Tuesday, September 29, 2020

भेद किंचित भी नहीं था जब नियति ने था गढ़ा,
पर सुप्त थीं सब कोशिकायें था नशा कुछ यूँ चढ़ा,
इन विसंगतियों के नाते में नहीं कुछ सूझता था,
आँख भी तब ही खुली जब सूर्य पश्चिम को बढ़ा ;

किन्तु जीवन ध्येय है कुछ सृजन का, संज्ञान का,
कर सको यदि दूर शंका स्वयं के प्रज्ञान का,
सत्य है, समुचित नहीं है मन भ्रमण, पर याद हो,
आज जो विस्तृत नहीं वह है विषय विज्ञान का,

मौन यद्यपि रहे विचलित धैर्य लेकिन बोलता है,
संकुचित मन की गिरह को धैर्य ही फिर खोलता है,
आज लघु कल दीर्घ होगा, कुछ भी आकस्मिक नहीं है,
पूर्व भी जगने से पहले रात्रि का मन डोलता है;



 

Monday, September 28, 2020

हर मलाल में भी रखा, और हर मलाल से अलग भी,
हर ख्याल में भी रखा, और हर ख्याल से अलग भी;

सज़ा न होकर भी हो, इसलिए ऐ ज़िंदगी तूने,
हर फसाद में भी रखा, और हर फसाद से अलग भी;

न सुलझाना पड़े अकेले ही, इसलिए तुमने,
हर सवाल में भी रखा, और हर सवाल से अलग भी;

थी फ़िक्र पर लाना था ज़िक्र, इसलिए,
हर जवाब में भी रखा, और हर जवाब से अलग भी ;

न लगे इल्ज़ाम, फिर भी हों बदनाम, इसलिए,
हर हिसाब में  भी रखा, और हर हिसाब से अलग भी;

 

Tuesday, September 22, 2020

सूखे उपवन उजड़े वन को,
साँसों की उखड़ी धड़कन को,
बोझ लदे इस टूटे तन को,
चलो संवारें बिखरे मन को। ​

 

Thursday, September 17, 2020

धूप, छाँव, घन, घटा, बरसात हैं ढोते,
आ ही जाते हैं कभी भी जागते सोते,
पूछती है हर गिरह यूँ नमक से धुलकर,
क्यों नहीं जज़्बातों के अवकाश हैं होते;

 

कैद करके चंगुलों में,
एक दुनिया हम विचरते,
ऐब सारे कर इकट्ठे,
खुद पर थे कितना इतरते,
सोचते थे छोड़ देंगे,
राह जब अपनी मिलेगी,
जब हथेली पर हमारी,
सांझ मर्ज़ी से ढलेगी,
राह चलते थक गए, वह मोड़ न आया,
जब मिले हम स्वयं को तब छोड़ना आया;

सोचते बस हम हैं अव्वल,
लोग हैं पर हमसे कम हैं,
राह भी बस वो ही सच है,
रखते जिस पर हम कदम हैं,
व्योम में हम सैर करते,
पंख जैसे थे पगों में,
जुड़ न पाए हम किसी से,
था अहं जब तक रगों में,
इल्म था अब तक हमारा तोड़ न आया,
जब घटाया स्वयं को तब जोड़ना आया;

 

Tuesday, September 15, 2020

मान कितना पा गए हैं,
झूठ पर इतरा गए हैं,
लांघ कर अपनी विरासत,
ये कहाँ हम आ गए हैं;

वो जो मुख न खोलते हैं,
जो सभी कुछ तोलते हैं,
बोध है अपराध उनको,
वो जो कुछ न बोलते हैं;

आज रुतबे की दमक है,
पर ये मायावी चमक है,
क्यों निरुत्तर हो स्वयं से,
दिल में जो गहरी कसक है;

कुर्सियों की ये हवस है,
आज फिर भाषा विवश है,
भय ग्रसित हैं रात से सब,
क्या पता कब तक दिवस है;

 

Thursday, September 3, 2020

वो बातें,
जो हमने कभी कही नहीं,
पर सुनते रहे जिन्हें,
आँखों से,
वो बातें,
जो घुली रहती हैं,
उन हवाओं में,
जो साक्षी हैं उस रास्ते के,
जिसे हम साथ चलते थे,
वो बातें,
जिन्हे वक़्त लगता है,
न कहने के लिए,
जो एक समझ के बाद आती हैं,
वो बातें अक्सर याद आती हैं,

​आज बस वो बातें हैं,​
और है उनका अनमनापन,
जिनके न कहने में,
था एक अपनापन,
जिसमे महका हुआ था इकरार,
वो बातें,
जिन्हें आज तुम,
कर देते हो इंकार,

अब उन बातों में,
एक टीस सी लगती है,
जिसमें कभी थी छुवन,
एक चुभन सी लगती है,
जब की तुम रहे वही,
अब भी तुम ही सही,
हमारी ज़िंदगी,
एक ख़लिश ही रही,
तुम नहीं तो क्या,
तुम्हारी चुभन ही सही।