Monday, September 16, 2013

विकल ह्रदय के मनोभाव में,
जिज्ञासा के इस प्रभाव में,
सफल जनों के हाव भाव में,
जीवन के मौलिक स्वभाव में,
चाहे मुझको शापित कर दो, 
पर मुझको स्थापित कर दो

Friday, September 13, 2013

इकट्ठा करके बिखरे ख्वाबों को, हमने टुकड़े थे यूँ सदा ढोये,
जैसे कोई जोत ले इन खेतों को, और फिर उम्र भर नहीं बोये;
कभी यूँ भी मेरी राहों में, कुछ अज़ीज़ मिले हैं 'नीरज'
जैसे कोई दीया बुझा तो दे, और फिर रात भर नहीं सोये;

Saturday, September 7, 2013

खोने का डर और न पाने की शंका जब अपना मुहं बा देती ई तो खुद की परछाईं भी सर ओढ़ कर निकलती है  …. भरोसा भी किया और फैसला भी  …. फिर उलझन क्यूँ
सरकते सरकते दिन का लिहाफ चारपाई के नीचे लटक आया  …. फिर रात की ठण्ड में दिलासा को ओढ़ा  …. सुबह फिर कभी वैसी नहीं आई
देर रात पड़ोस से कुछ चिल्लाने की आवाजें आयीं  … बालकनी में समय रुका रहा 
सुबह आठ बजे की खुली आँख नौ बजे तक बंद रही और सब दीखता रहा  ….
याद आया की आज तीज है और इतवार भी  ….  कुछ कपड़े बाल्टी में साँस रहे हैं
पानी की मोटर चलाई तो सन्नाटा हिला  …. सब कुछ करने को है और कुछ भी नहीं  …
एनादर सन्डे इज़ टीजिंग मी !

Wednesday, September 4, 2013

दूसरा कोई अब दौर न होगा ,
छिटकी रेतों पर गौर न होगा,
तलाशेंगे नए मुकाम 'नीरज'
पर तुझसा कोई और न होगा;