Thursday, September 17, 2020

धूप, छाँव, घन, घटा, बरसात हैं ढोते,
आ ही जाते हैं कभी भी जागते सोते,
पूछती है हर गिरह यूँ नमक से धुलकर,
क्यों नहीं जज़्बातों के अवकाश हैं होते;

 

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