Sunday, April 10, 2011

निगोड़ा चाँद

इन अंजोरी रातों में ,
एक दुनिया दिखती है,
हलकी सी हवा में,
पत्ता भी पत्ते से,
मिलने में शर्माता है,
...और जब,
ये अपनी छटा,
सारी दुनिया में,
बिखराता है,
निगोड़ा चाँद,
मेरी खिड़की पर
क्यों नहीं आता है ?

No comments:

Post a Comment