Monday, May 14, 2012

वक़्त के पांव

कहते हैं वक़्त के पांव नहीं होते; बिना आहट आता है और चला जाता है / आने और जाने के बीच उसमें ठहराव होता है, छोटा या बड़ा ठहराव; जो इस पर निर्भर करता है की वक़्त साथ में वेदना लाया है या सुख / जो भी हो; कम या ज्यादा, पर आया वक़्त गुज़र ही जाता है / यह सब कितना सरल लगता है, खासकर तब जब हमें किसी को उसके बुरे समय में दिलासा देनी होती है, या जब किसी के अच्छे समय को देखकर खुद को दिलासा देनी होती है / परन्तु क्या कभी गौर किया है कि कहीं कहीं, कुछ जगहों पर, कुछ लोगों के लिए यह ठहराव कितना लम्बा होता है; जब वक़्त केवल एक बार आता है और साँसों के साथ ही जाता है / जब जीवन ठहराव में ही बीत जाता है; जब कुछ भी वक़्त का मोहताज़ नहीं होता; जब आहटों के मायने नहीं होते; जब कोई शक्ल तो होती है, पर आइने नहीं होते / यह सब मुझे उन दो घंटों के बीच महसूस हुआ जब मैं उससे मिला / ये कोई हादसा नहीं था, कोई घटना या दुर्घटना नहीं, कोई जीत या हार भी नहीं, बस एक छोटा सा लम्हा था जो मेरे लिए तो भाग रहा था, पर उसके लिए बिलकुल थमा हुआ था / मैं इसे कहीं भी, कभी भी दोहरा सकता हूँ क्योंकि ये मेरे अन्दर आज भी बिलकुल ताज़ा है; पर वक़्त कि नज़रों से देखें तो ये कुछ तेईस साल पहले कि बात है /

मैं बंगलूर से बेलगाँव जा रहा था, अपनी बास्केटबाल टीम के अन्य खिलाडियों के साथ ; आज बेशक मुझमें वह अवशेष न नज़र आयें पर उस समय मैं देश के चुनिन्दा युवा प्रतिभावान खिलाडियों में से एक था / अपने इस शौक को मैंने कई वर्षों तक जीवित रखा; आज भी इन शारीरिक और सामाजिक विफलताओं के बावजूद, यदि खेलने का मौका मिलता है तो मन में कहीं कोने में टांग सिकोड़े बैठा वह खेल का कीड़ा कुलबुलाने लगता है / पर ये मेरी बात है और यहाँ यह केवल वजह मात्र है जिसके कारण रात के ग्यारह बजे मैं उस छोटे से स्टेशन पर बैठा दूसरी गाड़ी का इंतज़ार कर रहा था / इस स्टेशन का नाम मिराज़ था और बंगलूर से यहाँ आने के बाद हमें गाड़ी बदलनी थी जो रात में एक बजे हमें मिलती / बाकी साथियों ने मुझे सामान के पास बैठाया और सब घूमने निकल गए / मैं अपनी टीम में उम्र में सब से छोटा था, कुछ उन्नीस बरस का, और यूँ कहने को तो मैं लगभग छः फीट का था पर इस बास्केटबाल की टीम में मैं लम्बाई के लिहाज़ से भी सबसे छोटा था / यदि इस दानवीय टीम को मैं अपने गाँव ले जाता और इन्हें मात्र देखने के लिए टिकट लगाता तो शायद आज मैं भी दो बिस्वा ज़मीं खरीद ही लेता / परिवार में छोटों पर हम ज़िम्मेंदारियां नहीं डालते पर यहाँ मुझे आसानी से सारे सामान की हिफाज़त का ज़िम्मा थमा दिया गया था / उन्हें पता था की बड़ों का लिहाज़ और मेरी आगे खेलने की लालसा मेरी मज़बूरी है ; यह उत्पीड़न था,  जिसे हम अनायास ही छोटी छोटी बातों से शुरू कर देते हैं और बाद में जब उत्पीड़ित थक हार कर विद्रोह करता है तो असामाजिक तत्त्व या फिर बागी कहलाता है / आप सोचेंगे कि इतनी छोटी बात को इतना बड़ा तूल क्यों, पर यकीन मानिये, हजारों मील लम्बा सफ़र भी एक छोटे से कदम से ही शुरू होता है / वरना...घूमने की इच्छा तो मेरी भी थी /

ख़ैर ! मैंने अपने बैग से अर्थर हेली की किताब निकली और उसमें खो गया; उन दिनों मैं  अर्थर हेली और निर्मल वर्मा को खूब पढता था / इस स्टेशन से अधिक  गाड़ियाँ नहीं गुज़रती; प्लेटफार्म की निर्जनता और अजीब सी ख़ामोशी इसका सबूत थीं / मैं इस लोहे की बेंच पर बैठा था और मेरे आगे कुछ बैग और अटैची करीने से रखीं थी जिनकी अनचाही रखवाली का ज़िम्मा मुझ पर था / मेरे दायें हाथ पर वो किताबों की लकड़ी की दुकान थी जिसे कुछ ही देर पहले उस दुकानदार ने बड़ी तल्लीनता से लकड़ी के तख्ते लगा कर बंद किया था / एक ठेला भी उससे कुछ ही दूर पर अनमना सा आराम कर रहा था; पानी के नलों के बगल में, और उसके पास ही बेंच पर उसका मालिक सो रहा था, ठंडी पड़ी चाय और बासी होती पूरी और भाजी के बीच / बीच बीच में एक पुलिस वाला कहीं से आकर कहीं को चला जाता था, अपने हाथ में उलझे डंडे को घुमाता हुआ / बाएँ हाथ पर लोहे का मोटा खम्बा था, ऐसे कई खम्बों पर इस प्लेटफार्म की ऊँची लोहे की छत अटकी पड़ी थी; एक गाय भी थी जो पीछे सीढ़ियों के पास बैठी थी मानो ये जगह उसने पेटेंट कराया हो / कुछ सौ मीटर दूर जहाँ बाहर निकलने का द्वार था, वहां कुछ चहलकदमी अवश्य थी; मेरे सर पर एक पंखा था जो केवल इसलिए चल रहा था क्योंकि उसे चलाया गया था ; ठीक वैसे ही जैसे हम अमूमन नौकरी में अपनी फ़ाइलें निपटाते हैं / यदि मेरे बगल रखी पानी की वह बोतल नीचे न गिरती तो शायद वह नहीं जगता; पर उसे जागना था और वह जगा; और फिर मुझे वह आवाज़ सुनाई दी " कुछ खाई का दै देता भईया, भिनसार देख लेइत " /

वह मुझसे कुछ पांच मीटर की दूरी पर था, बिलकुल लोहे के मोटे खम्बे से सटा हुआ ; और मैं अब तक अपने को अकेला समझ रहा था / मैंने आश्चर्य से देखा; वह कुछ गठरी जैसा ही था, अंग्रेजी के जेड अक्षर की तरह, एक डंडा जो सिरहाने पड़ा था, कुछ कपड़ों की शक्ल में चीथड़े , हलकी सफ़ेद दाढ़ी जो शायद अब न बढ़ती थी न घटती थी, अन्दर धंसी हुई आँखें जिन्हें देखने का शौक न बचा था, डंडे के बगल रखा वह बड़ा सा खोरा (कटोरा) जो शायद जूठन की खान था; और वह कराहती पर बिलकुल साफ़ आवाज़, " कुछ खाई का दै देता भईया, भिनसार देख लेइत " / भिनसार हमारे यहाँ सुबह को कहते हैं; ये मेरे गाँव की बोली थी ; मेरे गाँव से कोसों दूर, इस अनजानी जगह पर , अनजानों के बीच, अनजानी रात में, अनजाने कान उस अनजानी बोली को साफ़ पहचान सकते थे / आश्चर्य था; मेरे इतने करीब एक जीवन था और इतनी देर तक मुझे इसका एहसास भी नहीं; इस निर्जन स्टेशन पर हमारे एहसासों का ये हाल है तो भीड़ में इन आवाजों का क्या अस्तित्व होगा ! अब मैं उसे देख सकता था पर शायद उसकी आँखें जवाब दे चुकी थीं; या शायद उन आँखों ने कभी रोशनी देखी ही न हो; पर वह तो भिनसार देखने की बात करता है /

उसे याद नहीं कि वह यहाँ कैसे पहुंचा, कब पहुंचा, कहाँ से पहुंचा, पहुँचाया गया या फिर यूँ ही पहुँच गया / कुछ बेटवा और पतोहू कि बात करता है पर इससे अधिक कुछ नहीं; बस कुछ खाने को मांगता है / मेरे पास खाने को कुछ नहीं है; मैं उसे बीस रुपये देना चाहता हूँ, ये मेरे लिए एक समय के भोजन की रकम थी उन दिनों पर वह नहीं लेता; कहता है " रुपिया न चाही बच्चा, कुछ खाई का दै देता , भिनसार देख लेइत" / यहाँ कुछ खाने को नहीं मिल रहा; स्टेशन के बाहर हो शायद, पर मैं नहीं जा सकता था; मैं इंतज़ार करने लगा, शायद एकाध साथी पहले आ जाए / मैं उससे खड़ी बोली में ही बात करता हूँ; क्यों ! मुझे पता नहीं; मैं उसे छूना नहीं चाहता, पर मैं उसे खाना देना चाहता हूँ, मैं उसके पास नहीं बैठना चाहता पर मैं उससे साहनुभूति भी रखता हूँ / ये असमंजस की स्थिति है; हमारी आज की दशा को उजागर करती हुई, हम आज भी सहानभूति तो रख सकते है, दूर से शायद कुछ कर भी सकते हैं, पर इनमे सम्मिलित नहीं होना चाहते, इन्वोल्व नहीं हो सकते क्योंकि हमारी अपनी लाइफ है और हैं हमारे अपने सपने/ हम हकीकत में भी हैं और हकीकत से परे भी /

मेरे कुछ साथी लौटे हैं; ट्रेन का समय हो चला है / मैं दौड़ कर स्टेशन के बाहर जाता हूँ, एक दूकान है, वहां चाय भी मिल रही है और पावरोटी भी; मैं पावरोटी खरीदता हूँ और एक कुल्हड़ में चाय भी; संभल कर वापस लौटता हूँ वरना चाय छलक जायेगी / स्टेशन पर कुछ आवाजाही बढ़ गयी है; ट्रेन आ रही है; मेरे साथी अपना सामान उठा लेते हैं; उनमें से एक मेरा बैग भी उठा लेता है, मैं दूर से देखता हूँ, उसका कृतज्ञ रहता हूँ / वो ट्रेन की ऑर बढ़ चलते हैं; मैं उस बूढ़े के पास पहुँचता हूँ उसके हाथ में कुल्हड़ थमाता हूँ जिसे वो सावधानी से अपने बगल में रखता है जिससे कि बाद में  टटोल कर उठा सके / फिर मैं उसे पावरोटी देता हूँ और कहता हूँ, " बाहिर दुकनिया में इहै रहा बाबा, खाई ल्या " और जैसे ही जाने को होता हूँ, वह मेरी कलाई पकड़ लेता है / भाषा और बोली का महत्व उस दिन मुझे चरितार्थ हुआ; "हे बेटवा, हमहू का लियाय चल्त्या, तोहरे गोड़े गिरी बेटवा, हमहू का लियाय चल्त्या" / एक अधमरे बूढ़े के लिए, मेरी कलाई पर उसकी पकड़ काफ़ी मजबूत थी ; वैसे ही जैसे एक डूबता हुआ किसी सहारे को पकड़ लेता है / मैंने उससे हाथ छुड़ाया था और दौड़ कर ट्रेन में जा बैठा था; पर मेरी कलाई पर उस पकड़ की गर्माहट काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रही / वो पीछे से चिल्लाता रहा; मैं अपनी राह चलता रहा; उसकी अपनी मज़बूरी थी, मेरी अपनी / उसका वक़्त बरसों से उसी लोहे के खम्बे के नीचे ठहरा हुआ था, पर मेरा वक़्त तो भाग रहा था; मैं क्या करता !

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