Monday, April 18, 2011

अब अपनी पहचान लिखूंगा

बहुत लिख चुका मरण यहाँ मैं, अब मैं अमृतपान लिखूंगा,
जाने क्या समझे थे मुझको, अब अपनी पहचान लिखूंगा ;
क्यों शोक करें, उल्लास भी जब इतने सस्ते में मिलता है,
एक देह की दुनिया है ये, फिर तू क्यों आहें भरता है,
सूरज रोज़ सुबह उगता और सांझ ढले ढल जाता है,
पर उसको जो कुछ करना वह इसी बीच कर जाता है,
संकल्पों के अडिग ह्रदय पर,सावित्री का मान लिखूंगा,
मृत्यु जहाँ आकर के लौटी, ऐसा सत्यवान लिखूंगा ;

क्या मुझसे तुम लिए कभी और क्या मुझको दे जाओगे,
पर जब भी मुझको खोजोगे अपने मन में पाओगे,
सब्र करो एहसासों की कलियाँ फिर से मुस्काएँगी,
ग्वालों की गायें हैं ये, घर शाम को वापस आएँगी,
प्रेम मात्र मिलाप नहीं है, प्रेम ही सृष्टि रचयिता है,
कभी नहीं भूले हम जिसको ऐसी सुन्दर कविता है,
नहीं वेदना लिखूं विरह की, निश्छल प्रेम का गान लिखूंगा,
राधा के अधरों पर अब तक, बंसी की वो तान लिखूंगा;

पड़े ज़रूरत कभी अगर तो सुख का अपने त्याग करेंगे,
किन्तु साथ ही नए सिरे से उर्जा का संचार करेंगे,
ऐसा है अमरत्व कहाँ और ऐसा दृढ विश्वास कहाँ,
पावन माटी में जन्में हम, पुजते हैं पाषाण जहाँ,
जहाँ करें सर्वस्व समर्पण, जब धरा को कष्ट में पायेंगे,
जहाँ और दधीचि निकलेंगे, और भगीरथ आयेंगे,
पड़े अंत ही लिखना तो मैं वीरों का बलिदान लिखूंगा,
कर्ण जहाँ मंझला दिखता हो, ऐसा अदभुत दान लिखूंगा;

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