अक्सर मैं जुगनुओं की राह तकता था,
और ऊब जाने पर,
खुली खिडकियों के अँधेरे गिनता था;
पर कल कुछ ऐसा हुआ,
लगा मानो कोई भ्रम जगमगाया था,
बेशक थोड़ा नाराज़ ही सही
पर काफ़ी लम्बे अंतराल के बाद,
कल रात चाँद मेरी खिड़की पर आया था.
और ऊब जाने पर,
खुली खिडकियों के अँधेरे गिनता था;
पर कल कुछ ऐसा हुआ,
लगा मानो कोई भ्रम जगमगाया था,
बेशक थोड़ा नाराज़ ही सही
पर काफ़ी लम्बे अंतराल के बाद,
कल रात चाँद मेरी खिड़की पर आया था.
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