क्या तुम्हें पता है,
कि अब भी, जब भी,
बादल घिर आते हैं,
मैं छत नहीं खोजता,
अपने पेड़ के नीचे रुक जाता हूँ ;
कि अब भी, जब भी,
कि अब भी, जब भी,
भीग जाता हूँ,
तो सीधा रास्ता नहीं लेता,
लम्बे रास्ते से ही जाता हूँ ;
क्या तुम्हें पता है,
क्या तुम्हें पता है,
कि वो सूना सा खंडहर,
अब नहीं रहा,
अब वहां मॉल है,
और ढेरों गाड़ियाँ पार्क हैं,
पर फिर भी, अब भी,
जब मैं आँखें बंद करता हूँ ,
तो तुम्हारी फुसफुसाहट,
साफ़ सुनाई देती है;
क्या तुम्हें पता है,
हमारा रास्ता,
अब और चौड़ा हो गया है,
और अब किसी को,
कोई मतलब नहीं,
कि कौन किसके साथ,
अब इस रास्ते पर,
हाथ थामे चलता है;
पर तुम्हें कैसे पता होगा,
तुम अब बड़ी सरकारी अफसर हो,
और मैं इतना पढ़कर छोटा बाबू भी नहीं,
काश तुम भी पढाई में तेज़ होती,
काश तुम भी मेरी ही जात की होती,
काश तुम्हें सरकारी योजनाओं का,
पता न होता,
और काश हमारे देश में,
आरक्षण न होता,
तो अब भी,
मैं और तुम साथ होते।
neeraj tripathi
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