Friday, April 20, 2018

सोचा है तुमने कभी,
कि सरस्वती घाट पर यमुना की बयारें,
क्यूँ मद्धिम से कानों में कुछ कहती हैं;
कि उस कतार में उड़ते जुगनुओं की रौशनी,
क्यूँ देर रात तक दिल में जगती हैं;
कि क्यूँ जब तुम नहीं होती हो यहाँ,
तब भी गुज़रती है हर शाम वहीँ;
क्यूँ ये हवाएँ हैं एहसास दिलातीं,
कि फिर तुमने धीरे से कोई बात कही;

सोचा है तुमने कभी,
कि क्यूँ तुम्हारे केश उड़ते हैं मुझपर,
जैसे कोई मन ही मन शर्मिंदा है;
और क्यूँ तुम्हारे हाथों का स्पर्श,
मेरी हथेलियों पर हर वक़्त ज़िन्दा है;

कि क्यूँ फूली सरसों पर मंडराते भौंरे,
महज़ सौगात नहीं है फसलों की;
और गुलाब की पंखुड़ी पर ओस की बूँद,
क्यूँ याद दिलाती हैं अधरों की;
​सोचा है तुमने कभी,
कि क्यूँ अब खाली खाली कमरे,
लगते हैं फिर सजे भरे;
​और ये वृक्ष बीच पतझड़ भी,
लगते हैं क्यूँ हरे हरे;

कि क्यूँ अब फिर वीरान हृदय में,
साँसों सा कुछ चलता है,
क्यूँ तुमसे यूँ बातें करना,
मुझको अच्छा लगता है;

Thursday, April 5, 2018

क्या तुम्हें पता है,
कि अब भी, जब भी,
बादल घिर आते हैं,
मैं छत नहीं खोजता,
अपने पेड़ के नीचे रुक जाता हूँ ;
कि अब भी, जब भी,
भीग जाता हूँ,
तो सीधा रास्ता नहीं लेता,
लम्बे रास्ते से ही जाता हूँ ;

क्या तुम्हें पता है,
कि वो सूना सा खंडहर,
अब नहीं रहा,
अब वहां मॉल है,
और ढेरों गाड़ियाँ पार्क हैं,
पर फिर भी, अब भी,
जब मैं आँखें बंद करता हूँ ,
तो तुम्हारी फुसफुसाहट,
साफ़ सुनाई देती है;
क्या तुम्हें पता है,
हमारा रास्ता,
अब और चौड़ा हो गया है,
और अब किसी को,
कोई मतलब नहीं,
कि कौन किसके साथ,
अब इस रास्ते पर,
हाथ थामे चलता है;
पर तुम्हें कैसे पता होगा,
तुम अब बड़ी सरकारी अफसर हो,
और मैं इतना पढ़कर छोटा बाबू भी नहीं,
काश तुम भी पढाई में तेज़ होती,
काश तुम भी मेरी ही जात की होती,
काश तुम्हें सरकारी योजनाओं का,
पता न होता,
और काश हमारे देश में,
आरक्षण न होता,
तो अब भी,
मैं और तुम साथ होते।
neeraj tripathi