Wednesday, February 20, 2013

इंतज़ार खुली आँखों से गुज़र रहा है आहिस्ता,
ये अस्पताल की रात है ....ये कभी सोती नहीं ....

Monday, February 18, 2013

ये जो उधड़े  हुए धागे ज़मीं पर फैले हैं,
उस पुरानी चादर की बूढी कतरने हैं,
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें हैं,
सफ़ेद बाल हैं, झुर्रियों में सिमटे लम्हे हैं,
अब तो बस लटकी चादर धागों को गिरते देखती है,
अब इन धागों को इकट्ठा करने से सुबह नहीं बनती ....

Saturday, February 2, 2013

गुज़रती हवा के पन्ने पर,
आड़ी तिरछी रेखाएं,
मिलती नहीं,
कोई त्रिभुज या प्रकार नहीं बनाती,
बस पड़ी रहती हैं औंधे मुहं,
कोई आकार नहीं बनाती ....
ये वह है जो पाया है,
वह भी जो नहीं पाया,
और कितना भी निरर्थक लगे,
यह नहीं होता कभी ज़ाया,
कोई कहता ये यादें हैं,
या महज़ मीयादें हैं,
कोई अनुभव बताता है,
कोई बस सोच में डूब जाता है,
सब की अलग अलग रेखाएं हैं,
कई हादसे हैं, कुछ भावनाएं हैं,
कइयों के लिए,
बीता हुआ वनवास है,
कुछ हंस कर कहते हैं,
ये पुराना उपहास है,
अच्छा हो या बुरा,
खोटा हो या खरा,
हम जानते हैं,
ये हमारा इतिहास है ...
हवा में पन्ने अब भी लिखे जाते हैं,
प्रतिदिन,
और लहराते रहते हैं ये,
उद्देश्य के बिन,
इन पन्नों की लिखावट,
यादों में सिमट जाती हैं,
और छोड़ जाती हैं पीछे,
रेखाएं भिन्न,
कुछ स्मृतियाँ,
कुछ  पदचिन्ह ...
                  neeraj