हमारा था,
मगर दिल की जो थीं लाचारियाँ अब याद आती हैं,
No comments:
Post a Comment