Monday, April 25, 2011
Monday, April 18, 2011
अब अपनी पहचान लिखूंगा
बहुत लिख चुका मरण यहाँ मैं, अब मैं अमृतपान लिखूंगा,
जाने क्या समझे थे मुझको, अब अपनी पहचान लिखूंगा ;
क्यों शोक करें, उल्लास भी जब इतने सस्ते में मिलता है,
एक देह की दुनिया है ये, फिर तू क्यों आहें भरता है,
सूरज रोज़ सुबह उगता और सांझ ढले ढल जाता है,
पर उसको जो कुछ करना वह इसी बीच कर जाता है,
संकल्पों के अडिग ह्रदय पर,सावित्री का मान लिखूंगा,
मृत्यु जहाँ आकर के लौटी, ऐसा सत्यवान लिखूंगा ;
क्या मुझसे तुम लिए कभी और क्या मुझको दे जाओगे,
पर जब भी मुझको खोजोगे अपने मन में पाओगे,
सब्र करो एहसासों की कलियाँ फिर से मुस्काएँगी,
ग्वालों की गायें हैं ये, घर शाम को वापस आएँगी,
प्रेम मात्र मिलाप नहीं है, प्रेम ही सृष्टि रचयिता है,
कभी नहीं भूले हम जिसको ऐसी सुन्दर कविता है,
नहीं वेदना लिखूं विरह की, निश्छल प्रेम का गान लिखूंगा,
राधा के अधरों पर अब तक, बंसी की वो तान लिखूंगा;
पड़े ज़रूरत कभी अगर तो सुख का अपने त्याग करेंगे,
किन्तु साथ ही नए सिरे से उर्जा का संचार करेंगे,
ऐसा है अमरत्व कहाँ और ऐसा दृढ विश्वास कहाँ,
पावन माटी में जन्में हम, पुजते हैं पाषाण जहाँ,
जहाँ करें सर्वस्व समर्पण, जब धरा को कष्ट में पायेंगे,
जहाँ और दधीचि निकलेंगे, और भगीरथ आयेंगे,
पड़े अंत ही लिखना तो मैं वीरों का बलिदान लिखूंगा,
कर्ण जहाँ मंझला दिखता हो, ऐसा अदभुत दान लिखूंगा;
जाने क्या समझे थे मुझको, अब अपनी पहचान लिखूंगा ;
क्यों शोक करें, उल्लास भी जब इतने सस्ते में मिलता है,
एक देह की दुनिया है ये, फिर तू क्यों आहें भरता है,
सूरज रोज़ सुबह उगता और सांझ ढले ढल जाता है,
पर उसको जो कुछ करना वह इसी बीच कर जाता है,
संकल्पों के अडिग ह्रदय पर,सावित्री का मान लिखूंगा,
मृत्यु जहाँ आकर के लौटी, ऐसा सत्यवान लिखूंगा ;
क्या मुझसे तुम लिए कभी और क्या मुझको दे जाओगे,
पर जब भी मुझको खोजोगे अपने मन में पाओगे,
सब्र करो एहसासों की कलियाँ फिर से मुस्काएँगी,
ग्वालों की गायें हैं ये, घर शाम को वापस आएँगी,
प्रेम मात्र मिलाप नहीं है, प्रेम ही सृष्टि रचयिता है,
कभी नहीं भूले हम जिसको ऐसी सुन्दर कविता है,
नहीं वेदना लिखूं विरह की, निश्छल प्रेम का गान लिखूंगा,
राधा के अधरों पर अब तक, बंसी की वो तान लिखूंगा;
पड़े ज़रूरत कभी अगर तो सुख का अपने त्याग करेंगे,
किन्तु साथ ही नए सिरे से उर्जा का संचार करेंगे,
ऐसा है अमरत्व कहाँ और ऐसा दृढ विश्वास कहाँ,
पावन माटी में जन्में हम, पुजते हैं पाषाण जहाँ,
जहाँ करें सर्वस्व समर्पण, जब धरा को कष्ट में पायेंगे,
जहाँ और दधीचि निकलेंगे, और भगीरथ आयेंगे,
पड़े अंत ही लिखना तो मैं वीरों का बलिदान लिखूंगा,
कर्ण जहाँ मंझला दिखता हो, ऐसा अदभुत दान लिखूंगा;
Saturday, April 16, 2011
गलतफहमियों के लिए
किसी को कानों से सुनना,
और उस पर अमल कर जाना,
क्या ज़रूरी है !!
क्योंकि पूरे चाँद में भी,
रात की सच्चाई,
ज़रा अधूरी है...
मुझे महाभारत का,
वह कथन याद आया,
कि "अश्वत्थामा मारा गया "
ग़लतफ़हमी का शिकार,
वह कथन
द्रोण को खा गया
और हकीकत जानने से पहले ही,
एक महारथी,
काल को भा गया ,
कभी कभी भरोसा करना,
हमारी आवश्यकता नहीं,
मजबूरी है;
और गलतफहमियों के लिए भी,
थोड़ी पहचान ज़रूरी है
और उस पर अमल कर जाना,
क्या ज़रूरी है !!
क्योंकि पूरे चाँद में भी,
रात की सच्चाई,
ज़रा अधूरी है...
मुझे महाभारत का,
वह कथन याद आया,
कि "अश्वत्थामा मारा गया "
ग़लतफ़हमी का शिकार,
वह कथन
द्रोण को खा गया
और हकीकत जानने से पहले ही,
एक महारथी,
काल को भा गया ,
कभी कभी भरोसा करना,
हमारी आवश्यकता नहीं,
मजबूरी है;
और गलतफहमियों के लिए भी,
थोड़ी पहचान ज़रूरी है
Friday, April 15, 2011
कल रात
अक्सर मैं जुगनुओं की राह तकता था,
और ऊब जाने पर,
खुली खिडकियों के अँधेरे गिनता था;
पर कल कुछ ऐसा हुआ,
लगा मानो कोई भ्रम जगमगाया था,
बेशक थोड़ा नाराज़ ही सही
पर काफ़ी लम्बे अंतराल के बाद,
कल रात चाँद मेरी खिड़की पर आया था.
और ऊब जाने पर,
खुली खिडकियों के अँधेरे गिनता था;
पर कल कुछ ऐसा हुआ,
लगा मानो कोई भ्रम जगमगाया था,
बेशक थोड़ा नाराज़ ही सही
पर काफ़ी लम्बे अंतराल के बाद,
कल रात चाँद मेरी खिड़की पर आया था.
Tuesday, April 12, 2011
कहीं कुछ थम गया है शायद....
पूरब की बयारों में,
जो अरमां उड़ा करते थे,
बड़े खामोश से,
सहमे से बैठे हैं,
कहीं कुछ
थम गया है शायद....
मचलती गर्मियों में,
दिल- ए -शरबते,
बरफ की सिल्लियों पर,
चुपचाप जलते हैं,
कहीं कुछ,
जम गया है शायद....
गुज़रती रातों में,
जो जुगनू थे रौशन,
अंधेरों में वो अपनी,
राहें ढूंढते हैं,
कहीं कुछ,
जल गया है शायद....
हताशाओं के मंज़र पर,
जो हिम्मत मुस्कुराती थी,
विवशताओं में अपनी वो,
निशानी खोजती है,
कहीं कुछ,
मर गया है शायद....
जो अरमां उड़ा करते थे,
बड़े खामोश से,
सहमे से बैठे हैं,
कहीं कुछ
थम गया है शायद....
मचलती गर्मियों में,
दिल- ए -शरबते,
बरफ की सिल्लियों पर,
चुपचाप जलते हैं,
कहीं कुछ,
जम गया है शायद....
गुज़रती रातों में,
जो जुगनू थे रौशन,
अंधेरों में वो अपनी,
राहें ढूंढते हैं,
कहीं कुछ,
जल गया है शायद....
हताशाओं के मंज़र पर,
जो हिम्मत मुस्कुराती थी,
विवशताओं में अपनी वो,
निशानी खोजती है,
कहीं कुछ,
मर गया है शायद....
Sunday, April 10, 2011
निगोड़ा चाँद
इन अंजोरी रातों में ,
एक दुनिया दिखती है,
हलकी सी हवा में,
पत्ता भी पत्ते से,
मिलने में शर्माता है,
...और जब,
ये अपनी छटा,
सारी दुनिया में,
बिखराता है,
निगोड़ा चाँद,
मेरी खिड़की पर
क्यों नहीं आता है ?
Wednesday, April 6, 2011
अधेड़
कोई भरी जवानी में भी,
दिल को नहीं भाता है,
कोई अधेड़ कह कर भी,
उमंगें छोड़ जाता है,
उम्र, खुद ही,
अपने मायने तलाश रही है,
अधेड़ कह कर,
अपने ही दिलों में,
तसल्ली के राग,
गा रही है,
ये संस्कार हैं हमारे,
या सामाजिक बंधन,
कि अपने ही कान,
अपने ही दिल को,
नहीं सुनते...
पर लाख कोशिशों,
के बावजूद,
क्या आप अब भी,
सपने नहीं बुनते.....
और जैसा मैंने पहले भी,
कहा है,
पतझड़ के आने से,
तने सूखे नहीं होते,
और महज़ बालों की,
सफेदी से,
दिल बूढ़े नहीं होते,
तो क्यों नहीं उन वादियों में,
बेफिक्र होकर हम विचरते,
क्यों नहीं उन आइनों में,
प्यार से अब हम संवरते,
क्यों नहीं अब वक़्त के,
इन चित्रों में हम रंग भरते,
क्यों नहीं अपनी समझ से,
उम्र का मतलब समझते,
हमारी अवस्था,
इन छोटी छोटी खुशियों में भी,
जब तमन्नाओं का साथ,
पाती हैं,
तो बरबस ही,
किसी शायर की ये पंक्तियाँ,
याद आती हैं,
कि लाख मुश्किलें सही पर,
क्या मुस्कुराना छोड़ दें,
और ज़लज़लों के खौफ से क्या,
घर बनाना छोड़ दें.
दिल को नहीं भाता है,
कोई अधेड़ कह कर भी,
उमंगें छोड़ जाता है,
उम्र, खुद ही,
अपने मायने तलाश रही है,
अधेड़ कह कर,
अपने ही दिलों में,
तसल्ली के राग,
गा रही है,
ये संस्कार हैं हमारे,
या सामाजिक बंधन,
कि अपने ही कान,
अपने ही दिल को,
नहीं सुनते...
पर लाख कोशिशों,
के बावजूद,
क्या आप अब भी,
सपने नहीं बुनते.....
और जैसा मैंने पहले भी,
कहा है,
पतझड़ के आने से,
तने सूखे नहीं होते,
और महज़ बालों की,
सफेदी से,
दिल बूढ़े नहीं होते,
तो क्यों नहीं उन वादियों में,
बेफिक्र होकर हम विचरते,
क्यों नहीं उन आइनों में,
प्यार से अब हम संवरते,
क्यों नहीं अब वक़्त के,
इन चित्रों में हम रंग भरते,
क्यों नहीं अपनी समझ से,
उम्र का मतलब समझते,
हमारी अवस्था,
इन छोटी छोटी खुशियों में भी,
जब तमन्नाओं का साथ,
पाती हैं,
तो बरबस ही,
किसी शायर की ये पंक्तियाँ,
याद आती हैं,
कि लाख मुश्किलें सही पर,
क्या मुस्कुराना छोड़ दें,
और ज़लज़लों के खौफ से क्या,
घर बनाना छोड़ दें.
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