Thursday, May 31, 2012

Inspired by a poem of Lisel Mueller

जब पूछा जाता है,
क्यों लिखते हो, कैसे शुरू किया;
तब मैं उपेक्षित स्मृति की बात करता हूँ,
उदासीनता में जो ज़रा अधूरी रह गयी,
उस अनोखी प्रकृति की बात करता हूँ;

बिछड़ने के तुरंत बाद के दिन,
गर्मियों का आगमन था,
सब कुछ खिला खिला था,
क्या था जो नहीं मिला था;

भूरे पत्थर की  बेंच जहाँ बैठा था मैं,
उस प्यार से रोपे बागीचे में,
एक दिवस के लिए वह फूली कुमुदिनी,
मौन और बहरी सी थी,
जैसे नींद में बहरा हो जाता कोई,
मदिरामय मदमस्त शराबी;
और गुलाब अपने ही अन्दर,
वापस मुड़ते दीखते थे,
कुछ काला न था, कुछ टूटा न था,
न कोई चेहरा, न कोई पत्ता,
धूप असीमित पड़ती थी उन अवकाशों में;

उस भूरे पत्थर की बेंच पर बैठा मैं,
उत्सुक, अधीर,
गुलाबी, उजले रंगों में भोले से चेहरे,
मुझमे थे रह रह कर उतरते,
तब मैंने भाषा का था मुहं खोला,
और उसमें उड़ेल कर वेदना सारी,
यह माना था,
क़ि नहीं शोक में रहूँ अकेला जीवन भर मैं,
साथ यह मेरी भाषा होगी अब हरदम !!

Tuesday, May 29, 2012

कुछ वक़्त कहीं और बिताऊं

अब रात का मन रात में नहीं लगता,
दिन भी मेरे साथ साथ नहीं जगता;
रोज़ कैसे मन के अपने भाव हारूँ,
कुछ नया मिले एक मन फिर संवारूँ;
मूक दिखती चिड़ियों के संग फिर बोलूं,
जो चिपके हैं अधर से वो लिफ़ाफ़े खोलूं ;
कुछ अपना हार कर कुछ उन्हें  जिताऊं,
ऊब गया हूँ, कुछ वक़्त कहीं और बिताऊं;

Monday, May 28, 2012

ये गर्मियों की शाम जैसे कहीं और होकर यहाँ आती है; एक अनबुझी सी प्यास लेकर, अनकही सी बात लेकर, अनजानी सी सौगात लेकर,  अनसुलझे से जज़्बात लेकर / कुछ कहते कहते जैसे रुक जाती है; कुछ देते देते जैसे थम जाती है; कुछ पास आते आते जैसे अचानक खो जाती है / ये सकुचाई सी शाम रोज़ कुछ पूरा करना चाहती है किन्तु रोज़ कुछ अधूरी ही रह जाती है / कुछ है जो इसे पूरा नहीं होने देता; एहसास, वनवास, संकोच, हया, भय, लज्जा....कुछ तो है जो इसके अधूरेपन को अधूरा ही रखता है / गुज़रती, थकी हुई धूप के अवशेष शनै शनै शीतल होती पवन को रास्ता देते हैं; दिन भर तपन की गोद में बैठी धरती को छाया का आँचल मिलता है; दूर जाता रवि मुस्कुराता हुआ सोते हुए शशि को जगाता जाता है / दोनों हाथ फैलाकर भी इस शाम को समेट पाना मुश्किल है, पर कुछ तो है जो इसकी मुट्ठियों में बंद है, जिसे ये खोलना चाहती है, कुछ लेकर आई है जिसे देना चाहती है; ये हथेलियाँ इसे रोपना चाहती हैं पर वह मुट्ठी खुलते खुलते रह जाती है / ये गर्मियों की शाम जैसे कहीं और होकर यहाँ आती है /

Tuesday, May 22, 2012

फिर वही !!

आज का दिन थका हुआ निकला था; जैसे बीते हुए कल का बोझ लेकर चल रहा हो /  कुछ समय तक मुझे ऐसा आभास होता रहा, परन्तु यह मेरा भ्रम मात्र था / हल्के तैरते बादल जो अचानक कहीं से आ गए थे, अचानक ही कहीं चले गए / आठ बजते तक उमस और गर्मी ने शरीर को चिपचिपा बना दिया / ऑफिस पहुँचते पहुँचते पीठ गीली हो चुकी थी, जैसे होली में कोई पीछे से आपके ऊपर अपनी पिचकारी खाली कर देता है / और ये सब भी तब जब मैं अपनी पांच महीने पुरानी लोन लेकर खरीदी नई कार के एयर कंडिशनर को तकलीफ पहुंचाता रहा था / सीट से चिपकी पीठ पर उसका असर न के बराबर था / आज रास्ते भर मैं यह सोचता रहा की रोज़ कैसे एक नया दिन आ जाता है, बिल्कुल पुराने दिन की तरह / कुछ भी तो अलग नहीं था; हाँ ! स्टीरिओ में एक परिचित गाना बज रहा था " करोगे याद तो हर बात याद आएगी, गुज़रते वक़्त की हर मौज़ ठहर जायेगी " ; 'बाज़ार' फिल्म में भूपेंद्र का स्वरबद्ध किया यह मेरे पसंदीदा गीतों में है / ये पुरानी बात करता है पर प्रत्येक बार मैं इसे एक नए अंदाज़ में सुनता हूँ / एक नए दिन की तरह जिसमे तारीख तो बदल जाती है पर एहसास नहीं बदलते / क्या मैं आगे नहीं देखता, क्या मैं अब भी बीते हुए कल में ही जीता हूँ; ऐसा क्या है मेरे इतिहास में जो मुझे बार बार वापिस ले जाता है; कुछ भी तो नहीं; कुछ भी विशेष या अप्रत्याशित नहीं; फिर क्यों ! क्या कुछ खोने का डर मेरे कुछ पाने की लालसा पर भारी है ; पर खोने को ऐसा क्या है / फिर वही रोज़ के ख़याल, फिर वही रोज़ की सोच, फिर वही रोज़ की बातें; वही दफ्तर, वही कुर्सी मेज़, वही कर्मचारी, वही चाय की प्याली, वही कागजों का पुलिंदा, वही कंप्यूटर की पुरानी साजिशें, वही बॉस की अनकही फरमाइशें, वही मैं और वही मेरी संकुचित दुनिया / बीती रात सोचा था; कल एक नया दिन है; नया दिन आया, पुराने अंदाज़ में; ये मेरी सोच की कमी है या स्वभाव की !!

ई मेल और फेसबुक गतिविधियों से भरे पड़े हैं; कितनी ही नई कवितायेँ, तस्वीरें, सन्देश ! कितने ही सन्देश कहते हैं," ये मेरी अपनी लाइफ है, मैं इसे अपने ढंग से जीऊंगा; किसी को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं, मुझे एक बार ही जीना है इसलिए मेरी मर्ज़ी सर्वोपरि है" / या फिर उन लोगों के उदाहरण हैं जिन्होंने ने जो करना चाहा वो किया, प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद; जो अपने ढंग से जिए, अपने सपनों को साकार करने के लिए, जो साधारण इंसान थे परन्तु असाधारण कार्य कर बैठे / यह सब पढ़ना मुझे अच्छा लगता है; बस एक ही बात दिल को कचोटती है, कि उन लाखों लोगों का क्या जो इसी चाहत में सब कुछ गवां बैठे; जिन्हें आज कोई नहीं जानता, जिनका ज़िक्र कहीं नहीं होता; जो अपने पीछे रोते बिलखते परिवार छोड़ गए; आकाश की चाहत में धरा ही छोड़ गए / उनकी भी तो एक ही लाइफ थी, उन्हें भी सफलता और जीवन से प्रेम रहा होगा, उन्होंने भी मशक्कत की होगी / ये सब मुझे कन्फ्यूज़ करता है; चेतावनी देता है कि सपनों को पाने के लिए कोई अलग दुनिया नहीं है; हकीकत यहीं है और इसी में से गुज़रना है; अपनी गणित ठीक कर लो, कितना और पा सकते हो; कितना खोना पड़ेगा, प्राफिट होगा या लोस ; क्या अंजाम झेलने की भी क्षमता है या ये तय है कि जो चाहते हो वो मिल जाए तो बाकी सब स्वयं ठीक ही रहेगा /

ये शायद मेरी समस्या ही नहीं अपितु उन सब की भी है जो मस्तिष्क, ह्रदय और भावनाओं के बुने जालों में रहते हैं / जो सोच रखते हैं और समझ तो सकते हैं पर सपने अपनी सोच और समझ से ऊपर देखना पसंद करते हैं / जो कुछ और करना तो चाहते हैं पर ठीक से नहीं जानते कि क्या; जो समाज में रहते भी हैं और अलग भी हैं; जिन्हें लोग स्वीकार करते हैं पर वे खुद को स्वीकृत नहीं समझते / यह जटिल है / समाजिकता और इच्छाओं के दाँव पेंच में इनकी पतंग न ही ऊपर जा पाती है और न ही नीचे आती है / बस उड़ती रहती है, अनमनी सी, पवन के वेग में, कभी तेज़ कभी धीमी / ये साहस का अभाव नहीं है; जिम्मेदारियों का आभास है जो उन्हें यह रिस्क लेने से रोकता है / हर नया दिन पुराने दिनों कि तरह एक और नए दिन का इंतज़ार करता है /

Monday, May 21, 2012

कुछ खोना नहीं चाहती है,
कुछ पाना नहीं चाहती है,
अवकाश के बाद आई,
मई की ये दोपहर,
देख मेरा खारापन,
बस गुज़र जाना चाहती है;
ठहरे हुए पत्थरों पर,
लगातार पड़ती ऊष्मा,
इन पर कुछ ज्यादती है,
ये पत्थर हिल नहीं पाते,
मूक रहते हैं,
अविचल, संकोच रहित,
और सोख कर सारी गर्मी,
तपते रहते हैं,
किस्मत समझकर,
इंतज़ार है इन्हें,
बारिशों का,
मेरी तरह !!!

Monday, May 14, 2012

वक़्त के पांव

कहते हैं वक़्त के पांव नहीं होते; बिना आहट आता है और चला जाता है / आने और जाने के बीच उसमें ठहराव होता है, छोटा या बड़ा ठहराव; जो इस पर निर्भर करता है की वक़्त साथ में वेदना लाया है या सुख / जो भी हो; कम या ज्यादा, पर आया वक़्त गुज़र ही जाता है / यह सब कितना सरल लगता है, खासकर तब जब हमें किसी को उसके बुरे समय में दिलासा देनी होती है, या जब किसी के अच्छे समय को देखकर खुद को दिलासा देनी होती है / परन्तु क्या कभी गौर किया है कि कहीं कहीं, कुछ जगहों पर, कुछ लोगों के लिए यह ठहराव कितना लम्बा होता है; जब वक़्त केवल एक बार आता है और साँसों के साथ ही जाता है / जब जीवन ठहराव में ही बीत जाता है; जब कुछ भी वक़्त का मोहताज़ नहीं होता; जब आहटों के मायने नहीं होते; जब कोई शक्ल तो होती है, पर आइने नहीं होते / यह सब मुझे उन दो घंटों के बीच महसूस हुआ जब मैं उससे मिला / ये कोई हादसा नहीं था, कोई घटना या दुर्घटना नहीं, कोई जीत या हार भी नहीं, बस एक छोटा सा लम्हा था जो मेरे लिए तो भाग रहा था, पर उसके लिए बिलकुल थमा हुआ था / मैं इसे कहीं भी, कभी भी दोहरा सकता हूँ क्योंकि ये मेरे अन्दर आज भी बिलकुल ताज़ा है; पर वक़्त कि नज़रों से देखें तो ये कुछ तेईस साल पहले कि बात है /

मैं बंगलूर से बेलगाँव जा रहा था, अपनी बास्केटबाल टीम के अन्य खिलाडियों के साथ ; आज बेशक मुझमें वह अवशेष न नज़र आयें पर उस समय मैं देश के चुनिन्दा युवा प्रतिभावान खिलाडियों में से एक था / अपने इस शौक को मैंने कई वर्षों तक जीवित रखा; आज भी इन शारीरिक और सामाजिक विफलताओं के बावजूद, यदि खेलने का मौका मिलता है तो मन में कहीं कोने में टांग सिकोड़े बैठा वह खेल का कीड़ा कुलबुलाने लगता है / पर ये मेरी बात है और यहाँ यह केवल वजह मात्र है जिसके कारण रात के ग्यारह बजे मैं उस छोटे से स्टेशन पर बैठा दूसरी गाड़ी का इंतज़ार कर रहा था / इस स्टेशन का नाम मिराज़ था और बंगलूर से यहाँ आने के बाद हमें गाड़ी बदलनी थी जो रात में एक बजे हमें मिलती / बाकी साथियों ने मुझे सामान के पास बैठाया और सब घूमने निकल गए / मैं अपनी टीम में उम्र में सब से छोटा था, कुछ उन्नीस बरस का, और यूँ कहने को तो मैं लगभग छः फीट का था पर इस बास्केटबाल की टीम में मैं लम्बाई के लिहाज़ से भी सबसे छोटा था / यदि इस दानवीय टीम को मैं अपने गाँव ले जाता और इन्हें मात्र देखने के लिए टिकट लगाता तो शायद आज मैं भी दो बिस्वा ज़मीं खरीद ही लेता / परिवार में छोटों पर हम ज़िम्मेंदारियां नहीं डालते पर यहाँ मुझे आसानी से सारे सामान की हिफाज़त का ज़िम्मा थमा दिया गया था / उन्हें पता था की बड़ों का लिहाज़ और मेरी आगे खेलने की लालसा मेरी मज़बूरी है ; यह उत्पीड़न था,  जिसे हम अनायास ही छोटी छोटी बातों से शुरू कर देते हैं और बाद में जब उत्पीड़ित थक हार कर विद्रोह करता है तो असामाजिक तत्त्व या फिर बागी कहलाता है / आप सोचेंगे कि इतनी छोटी बात को इतना बड़ा तूल क्यों, पर यकीन मानिये, हजारों मील लम्बा सफ़र भी एक छोटे से कदम से ही शुरू होता है / वरना...घूमने की इच्छा तो मेरी भी थी /

ख़ैर ! मैंने अपने बैग से अर्थर हेली की किताब निकली और उसमें खो गया; उन दिनों मैं  अर्थर हेली और निर्मल वर्मा को खूब पढता था / इस स्टेशन से अधिक  गाड़ियाँ नहीं गुज़रती; प्लेटफार्म की निर्जनता और अजीब सी ख़ामोशी इसका सबूत थीं / मैं इस लोहे की बेंच पर बैठा था और मेरे आगे कुछ बैग और अटैची करीने से रखीं थी जिनकी अनचाही रखवाली का ज़िम्मा मुझ पर था / मेरे दायें हाथ पर वो किताबों की लकड़ी की दुकान थी जिसे कुछ ही देर पहले उस दुकानदार ने बड़ी तल्लीनता से लकड़ी के तख्ते लगा कर बंद किया था / एक ठेला भी उससे कुछ ही दूर पर अनमना सा आराम कर रहा था; पानी के नलों के बगल में, और उसके पास ही बेंच पर उसका मालिक सो रहा था, ठंडी पड़ी चाय और बासी होती पूरी और भाजी के बीच / बीच बीच में एक पुलिस वाला कहीं से आकर कहीं को चला जाता था, अपने हाथ में उलझे डंडे को घुमाता हुआ / बाएँ हाथ पर लोहे का मोटा खम्बा था, ऐसे कई खम्बों पर इस प्लेटफार्म की ऊँची लोहे की छत अटकी पड़ी थी; एक गाय भी थी जो पीछे सीढ़ियों के पास बैठी थी मानो ये जगह उसने पेटेंट कराया हो / कुछ सौ मीटर दूर जहाँ बाहर निकलने का द्वार था, वहां कुछ चहलकदमी अवश्य थी; मेरे सर पर एक पंखा था जो केवल इसलिए चल रहा था क्योंकि उसे चलाया गया था ; ठीक वैसे ही जैसे हम अमूमन नौकरी में अपनी फ़ाइलें निपटाते हैं / यदि मेरे बगल रखी पानी की वह बोतल नीचे न गिरती तो शायद वह नहीं जगता; पर उसे जागना था और वह जगा; और फिर मुझे वह आवाज़ सुनाई दी " कुछ खाई का दै देता भईया, भिनसार देख लेइत " /

वह मुझसे कुछ पांच मीटर की दूरी पर था, बिलकुल लोहे के मोटे खम्बे से सटा हुआ ; और मैं अब तक अपने को अकेला समझ रहा था / मैंने आश्चर्य से देखा; वह कुछ गठरी जैसा ही था, अंग्रेजी के जेड अक्षर की तरह, एक डंडा जो सिरहाने पड़ा था, कुछ कपड़ों की शक्ल में चीथड़े , हलकी सफ़ेद दाढ़ी जो शायद अब न बढ़ती थी न घटती थी, अन्दर धंसी हुई आँखें जिन्हें देखने का शौक न बचा था, डंडे के बगल रखा वह बड़ा सा खोरा (कटोरा) जो शायद जूठन की खान था; और वह कराहती पर बिलकुल साफ़ आवाज़, " कुछ खाई का दै देता भईया, भिनसार देख लेइत " / भिनसार हमारे यहाँ सुबह को कहते हैं; ये मेरे गाँव की बोली थी ; मेरे गाँव से कोसों दूर, इस अनजानी जगह पर , अनजानों के बीच, अनजानी रात में, अनजाने कान उस अनजानी बोली को साफ़ पहचान सकते थे / आश्चर्य था; मेरे इतने करीब एक जीवन था और इतनी देर तक मुझे इसका एहसास भी नहीं; इस निर्जन स्टेशन पर हमारे एहसासों का ये हाल है तो भीड़ में इन आवाजों का क्या अस्तित्व होगा ! अब मैं उसे देख सकता था पर शायद उसकी आँखें जवाब दे चुकी थीं; या शायद उन आँखों ने कभी रोशनी देखी ही न हो; पर वह तो भिनसार देखने की बात करता है /

उसे याद नहीं कि वह यहाँ कैसे पहुंचा, कब पहुंचा, कहाँ से पहुंचा, पहुँचाया गया या फिर यूँ ही पहुँच गया / कुछ बेटवा और पतोहू कि बात करता है पर इससे अधिक कुछ नहीं; बस कुछ खाने को मांगता है / मेरे पास खाने को कुछ नहीं है; मैं उसे बीस रुपये देना चाहता हूँ, ये मेरे लिए एक समय के भोजन की रकम थी उन दिनों पर वह नहीं लेता; कहता है " रुपिया न चाही बच्चा, कुछ खाई का दै देता , भिनसार देख लेइत" / यहाँ कुछ खाने को नहीं मिल रहा; स्टेशन के बाहर हो शायद, पर मैं नहीं जा सकता था; मैं इंतज़ार करने लगा, शायद एकाध साथी पहले आ जाए / मैं उससे खड़ी बोली में ही बात करता हूँ; क्यों ! मुझे पता नहीं; मैं उसे छूना नहीं चाहता, पर मैं उसे खाना देना चाहता हूँ, मैं उसके पास नहीं बैठना चाहता पर मैं उससे साहनुभूति भी रखता हूँ / ये असमंजस की स्थिति है; हमारी आज की दशा को उजागर करती हुई, हम आज भी सहानभूति तो रख सकते है, दूर से शायद कुछ कर भी सकते हैं, पर इनमे सम्मिलित नहीं होना चाहते, इन्वोल्व नहीं हो सकते क्योंकि हमारी अपनी लाइफ है और हैं हमारे अपने सपने/ हम हकीकत में भी हैं और हकीकत से परे भी /

मेरे कुछ साथी लौटे हैं; ट्रेन का समय हो चला है / मैं दौड़ कर स्टेशन के बाहर जाता हूँ, एक दूकान है, वहां चाय भी मिल रही है और पावरोटी भी; मैं पावरोटी खरीदता हूँ और एक कुल्हड़ में चाय भी; संभल कर वापस लौटता हूँ वरना चाय छलक जायेगी / स्टेशन पर कुछ आवाजाही बढ़ गयी है; ट्रेन आ रही है; मेरे साथी अपना सामान उठा लेते हैं; उनमें से एक मेरा बैग भी उठा लेता है, मैं दूर से देखता हूँ, उसका कृतज्ञ रहता हूँ / वो ट्रेन की ऑर बढ़ चलते हैं; मैं उस बूढ़े के पास पहुँचता हूँ उसके हाथ में कुल्हड़ थमाता हूँ जिसे वो सावधानी से अपने बगल में रखता है जिससे कि बाद में  टटोल कर उठा सके / फिर मैं उसे पावरोटी देता हूँ और कहता हूँ, " बाहिर दुकनिया में इहै रहा बाबा, खाई ल्या " और जैसे ही जाने को होता हूँ, वह मेरी कलाई पकड़ लेता है / भाषा और बोली का महत्व उस दिन मुझे चरितार्थ हुआ; "हे बेटवा, हमहू का लियाय चल्त्या, तोहरे गोड़े गिरी बेटवा, हमहू का लियाय चल्त्या" / एक अधमरे बूढ़े के लिए, मेरी कलाई पर उसकी पकड़ काफ़ी मजबूत थी ; वैसे ही जैसे एक डूबता हुआ किसी सहारे को पकड़ लेता है / मैंने उससे हाथ छुड़ाया था और दौड़ कर ट्रेन में जा बैठा था; पर मेरी कलाई पर उस पकड़ की गर्माहट काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रही / वो पीछे से चिल्लाता रहा; मैं अपनी राह चलता रहा; उसकी अपनी मज़बूरी थी, मेरी अपनी / उसका वक़्त बरसों से उसी लोहे के खम्बे के नीचे ठहरा हुआ था, पर मेरा वक़्त तो भाग रहा था; मैं क्या करता !

Wednesday, May 9, 2012

सरलता बहुत भोग लिए हैं

इस शहरातू जीवन में,
जब सूरज सर पर तपता है,
और गर्मी प्यास उगाती है,
तब कूलर और फ्रिज का पानी,
या पेप्सी, कोला की बोतलों,
में कितना भी डूबो,
प्यास नहीं जाती है !!!
तब याद आता है,
कुएं का एक लोटा ताज़ा पानी,
और एक भेली देसी गुड़,
बेल का रस,
कच्चे आमों का पना,
क्या आपको है मना ?
नहीं न !!
पर ये सब यहाँ शहर में,
नहीं बिकता,
मेरा विश्वास कीजिये,
अब ये गाँव में भी नहीं मिलता ;
वहां भी हमने,
कृत्रिम उपाय खोज लिए हैं,
अब हम जटिल होना चाहते हैं,
सरलता बहुत भोग लिए हैं;
और ये सिर्फ प्यास तक,
सीमित नहीं है,
हमारी भूख भी अब जटिल है,
नियमित नहीं है,
चाहे पानी हो या खाना,
या दुःख सुख का आना जाना,
या रिश्ता कोई पुराना,
या हो यूँ ही मुस्काना,
इन सब में भी बहाना ?
तरक्की की दिखावट में,
हमने कितने अनचाहे रोग लिए हैं,
अब हम जटिल होना चाहते हैं,
सरलता बहुत भोग लिए हैं;

Monday, May 7, 2012

एक सत्य : अंत या आरंभ

उस शाम ढलते सूरज को देखना न सुखद लगा न ही दुखद ; बस कुछ अजीब लगा /  ऐसा लगा जैसे यह एक सत्य का अंत है, या एक दूसरे सत्य का आरंभ; या शायद दोनों, या फिर कुछ भी नहीं /
मैं इस चढ़ती सड़क की ऊंचाई पर बैठा था; एक सीमेंट की बेंच पर, जिसके अन्दर छिपा लोहा बाहर आने को बेचैन था / ये पतली सड़क नीचे दूर तक जाती है, मंदिरों और दुकानों के साथ /  मैं यहाँ कभी कभी आता हूँ,  जब मुझे लगता है कि क्रिकेट और व्हिस्की के आगे भी दुनिया है / पर मैं अक्सर नीचे सड़क कि ढलान पर ही रहता हूँ ; उस पतले चौराहे के पास जहाँ से बायीं ऑर हनुमान मंदिर का रास्ता चला जाता है / वहां लोगों को देखता रहता हूँ मंदिर कि ऑर से आते हुए या जाते हुए / या चौराहे से सीधा कुछ और आगे चला जाता हूँ, जहाँ गोलगप्पे कि रेड़ी लगती है; अभी भी वो रुपये में चार देता है, फिर भी लोग पांचवी मांगते हैं; कहते हैं तीन ही तो हुई / उसके बगल ही लकड़ी और टीन के बने गल्ले पर बैठा पनवाड़ी मुझे पहचान गया है; मेरे पहुँचते ही विल्स कि एक सिगरेट थमा देता है जैसे मैं चिमनी बनने ही वहां आया हूँ / पर यह सब वहां नीचे सड़क कि ढलान पर होता है / मैं ऊपर सड़क कि ऊंचाई नहीं चढ़ता क्योंकि इसमें मेहनत लगती है और इस तरफ भीड़ भी कम हो जाती है/ अक्सर हम अपने अनुमान लगा लेते हैं थोड़ी सी मेहनत से बचने के लिए / ख़ैर आज अनायास ही मैं चढ़ान पर था और इस तरफ वाकई लोग न थे; अलबत्ता  दो एक लकड़ी कि टाल ज़रूर थी जहाँ जलाऊ लकड़ियां बिकने को तैयार बैठी थीं/  
ये बेंच भी मुझे किस्मत से ही मिल गयी, इसकी पीठ सड़क कि ऑर थी और यदि इसके नीचे बैठा कुत्ता अचानक ही निकल कर नहीं भागता तो मुझे ये बेंच निश्चित ही न दिखती / मुझे लगा जैसे ज़माने से इस सीमेंट की टूटी बेंच पर कोई नहीं बैठा; पर यहाँ से सब कुछ कितना साफ़ दिखता है, ऊंचाई से, जैसे एरिअल व्यू हो /  नारंगी सूरज जो पानी के उस ऑर धरती में समाने के लिए धीरे धीरे उतर रहा है; वो पानी जो बहुत दूर से आता है ढेर सारी श्रद्धा, आस्था और गन्दगी बटोरे हुए, उस पानी तक पहुँचने के लिए कुछ दो सौ मीटर का बलुआ तट और पानी में तैरता नारंगी रंग / यह सब अदभुत है; गंगा को हमारे देश में यूँ ही नहीं पूजा जाता /
यह सब मुझे तब तक अदभुत लगता है जब तक वह नारंगी रंग मुझे रंग ही दिखता है; यह सब चंद मिनटों तक रहता है / तब एक आग दिखती है; और उसके बगल एक और, और थोड़ी दूर एक और, और उनसे कुछ ही दूर बैठे कुछ लोग / एक सिहरन सी दौड़ जाती है; तो ये है नारंगी रंग, अब ये सुन्दर नहीं लगता, अचानक पानी पर भी नहीं दिखता, सूर्य कहाँ गया; वहीँ तो है; फिर फीका क्यों हो गया ! अब यह सुखद नहीं है, दुखद भी नहीं, बस अजीब है , एक सत्य का अंत या एक दूसरे सत्य का आरंभ; या शायद दोनों, या फिर कुछ भी नहीं /  कहते हैं यहाँ आग कभी नहीं बुझती; बस दिन ढलता है, जीवन के साथ /


Tuesday, May 1, 2012

पूनम की रात,
जमुना तट पर,
उजले संगमरमर,
गुम्बद, मीनारें,
उस पर नक्काशी,
सौंदर्य का आलम,
प्रेम की काशी,
दिखती है...

पर उसमें से,
आज भी,
रोता, बिलखता,
देह का खारापन,
और,
टप टप रिसता,
मजदूरों का लहू,
नहीं दिखता !

एक शहंशाह,
और उसकी बेगम,
इसकी तलहटी में,
मज़े से सोते हैं,
और दर दर भटकते,
हथकटे  मजदूर,
प्रेम की पराकाष्ठा पर,
आज भी रोते हैं....