Wednesday, February 23, 2011

कभी भी तम नहीं होता

रगों में गम नहीं होता, ये चेहरा नम नहीं होता;
तड़पती झील के आँचल में पानी कम नहीं होता;
जो बजती रागिनी थी उन हवाओं कि दिशाओं से;
अभी भी सत्य ही होता, महज़ ये भ्रम नहीं होता;
ज़रा सा उस समय मुहं मोड़ कर जो तुम नहीं मुड़ते;
विवशताओं की घाटी में कभी भी तम नहीं होता.

Friday, February 18, 2011

क्या मन में ढूँढा था

कभी पर्वत पे ढूँढा था, कभी मधुबन में ढूँढा था;
शहर से दूर जाकर के घटा औ घन में  ढूँढा था;
अमीरों की हवेली में, तुम्हे निर्धन में ढूँढा था;
दिवस की आंच में भी और रात के तम में ढूँढा था;
कहाँ तुम खो गए थे प्रिय  तुम्हे हर जन में ढूँढा था.

मुझे प्रिय ढूँढने में हाय इतनी क्यों मशक्कत की;
मैं खोया ही कहाँ था जो ज़माने भर में खोजे तुम;
जगह की दूरियों को नापने में क्यों भटकते थे;
सदा से था तुम्हारे पास क्या अपने मन में ढूँढा था !

Monday, February 7, 2011

मन तेरा कैसे मान करूँ


मन तेरा कैसे मान करूँ !!!
पुष्पों पर भंवरों का गुंजन,
पत्तों पर चिड़ियों का कलरव,
रिमझिम से गिरते सावन में,
अनकहे प्रेम का ये बंधन.
मेरे इस शून्य ह्रदय में जब,
सब सूना सूना लगता था,
आकाश धरा का दूर मिलन,
जब इक मिथ्या सा लगता था.
तब तुम आये अभिलाषा बनकर,
सुन्दरता की आशा बनकर,
तुमने दिखलाया ये सब,
तेरा कैसे सम्मान करूँ !!!
मन तेरा कैसे मान करूँ !!!









रात का सूरज

महज़ इक आरज़ू हो तुम या मेरे पेड़ बरगद के,
झूला मेरे सावन का हो या हो तुम मेघ अम्बर के,
 कुँए का नीर हो लू में या ठंडी ओस खेतों की,
महुआ हो मेरे बागों का या टहनी एक पतझड़ की,

करवटी हैं सब बदल जाते हैं मौसम में,
मैं क्यों सोचूं की तुम भी उन्ही के दायरे में हो,
अंधेरों में जो गुजरी थी प्रकाशित अब वो रातें हैं,
दिवस तुम मेरे पश्चिम के मेरी रातों के सूरज हो. 








ये ख़ामोशी तुम्हारी

खामोशी तोड़ सकती है, ख़ामोशी जोड़ सकती है,
किसी बहके से रिश्ते को ख़ामोशी मोड़ सकती है,
खामोश रहता मैं अगर इससे सुकून मिलता,
तुम्हारी पर ये ख़ामोशी मेरा दम तोड़ सकती है.

बहुत कम दिन बचे हैं अब हमारे पास ओ प्रियतम,
कहीं खामोश न रहते हुए निकले हमारा दम,
अगर मिलना न हो हमसे तो बेशक न कभी मिलना,
इक बार हंसकर देख ही लो दर्द होगा कम. 

Saturday, February 5, 2011

धुंधले दिन

वो धुंधले से दिन थे,
कोहरे में एक दुनिया समेटे हुए;
पानी था अथाह....पर ठहरा हुआ,
जिस पर बादलों का गुबार सा मंडराता था;
आज वो धुंध छंट गयी है शायद,
...और पानी भी....चलता है,
पर यादों की सिलवटों में,
सब आज भी धुंधला है.....

तुम जल्दी लौट कर आना

तुम्हारे रंगों के संगम का इक आगाज़ बाकी है,
तुम जल्दी लौट कर आना अभी इक राग बाकी है.
पतंग तो उड़ चुकी लेकिन थोड़ा गुलाल बाकी है;
तुम जल्दी लौट कर आना अभी त्यौहार बाकी है.
हवा में ओस की बूँदें, जाड़े की सेज बाकी है;
तुम जल्दी लौट कर आना सूर्य का तेज़ बाकी है.
इशारों में समझ जाना, बहुत कुछ कहना बाकी है;
तुम जल्दी लौट कर आना अभी संग रहना बाकी है.
मैं रहूँगा बचकर, की मेरा मन ही साकी है;
तुम जल्दी लौट कर आना की बस इक नीर बाकी है.
मेरी भूलों के प्रायश्चित का इक भंडार बाकी है;
तुम जल्दी लौट कर आना नया संसार बाकी है.
सिसकना तब भी बाकी था, बहकना अब भी बाकी है;
तुम जल्दी लौट कर आना अभी सब कुछ ही बाकी है.
बहुत कुछ और लिखता मैं की पूरी रात बाकी है;
ह्रदय का प्रेम है बस ये कहाँ अब लफ्ज़ बाकी है.

जाड़े की तसल्ली

कोहरे में धूप के घुलने का सुख;

मेड़ों का खेतों से मिलने का रुख;

कथरी का ओस में भीगने का दुःख;
फसलों में अश्रुजल डूबा हुआ मुख;

बहुत कुछ जीवन से इस मौसम में पाया है;

झूठे सच्चे का तो पता नहीं पर;

तसल्ली देने एक जाड़ा फिर आया है. 

भूलना उनको नहीं

हुई क्या बात ऐसी जो पथिक उस राह को भूला;

वही थे बाग़ अब भी , और वही सावन का था झूला;

भूल सकते हम नहीं जब तक न चाहें भूलना;

थी यही इच्छा हमारी, बाग़ में न झूलना;

राहें नयी मिल जाने से ये पुराने रास्ते;

बंद नहीं होते हैं फिर भी हमारे वास्ते;

आगे बढ़ो, बढ़ते चलो, पाओ नयी तुम मंजिलें;

भूलना उनको नहीं, तुमको मिले जो दिलजले;

साथ चलना चाहता हूँ

रोज़ कुछ साथ चलना चाहता हूँ;
रोज़ कुछ बात करना चाहता हूँ;
रोज़ कुछ बेगाना पाना चाहता हूँ;
रोज़ कुछ खज़ाना खोना चाहता हूँ;

...चाहते हैं ये, बनी रहती हैं;
रोज़, रोज़ की तरह गुज़र जाता है;
एक पग आगे बढाने की चाहत में;
रास्ता ही बीच में ठहर जाता है.

ये बदलता स्वरुप

जब बेटे की जिद्द,

माँ के वात्सल्य काजल को,

आँखों से पहले ही रोक लेती है......
जब पिता का क्रोध,

पुत्र की बढ़ती उम्र देख,

बीच में थम जाता है...

जब एक स्वर्ण मुद्रिका,

आपसी उँगलियों की धार,

बन जाती है....

जब बूढी हड्डियों के,

गलने से पूर्व ही,

धरा बँट जाती है...

तब अनायास ही सोचता हूँ,

ये दिवस का,

अवसान है या समापन. 

रोमांस

रात की बारिश के बाद सुबह की धुंध में रोमांस दिखता है;
कभी पत्तों में, भंवरों में, कभी जुगनू में रोमांस दिखता है,
हाथों में हाथ लेकर जब टहलते, रोमांस दिखता है,
निराले तुम, तुम्हारी हर अदा, हर बात निराली है,
तुम्हारे रोमांस देखने का अर्थ भी हरियाली है,...
मेरा पर देखने का अंदाज़ कुछ अलग सा है,
चिलचिलाती धूप हो या कंपकंपाती ठण्ड हो,
तुम्हारे बारे में महज़ सोचूं तो रोमांस दिखता है.

बड़े सामान्य से दिन हैं

बड़े सामान्य से दिन हैं ....

बेमौसम बारिशें हैं,

और सांझ की बयार में

ख्वाहिशें हैं,

वही सहमी सी धूप है,

और कहीं इसमें गुमसुम,

छांव का इक रूप है,

वही चंचल से वृक्ष हैं,

और बहती हवा के साथ

निष्पक्ष हैं,

वही हैं चेहरे....जाने पहचाने,

और छुपे हुए उनमे रंग,

कितने अनजाने,

वही हैं मुरादें अब भी....मन में,

और जानता है मस्तिष्क,

नहीं होंगी ये पूरी,

इस जीवन में.

बड़े सामान्य से दिन हैं ....

सन्नाटा

नहीं मिल पाते हैं अक्सर , नहीं हो पाती है बातें;

बड़े खामोश से दिन हैं, बड़ी खामोश हैं रातें ;

जबकि जानता है मन दिलों की है ये मज़बूरी;
ये सन्नाटा नहीं है, है समय की सिर्फ ये दूरी;

मदहोश होता सोच, खुलेंगे जब ये दरवाज़े;

न होगा फिर ये सन्नाटा न होंगी इतनी आवाजें.

महज़ विचारों में तुम हमको देख लेते हो

महज़ विचारों में तुम हमको देख लेते हो;

और हम आलिंगन में भी अपनत्व ढूंढते हैं ;

हमने सोचा तुम नहीं समझोगे मन की इस व्यथा को;

इसलिए चुपचाप सिल कर होंठ अपने चल रहा;

पर गलत आँका था हमने उस ह्रदय की चेतना को;

न वरन समझा अपितु मेरी व्यथा को भी सहा;

खुले गगन में तुम सतरंगी देख लेते हो;

और हम घटाओं में भी मेघ ढूंढते हैं....
.

एक मिश्रण

इक और गुज़रा दिन समेटा याद में इसको;
...दफ़न हो जाएँगी अब ये मेरे मन कि दराजों में;
जो आये वक़्त परिचित तब मिलेगी रूह फिर इनको;
नहीं तो सिलवटें पड़ती रहेंगी इन मजारों में.
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वेदना कुछ भी नहीं, तब ह्रदय इतना मौन क्यों है;
क्यों हम अब भी स्वप्नते हैं, स्मृतियाँ भूली भुलाई ;
आस भी है, प्यास भी है, रौशनी कुछ ख़ास भी है;
मन हैं इतने पास अपने, हाथ लेकिन दूर क्यों हैं.
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दूर रह कर दूर रहना बेहतर है;
पास रहकर दूर रहना इक सज़ा है;
जाम है पर होंठ तक आने न पाता;
अब स्वयं संतोष करने में रज़ा है.
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निराशाओं के काले घन में जब मैं डूब जाता हूँ,
दिखाते इन्द्रधनुषी रंग मुझको, तुम सदा हंसकर;
विवश हो जाऊंगा तब मैं, चले जाओगे जब तुम कल;
मुझे कुछ लड़खड़ाने दो, संभल जाऊंगा मैं मरकर.
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क्यों नाराज़ होते हो, मेरे दरख्वास्त करने पर;
महज़ यादें ही मांगी है कोई जीवन नहीं माँगा;
कभी झकझोर दे तुमको कोई बादल का यदि टुकड़ा;...
तो करना याद उसको जो तुम्हारी नींदों में जागा.
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चले जाओ कहीं तुम पर बहारें छोड़ कर जाना;
नया गुलशन तुम्हारे साथ नयी जगह बस जाएगा;
हमारा क्या है, बस यही दरखास्त करते हैं;...
गगन में देखते रहना, पतंग को भूल मत जाना.
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ज़मीन पर हैं कदम फिर भी निगाहें आसमान पर हैं;
पतंग का मेल होना है किसी बादल के टुकड़े से...
ज़रा सी ढीली कर दो डोर की आतुर अब ये मन फिर है;
पूरे हो जायेंगे सपने जो अब तक थे अधूरे से....
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कहता रहा सदा यह तुमसे व्यस्त कार्य की रातों में;
पूर्ण तुम्हारी ख्वाहिश कर दूँ पर मुझको विश्राम कहाँ;
एक भगीरथ निकल चुकी है इन ललचाई आँखों से;
परिचित हो लें फिर से हम पर वो अनजानी सांझ कहाँ.......
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जागो, सितारे और भी हैं.

क्यों बैठ गए तुम थककर, ओढ़ विफलताओं की चादर;
उठो, नतीजे और भी हैं.
इक घोंसला ही उजड़ा है, चमन पूरा ही बाकी है;
जोड़ो, कि तिनके और भी हैं.
नदी के इक किनारे पर जो नाविक लौट न आया,
...ढूंढो , किनारे और भी हैं.
तुम्हारे आँगन में तारा नहीं टूटा तो रोते हो;
जागो, सितारे और भी हैं.

भौगोलिक दूरियां

बड़ा बेमानी लगता है;

सुबह जो मेरे घर कि जब कहीं की सांझ होती है,



यहाँ पर सूर्य इतराता है, शाखाओं से पेड़ों की,

वहां मदहोश होने की, चाँद की तैयारी होती है,

यहाँ पर आँख खुलती है, लिहाफों के घरोंदो में,

वहां बुझती सी पलकों पर नींदें भारी होती हैं,

ये दूरी है समय की या धरा भूगोल ऐसा है,

की जगना दो घरों का साथ में, दुशवारी होती है,

कहीं इक मौका मिलता, साथ दिख जाते शशि को;

वरना ज़िन्दगी में कितनी ही लाचारी होती है,



बड़ा बेमानी लगता है....

क्या लौटेगी प्रकृति

बयां करते हैं दो सहमे हुए से वृक्ष बच्चों को,
आमों का खड़ा इक बाग़ था कभी तेरे गाँव में,
झूला झूलती थी माँ तुम्हारी और सखियाँ भी,
जो आता था यहाँ सावन सदा भीगी हवाओं में.

...कभी क्या लौटेंगे वो दिन, मोर जब फिर से नाचेंगे,
कभी क्या लौटेगी बरसात मोती सी तेरे आँगन में,
कभी क्या लौटेंगे वो वृक्ष बाग़ में झूला झूलेंगे,
कभी क्या लौटेगी सौगात प्रकृति कि तेरे आँचल में.

जागो....जहान और भी हैं.

कब तक रहोगे भीगते उन बीती बारिशों में,
जिन्हें धरती सोख गयी है,
कब तक रहोगे ऊंघते उन अनजानी रातों में,
जिन्हें बदली रोक गयी है,
कब तक रहोगे भागते उन असमंजस राहों में,
...जिन्हें वादी मोड़ गयी है,
कब तक रहोगे सोचते उन अनसुलझे वादों में,
जिन्हें खुद वो तोड़ गयी है,
...
जागो....जहान और भी हैं.

आओ थोड़ा सा व्यर्थ जियें

अपनों से दिल की बात, सुनहरी आँखों के ज़ज्बात;
बारिश में भी साथ, तुम्हारे हाथों में इक हाथ ;
चाँद की उजियारी रात, भोर के आने की सौगात;
जब सब बेगाना लगता हो.......
तो वापस जाना वहीँ, जहाँ तुम ह्रदय गंवाया करते थे;
जब दिल में कोई बात न थी, तब भी हकलाया करते थे;
जब आँखों पर चश्मा डाले, तुम तारे रोज़ गिनाते थे;
जब जाग रही दुनिया सारी, तुम बरबस ही सो जाते थे;

अच्छा होगा बदलाव यही, यदि समय समय पर किया करें,
इस मोह मायावी दुनिया में, आओ थोड़ा सा व्यर्थ जियें I

ये कैसा बदलाव

जब आशाओं की वादी में सदमे का थोड़ा लहू गिरा,
तब शून्य ह्रदय वीराने में, इक डर का काला मेघ घिरा,
ये मन बदला, दर्पण बदला, पुष्पों का यौवन भी बदला,
बदली धरती, बदला मौसम, अम्बर का पौरुष भी बदला,
बदले जुगनू, बदले बादल, बदला मिज़ाज कुछ सावन का,
...बदली राहें, बदली चाहत, बदला स्वरुप मनभावन का,
बदलाव हुआ ऐसे कैसे, पावन थे बंधन, छिन्न हुए,
जब एक ह्रदय था, एक थी भाषा, देखो कैसे भिन्न हुए.