मान कितना पा गए हैं,
झूठ पर इतरा गए हैं,
लांघ कर अपनी विरासत,
ये कहाँ हम आ गए हैं;
वो जो मुख न खोलते हैं,
जो सभी कुछ तोलते हैं,
बोध है अपराध उनको,
वो जो कुछ न बोलते हैं;
आज रुतबे की दमक है,
पर ये मायावी चमक है,
क्यों निरुत्तर हो स्वयं से,
दिल में जो गहरी कसक है;
कुर्सियों की ये हवस है,
आज फिर भाषा विवश है,
भय ग्रसित हैं रात से सब,
क्या पता कब तक दिवस है;
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