वो बातें,
जो हमने कभी कही नहीं,
पर सुनते रहे जिन्हें,
आँखों से,
वो बातें,
जो घुली रहती हैं,
उन हवाओं में,
जो साक्षी हैं उस रास्ते के,
जिसे हम साथ चलते थे,
वो बातें,
जिन्हे वक़्त लगता है,
न कहने के लिए,
जो एक समझ के बाद आती हैं,
वो बातें अक्सर याद आती हैं,
आज बस वो बातें हैं,
और है उनका अनमनापन,
जिनके न कहने में,
था एक अपनापन,
जिसमे महका हुआ था इकरार,
वो बातें,
जिन्हें आज तुम,
कर देते हो इंकार,
अब उन बातों में,
एक टीस सी लगती है,
जिसमें कभी थी छुवन,
एक चुभन सी लगती है,
जब की तुम रहे वही,
अब भी तुम ही सही,
हमारी ज़िंदगी,
एक ख़लिश ही रही,
तुम नहीं तो क्या,
तुम्हारी चुभन ही सही।
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