पूनम की रात,
जमुना तट पर,
उजले संगमरमर,
गुम्बद, मीनारें,
उस पर नक्काशी,
सौंदर्य का आलम,
प्रेम की काशी,
दिखती है...
पर उसमें से,
आज भी,
रोता, बिलखता,
देह का खारापन,
और,
टप टप रिसता,
मजदूरों का लहू,
नहीं दिखता !
एक शहंशाह,
और उसकी बेगम,
इसकी तलहटी में,
मज़े से सोते हैं,
और दर दर भटकते,
हथकटे मजदूर,
प्रेम की पराकाष्ठा पर,
आज भी रोते हैं....
जमुना तट पर,
उजले संगमरमर,
गुम्बद, मीनारें,
उस पर नक्काशी,
सौंदर्य का आलम,
प्रेम की काशी,
दिखती है...
पर उसमें से,
आज भी,
रोता, बिलखता,
देह का खारापन,
और,
टप टप रिसता,
मजदूरों का लहू,
नहीं दिखता !
एक शहंशाह,
और उसकी बेगम,
इसकी तलहटी में,
मज़े से सोते हैं,
और दर दर भटकते,
हथकटे मजदूर,
प्रेम की पराकाष्ठा पर,
आज भी रोते हैं....
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