Monday, June 15, 2015

पूजते हैं हम जिसे हर पर्व में, नवरात में,
क्यूँ वो ऐसे कोसती है तिमिर को, सुनसान को;

सीट पर बेफिक्र बैठे देखते ही रह गए,
भीड़ में जो पिस रही थी उस सिसकती जान को;

शोर सब करते रहे बस इक अदद कानून का,
पर किसी ने क्यूँ न देखा लाज के आह्वान को;
दोष देते ही रहे हम सोच को, माहौल को,
क्या कभी देखा है हमने अपने ही हैवान को;​

ये कहाँ हम आ गए हैं, भूख की इस दौड़ में,
खोजना पड़ता है देखो इक अदद इंसान को;

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​नीरज त्रिपाठी ​

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