उस शाम ढलते सूरज को देखना न सुखद लगा न ही दुखद ; बस कुछ अजीब लगा / ऐसा लगा जैसे यह एक सत्य का अंत है, या एक दूसरे सत्य का आरंभ; या शायद दोनों, या फिर कुछ भी नहीं /
मैं इस चढ़ती सड़क की ऊंचाई पर बैठा था; एक सीमेंट की बेंच पर, जिसके अन्दर छिपा लोहा बाहर आने को बेचैन था / ये पतली सड़क नीचे दूर तक जाती है, मंदिरों और दुकानों के साथ / मैं यहाँ कभी कभी आता हूँ, जब मुझे लगता है कि क्रिकेट और व्हिस्की के आगे भी दुनिया है / पर मैं अक्सर नीचे सड़क कि ढलान पर ही रहता हूँ ; उस पतले चौराहे के पास जहाँ से बायीं ऑर हनुमान मंदिर का रास्ता चला जाता है / वहां लोगों को देखता रहता हूँ मंदिर कि ऑर से आते हुए या जाते हुए / या चौराहे से सीधा कुछ और आगे चला जाता हूँ, जहाँ गोलगप्पे कि रेड़ी लगती है; अभी भी वो रुपये में चार देता है, फिर भी लोग पांचवी मांगते हैं; कहते हैं तीन ही तो हुई / उसके बगल ही लकड़ी और टीन के बने गल्ले पर बैठा पनवाड़ी मुझे पहचान गया है; मेरे पहुँचते ही विल्स कि एक सिगरेट थमा देता है जैसे मैं चिमनी बनने ही वहां आया हूँ / पर यह सब वहां नीचे सड़क कि ढलान पर होता है / मैं ऊपर सड़क कि ऊंचाई नहीं चढ़ता क्योंकि इसमें मेहनत लगती है और इस तरफ भीड़ भी कम हो जाती है/ अक्सर हम अपने अनुमान लगा लेते हैं थोड़ी सी मेहनत से बचने के लिए / ख़ैर आज अनायास ही मैं चढ़ान पर था और इस तरफ वाकई लोग न थे; अलबत्ता दो एक लकड़ी कि टाल ज़रूर थी जहाँ जलाऊ लकड़ियां बिकने को तैयार बैठी थीं/
ये बेंच भी मुझे किस्मत से ही मिल गयी, इसकी पीठ सड़क कि ऑर थी और यदि इसके नीचे बैठा कुत्ता अचानक ही निकल कर नहीं भागता तो मुझे ये बेंच निश्चित ही न दिखती / मुझे लगा जैसे ज़माने से इस सीमेंट की टूटी बेंच पर कोई नहीं बैठा; पर यहाँ से सब कुछ कितना साफ़ दिखता है, ऊंचाई से, जैसे एरिअल व्यू हो / नारंगी सूरज जो पानी के उस ऑर धरती में समाने के लिए धीरे धीरे उतर रहा है; वो पानी जो बहुत दूर से आता है ढेर सारी श्रद्धा, आस्था और गन्दगी बटोरे हुए, उस पानी तक पहुँचने के लिए कुछ दो सौ मीटर का बलुआ तट और पानी में तैरता नारंगी रंग / यह सब अदभुत है; गंगा को हमारे देश में यूँ ही नहीं पूजा जाता /
यह सब मुझे तब तक अदभुत लगता है जब तक वह नारंगी रंग मुझे रंग ही दिखता है; यह सब चंद मिनटों तक रहता है / तब एक आग दिखती है; और उसके बगल एक और, और थोड़ी दूर एक और, और उनसे कुछ ही दूर बैठे कुछ लोग / एक सिहरन सी दौड़ जाती है; तो ये है नारंगी रंग, अब ये सुन्दर नहीं लगता, अचानक पानी पर भी नहीं दिखता, सूर्य कहाँ गया; वहीँ तो है; फिर फीका क्यों हो गया ! अब यह सुखद नहीं है, दुखद भी नहीं, बस अजीब है , एक सत्य का अंत या एक दूसरे सत्य का आरंभ; या शायद दोनों, या फिर कुछ भी नहीं / कहते हैं यहाँ आग कभी नहीं बुझती; बस दिन ढलता है, जीवन के साथ /
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