सोचा है तुमने कभी,
कि सरस्वती घाट पर यमुना की बयारें,
क्यूँ मद्धिम से कानों में कुछ कहती हैं;
कि उस कतार में उड़ते जुगनुओं की रौशनी,
क्यूँ देर रात तक दिल में जगती हैं;
कि क्यूँ जब तुम नहीं होती हो यहाँ,
तब भी गुज़रती है हर शाम वहीँ;
क्यूँ ये हवाएँ हैं एहसास दिलातीं,
कि फिर तुमने धीरे से कोई बात कही;
सोचा है तुमने कभी,
कि क्यूँ तुम्हारे केश उड़ते हैं मुझपर,
जैसे कोई मन ही मन शर्मिंदा है;
और क्यूँ तुम्हारे हाथों का स्पर्श,
मेरी हथेलियों पर हर वक़्त ज़िन्दा है;कि क्यूँ फूली सरसों पर मंडराते भौंरे,
महज़ सौगात नहीं है फसलों की;
और गुलाब की पंखुड़ी पर ओस की बूँद,
क्यूँ याद दिलाती हैं अधरों की;
सोचा है तुमने कभी,
कि क्यूँ अब खाली खाली कमरे,
लगते हैं फिर सजे भरे;
और ये वृक्ष बीच पतझड़ भी,
लगते हैं क्यूँ हरे हरे;
कि क्यूँ अब फिर वीरान हृदय में,
साँसों सा कुछ चलता है,
क्यूँ तुमसे यूँ बातें करना,
मुझको अच्छा लगता है;
No comments:
Post a Comment