Tuesday, August 30, 2011

तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो

हर पल एहसास बने फिरते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

बत्ती हो दिमाग़ की जो जल नहीं पाती,
या बौर हो आमों की जो फल नहीं पाती,
या हो सांस गरीब की जो चल नहीं पाती,
या बर्फ हो रकीब की जो गल नहीं पाती,

कतरा कतरा रोज़ गिरते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

एक सुन्दर बंगला, या कोई मोटर कार हो,
खूँटी हो दालान की, या खाट की नेवाड़ हो,
इक अदद हो नौकरी या रोकड़े की धार हो,
कैद जो न रख सके क्या ऐसा कारागार हो;

रोज़ इक नया पैबंद सिलते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

महुआ हो जाड़े का जो रुक नहीं पाया,
या शिखर हो प्रेम का जो झुक नहीं पाया,
क्या नींद हो पहरेदार की जो सुत नहीं पाया,
या हो फूल पलाश का जो गुँथ नहीं पाया,

देख नहीं पाता कब खिलते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

मदहोश की हो भावना या होश का आधार हो,
ऋषियों की हो साधना या मनुज का अवतार हो,
या हो चंदा की अमावस, बेबसी का हार हो,
जो न प्रेमी बन सका, क्या तुम उसका प्यार हो,

पवन है शांत फिर भी हिलते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;
हर पल एहसास बने फिरते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

Sunday, August 28, 2011

आशा की किरण

सिआचेन ग्लेशियर से कुछ हज़ार फुट ऊपर,
ये एक फौजी चौकी है,
एक टेंट है, अधलेटा हुआ,
और उसमे है बैठा लांस नायक राम अधार,
हाथ में दूरबीन, बगल में रखी लोडेड इंसास रायफल,
सौ राउंड्स, एक स्लीपिंग बैग, स्नो बूट्स, एक स्टोव,
एक हाई फ्रिक्वेंसी रेडियो सेट, कुछ बर्तन, मिटटी का तेल,
कुछ काजू, बादाम भी, और कुछ बर्फीले कपड़े,
ये सब सजते हैं इस छोटे से टेंट में,
आज अट्ठाईस दिन हो गए नहाए हुए,
दाढ़ी किसी बाबा कि तरह बढ़ चुकी है,
बस तीन दिन और...
और फिर समतल ज़मीन दिखेगी,
वह एक अगस्त से ड्यूटी पर है,
बर्फ और बर्फ...सब तरफ बर्फ,
सूर्य यहाँ कभी क्यों नहीं दिखता,
अपने बटुए में से एक मुड़ी सी फोटो निकालता है,
और देखता रहता है अपलक,
बूढ़े माँ बाप, छोटी बहन, आँखों में प्रार्थना लिए पत्नी,
और एक फूल सी बच्ची,
सब हैं इस फोटो में,
अब आँखों में ज्वारभाटा नहीं आते,
बस चिंता सताती है,
कोई खबर नहीं आई,
दस दिन पहले हेलीकाप्टर आया था,
ऊपर से थैला गिराया था,
पर उसमे कोई चिट्ठी न थी,
बस काजू थे, और बिस्कुट थे,
दो डब्बे भी थे; भोजन के,
और एक डब्बा लड्डुओं का,
पंद्रह अगस्त का बड़ा खाना था वह,
पर चिट्ठी नहीं थी,
वह सब ऐसे ही पड़ा है,
उसे यहाँ भूख नहीं लगती,
बस चिंता सताती है....
माँ की आँख में मोतियाबिंद,
ऑपरेशन होना था,
शहर ले जाना था सरकारी अस्पताल में,
कैसे गए होंगे,
पिता के घुटनों का दर्द चलने नहीं देता,
गाँव से एक सरकारी बस चलती तो है,
पर अक्सर नहीं आती,
और अस्पताल में कर्मचारी,
कहते थे पाँच सौ दो,
तभी बेड मिल पायेगा,
कैसा सरकारी अस्पताल है....
अगले साल वो उन्हें जम्मू लाएगा,
और मिलिट्री अस्पताल में इलाज़ कराएगा,
क्या पिताजी को राशन मिल पाया होगा,
या फिर राशन वाले ने उल्टा बोला होगा,
और दो किलो चीनी कम तोला होगा,
क्या बहन का स्कूल अब भी बंद होगा,
या टीचर आ रहे होंगे,
कितना शौक है उसे विज्ञान का,
क्या वे उसे पढ़ा रहे होंगे...
और उसकी प्यारी सी बीवी,
क्या दिन भर चौका ही करती होगी,
क्या उसे अब भी गिला होगा,
जब मनीआर्डर मिला होगा,
क्या उसने बिटिया को टीका लगवाया होगा,
उसके लिए तो डॉक्टर,
गाँव में ही आता है हर शुक्रवार,
पर गाँव के सरकारी दवाखाने में,
अक्सर नर्स नहीं रहती,
कभी उसका इंतज़ार रहता है,
कभी दवाई नहीं रहती,
क्या पिता को ज़मीन की नक़ल मिली होगी,
कहते थे पटवारी दारु की बोतल मांगता था,
क्या बरसात होती होगी,
बीज, खाद, यूरिया...क्या सब मिला होगा,
या सहकारी दुकानों में,
बस ताश का दौर ही चला होगा,
क्या वकील ने मुकद्दमे की,
नई तारीख ली होगी,
या पट्टीदार से ही मिलकर,
कोई नई चाल चली होगी,
क्या ऐसा हुआ होगा...क्या वैसा हुआ होगा..
क्या...क्या...क्या....
ये 'क्या' की जिंदगी है,
क्यों कुछ भी निश्चित नहीं है,
क्यों आम जिंदगी रोज़ तकलीफ में पलती है,
और कितनी भी कोशिश कर लो,
क्यों सरकार की व्यवस्था नहीं चलती है...
वह फोटो वापस बटुए में रख देता है,
दूरबीन से टेंट की खिड़की से दूर तक देखता है,
कोई दुश्मन नहीं है...कहीं भी इस बर्फ के सिवा...
पर आज कुछ अलग है शायद,
ये आसमां कुछ खुला खुला सा है,
एक हलकी सी रोशनी....
ये कैसी सुबह है...कहीं सूर्य है शायद,
एक किरण कहीं से फूट कर बर्फ पर पड़ती है,
और बर्फ चाँदी की तरह चमकती है,
उफ़ ! कितनी ख़ुशी...सूर्य की एक किरण..और इतनी आशा,
ख़ुशी में अपना रेडियो सेट खोलता है,
आज वह पहले कोई गाना सुनेगा,
खुले मौसम में श्रीनगर स्टेशन पकड़ता है,
आज वो रिपोर्टिंग बाद में करेगा,
कोशिश करने पर रेडियो घर्राता है,
कोई शोर में कुछ समाचार बताता है,
कहता है, आज जनता जीती है,
सरकार झुकी है,
अब अच्छी हुकूमत का,
इंतज़ार बस थोड़ा है,
कोई अन्ना हजारे है,
जिसने अनशन तोड़ा है,


Friday, August 26, 2011

बारिश का ठहरा पानी है

ये छिटके पोखर जो दिखते,
मौसम की महज़ रवानी है,
आँखों की कोई कहानी नहीं,
बारिश का ठहरा पानी है;

भावों में अक्सर बहकर,
हम दुःख को बहुत जताते हैं,
उंगली इस पानी पर रखकर,
आँखों से बहा बताते हैं;

सही समझ शुभचिंतक भी,
कुछ दयाभाव दिखलाते हैं,
पर वो भी सोचें इसके दुःख,
क्यूं बारिश में ही आते हैं;

ऐसा अधिक नहीं चलता है,
एक समय वह आता है,
आँखों का बहता दरिया,
तब बारिश ही कहलाता है;

इसीलिए मेरे प्यारे जन,
व्यर्थ न ऐसे काम करो,
सहानभूति कि लालच में,
आँखों को न बदनाम करो;

Wednesday, August 24, 2011

छोड़ो अब चिंता दर्पण क़ी

अब भी विश्वास नहीं होता,
कि इतने वर्ष व्यतीत हो गए,
कल तक जो तुतली लोरी थे,
आज सुनहरे गीत हो गए;

अब भी संचार करे सावन,
अब भी एहसास करे है तन,
पाया हमने चाहे जितना,
अब भी कुछ आस करे है मन;

छोड़ो अब चिंता दर्पण क़ी,
या हाथ छोड़ते यौवन क़ी,
घटते या उजले केशों क़ी,
छोड़ो अब चिंता भेषों क़ी;

अब व्यर्थ न हाहाकार करो,
बस मन का अपने श्रृंगार करो,
तुम अब भी वही धुरंधर हो,
बस इस जीवन से प्यार करो...

Monday, August 22, 2011

गिर कर संभलती है

मेरे कानों से घुलकर जो कभी छम छम सरकती थी,
तेरे पायल की आहट, अब ज़रा दब कर निकलती है;

हया है, या है गम, या शायद इल्म है मेरे इरादों का,
जो थी मदहोश सांसें, अब ज़रा घबरा के चलती है;

जो बातें गेसुओं सी, राह में सरगम लुटाती थीं,
सुरों को खोजती सी, अब ज़रा खामोश रहती है;

मिलन के आस की बदरी, सांझ अक्सर भिगोती थी,
विरह की ज़ुल्म बारिश, अब ज़रा खुलकर बरसती है;

निकल जाती थी आँखों से जो पल में बिजलियों सी,
पलक पर रात भारी, अब ज़रा रुक कर गुज़रती है;

मेरी किस्मत है ऐसी, या समय मजबूरियों का है,
जो गाती थी दिशायें, अब ज़रा छिप कर सुबकती हैं;

मगर ये भ्रम न रखना, आइनों सा टूट जाऊंगा,
बड़ी जिद्दी शक़ल है, अब ज़रा फिर से संवरती है;

बहुत देखी हैं रातें, गम बहुत सा पी लिया नीरज,
मेरी फ़ितरत है ऐसी, अब ज़रा गिर कर संभलती है;


Thursday, August 18, 2011

on anti corruption movement led by anna hazare

बेफिक्र हम सोते रहे, और गालियाँ देते रहे;
सोचते थे कि एक दिन कोई रहनुमा आएगा,
अब तो जागो वरना गालियाँ भी न दे पाओगे,
कोई अन्ना रोज़ तुम्हे जगाने नहीं आएगा....
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न समय विराम का है, न समय विश्राम का है,
धूल उड़ती दिख रही है, ये समय संग्राम का है;
कोसते थे जिस प्रथा को, आज वह दुबकी पड़ी है,
हौसलों के सामने वो सहमी सी औंधी गिरी है,
चूक अब होने न पावे, बाँध लो अपनी कमर तुम,
भूल अब होने न पावे, कर दो मौके को अमर तुम,
दिख रहा है एक मंजर, संघर्ष आम इंसान का है,
खो लिया जितना था खोना, अब समय परिणाम का है.

Friday, August 12, 2011

आज फिर सूरज नहीं निकला

आज फिर सूरज नहीं निकला,
जैसे रह गया हो हिसाब कोई पिछला,

कहीं भी न गरीब कि गुहारें दिखीं,
जहाँ तक देखा रेशमी फुहारें दिखीं,
कहीं तो न फ़िक्र कि उसका भीगता जूता है,
कहीं टीन की छत से अब भी पानी चूता है,
कहीं पर भीगा कोई अब भी सपन रोता है,
कहीं कोई बारिशों में ओढ़ चादर सोता है,
कहीं कोई छतरियों की ओट में निकला,
कहीं कोई चढ़ शिखर पर अंत में फिसला,

आज फिर सूरज नहीं निकला,
जैसे रह गया हो हिसाब कोई पिछला,



Wednesday, August 10, 2011

आधा ही हमने पाया है

बार बार ख्याल आता है,
कि कितना आधा हूँ मैं...
आधा मिथ्या,
आधा सत्य,
आधा ख्वाब,
आधा तथ्य,
आधा बच्चा,
आधा बड़ा,
आधा झुका,
आधा खड़ा,
आधा जवान,
आधा बूढा,
आधा अँधा,
आधा बहरा,
आधा अमीर,
आधा गरीब,
आधा खुश,
आधा दुखी,
आधा प्रेम,
आधा द्वेष,
आधा सफल,
आधा क्लेश,
आधा प्राप्त,
आधा हरण,
आधा जीवन,
आधा मरण,
किसी न किसी रूप में,
हम सब आधे हैं,
कोई जाने या न जाने,
हम जानते हैं,
किसी से कहें नहीं,
पर हम मानते हैं,
हमारी आज कि,
गतिविधि आधी है,
चाहे दोनों आँखों से देखें,
या दोनों कानों से सुनें,
पूरे का आभास देती,
ये दुनिया आधी है,
इसे आधी भी हमने बनाया है,
संस्कार और इच्छाओं के बीच,
सामंजस्य हमने बैठाया है,
जो अच्छा लगे वह अच्छा,
जो बुरा लगे झुठलाया है,
जो परेशान है करती,
यथार्थ नहीं वो काया है,
आधे के हैं भोगी हम,
आधा ही हमने सोचा है,
आधे को बस मन में रख,
आधा ही हमने पाया है...

Monday, August 8, 2011

कैसा न्याय है विधाता

लगातार बत्ती जलती रही,
छाया रहा अँधेरा,
पता ही न लगा,
कब भोर,
कब रात हुई,
जब भी आँख खुली,
बाहर बरसात हुई....

आसमां कैसा है,
पनाह देता है बादलों को,
और देखता है,
तरल होती है धरती,
हरी होती है परती,
आसमां कुछ नहीं पाता,
कैसा न्याय है विधाता....

ऐसा ही जीवन है,
किसी को निचोड़ देता है,
तो कोई सोख लेता है,
किसी पर गरजता है,
तो किसी पर बरसता है,
और कोई सबकुछ देकर,
उम्र भर तरसता है.....

प्रतीक्षा (written on 30-12- 1992)

एक चिथड़ा भी कितना बड़ा सुख हो सकता है यह मैंने उस रात जाना था I उस रात जब निर्मल वर्मा की उस किताब से मैं पल भर भी आँखें नहीं उठा सका था I सुबह उठा तो अनायास ही एक बेचैनी मन में समा आई थी I बाहर सब सफ़ेद था; वह आमों का बाग़, स्कूल जाने वाली पगडण्डी, लाल टीन की छत वाला मकान, कुछ भी नहीं दिखाई देता मकान के छज्जे से I सब तरफ कोहरा; सफ़ेद, धुंधला तैरता हुआ सा बेचैन कोहरा I कितना आश्चर्यजनक था कि जब मैं सोता रहा, तो कोहरा धीरे धीरे सिमटता रहा धरती कि छाती पर I
 'दृष्टि' अदृश्य वस्तुओं को देखने कि कला है, जिसका मेरे अन्दर सदा अभाव रहा है I कहीं से सूर्य कि एक किरण चीर देती है कोहरे को; लाल तीन कि छत कि रुपरेखा बह आती है वातावरण कि ढलान पर I बगल का कुआं अभी भी अदृश्य है; मौन, निश्तब्ध क्योंकि बाल्टियों कि खडखडाहट कहीं से भी सुनाई नहीं पड़ती I आज भी वह छोटी लड़की खड़ी होगी फुटपाथ पर, बस्ता लेकर साथियों कि प्रतीक्षा में; 'प्रतीक्षा' अंतहीन और निरंतर......!
कोहरा शायद थक गया है क्योंकि भागने लगा है; थकने के बाद भागना मुझे मुश्किल प्रतीत होता है I जो दूसरों के लिए आसान होता है वो सदा मुझे मुश्किल क्यों प्रतीत लगता आया है ? गेहूं के हरे पौधों पर ओस कि बूंदें एक मृगतृष्णा सा भ्रम देती हैं आँखों को; ....फिर वह नज़र आती है जिसे मैं रोज़ देखता हूँ कुएं पर; वह मुझे छज्जे पर खड़ा देखती है और आँखें नीची कर पानी भरने लगती है I अचानक लगता है जीवन फिर चलने लगा है; उत्सुक परन्तु थोड़ा सा आतंकित.....! बच्चों की भीड़ पगडण्डी पर उतर आती है; ये अब स्कूल जायेंगे और रास्ते में आंवले की बाग़ से भरपूर आंवले तोड़ेंगे; कुछ को खायेंगे, कुछ से खेलेंगे I कोई दांत दे तो गाली अलग से सुने I तब वह काया उतर आती है कुएं के चबूतरे से; कमर में गगरी और एक हाथ में बाल्टी; एक दौड़ती सी नज़र ऊपर आती है और फिर गड़ जाती है ज़मीं पर, मगर खिसकती रहती है I पानी और शर्म के बोझ तले वह निगाह सरकती जाती है और मुझे पुनः इंतज़ार रहता है अगली सुबह का I
जाड़ा...और जाड़ा ! रात भर का सिकुड़ा शरीर जब सुबह थोड़ा फैलता है तो अदभुत जान पड़ता है; कैसे सिकोड़ लेते हैं हम इतने बड़े शरीर को चंद चीथड़ों में; शाम होते ही...सवेरे तलक I जाड़े की धूप से प्यारी वस्तु शायद आशायुक्त असफलता ही होती है,; ऐसा मेरा सोचना है I हल्की सी धूप अलसाई आकृतियों पर उभर आई है; फिर वह तीन मिटटी के घड़े दिखाई देते हैं ; लटके हुए आम के पेड़ पर...प्रतीक्षा करते हुए I आज भी इन्हें ऐसे ही झूलते रहना है I कल इन्हें फोड़ दिया जाएगा और साथ ही समाप्त हो जायेगी तीनो बेटों की डयूटियां मरे हुए पिता के प्रति I वह व्यक्ति जो बहुत बड़ा पहलवान हुआ करता था, कितना बेबस था मृत्यु के समय ! आँखें सब गीली थीं; कुछ चिंता से, कुछ राहत से I कभी कभी किसी के मर जाने से कितनी राहत मिलती है, यह मैंने उस दिन महसूस किया था I  अग्नि में समा गया था वह हड्डियों का ढांचा नब्बे सावन झेलने के बाद :   बिना किसी प्रतिरोध के, मानो इसी की प्रतीक्षा थी I
अचानक दिन भागने लगा है; खेत सींचता वह किसान, घास काटती वह लड़की और उपले बनती वह स्त्री, सब देखते हैं इस भागते हुए दिन को I मैं छज्जे से उतर आटा हूँ पर सोचता रहता हूँ उन लटके हुए मटकों के बारे में; और उस सरसराती निगाह के बारे में जिसका मुझे पुनः इंतज़ार रहेगा I
भूल जाता हूँ उस जाड़े की रात जब एक किताब लेकर कई घंटे लालटेन को कष्ट पहुँचाता रहा और फिर उसे यूँ बुझा दिया जैसे यह मेरा हक़ था; बरबस, क्रूरता से I
दिन चढ़ आया है और मैं उन कारीगरों और मजदूरों को देखता हूँ, जो मेरा मकान तैयार कर रहे हैं I उनके लिए हर दिन एक सा है ; ईंट, सीमेंट, रेत और मिटटी; और उनके बीच दबी दो रोटी और अचार, या शायद एक प्याज....I इनकी प्रतीक्षा रोटी की बुनियाद पर तैरती है I ईंट से ईंट जुड़ते देखता हूँ और वर्षों से कहीं दिल में छिपी प्रतीक्षा को मुस्कुराते देखता हूँ I हर ईंट पड़ोसियों के कलेजे पर भी पड़ते देखता हूँ और बरबस एक दुःख मिश्रित हंसी होठों को घेर लेटी है I सब बेकार लगता है; बाजरे की फसल की तरह जो खेतों में ही सूख रही है और जिसे अब भी प्रतीक्षा है कट जाने की I  कब तक ! आखिर कब तक इंतज़ार रहेगा; सुबह तो रोज़ आएगी; कभी धुंधली तो कभी भीगी हुई I  अनायास पुनः सब भागने लगता है; आँखों के सामने I कुँए पर बाल्टियों की खडखडाहट, कोहरे को चीरता वह आमों का बाग़, लाल टीन की छत, वह छोटी लड़की, फुटपाथ पर खड़ी हुई, बस्ता संभाले....प्रतीक्षा करती हुई............I  
Neeraj   30 December 1992

Sunday, August 7, 2011

तुम मेरे दोस्त हो शायद

तुम मेरे दोस्त हो शायद,
दोस्त ही होगे...
वरना तुम क्यों बार बार मेरा हाल पूछते,
क्यों मेरी उखड़ी साँसों को सींचते,
क्यों तुम अपना नहीं बताते,
क्यों मेरा सुन कर पछताते,
क्यों आँखों से मेरे बहते,
क्यों नींदों में मेरे जगते,
क्यों तुम मुझको देते दिलासा,
जब तुमको भी नहीं थी आशा,
क्यों तुम इतना समय गंवाते,
संग मेरे बच्चे बन जाते,
क्यों तुम मुझ पर गुस्सा करते,
दूर चले जाओगे, कहते,
पर तुम कहीं नहीं जाते हो,
नैन बंद, नज़र आते हो,
जब की लहू भिन्न है मुझसे,
सोचूं क्या रिश्ता है तुझसे,
तुम मेरे दोस्त हो शायद,
दोस्त ही होगे...

Thursday, August 4, 2011

सपनों से सपनों तक

मुझे आज भी नहीं भूलें हैं चंडीगढ़ के वे दिन जब पिताजी मुझे गाँव से वहां ले गए I उद्देश्य था मेरी शिक्षा I यूँ तो मैं गाँव की पाठशाला में भी कुछ दिन पढ़ा था, पर उसकी यादें अब काफी धूमिल पड़ चुकी हैं I एक तख्ती, दुद्धी (सफ़ेद स्याही) और सन की बनाई कलम लेकर क, ख, ग पढना सीखा था मैंने गाँव में I पर मेरे पिताजी घर में सदा ए, बी, सी पढाया करते I एक नन्हा सा दिमाग अचरज करता कि पाठशाला और घर की पढाई में ये अंतर क्यों है ? गाँव की पाठशाला में हमें दोपहर को कुछ खाने को मिलता I मुझे ठीक से याद तो नहीं कि वो क्या था पर उसकी शक्ल कुछ कुछ साबूदाने सी थी I हम बच्चे कतार में बैठ कर अपनी रूमाल या कोई कपड़ा या  कभी कभी बनियान सामने बिछा देते I फिर एक बंद मुट्ठी उस पर खुल जाती और हम बड़े चाव से उन दानों को खाते I एक दिन मैं रूमाल भूल गया और उस चाइनीज़ डिश को अपनी छोटी सी अंजुलि में लेते वक़्त उसके कई दाने नीचे गिर गए, जिसका मुझे काफ़ी दिनों तक अफ़सोस रहा I  एक दिन मेरी तख्ती किसी ने चुरा ली और मैं और दीदी दोनों रोते हुए घर लौटे I शायद हम वस्तुओं कि कीमतें आंकना जानते थे उन दिनों I ख़ैर इसके सिवाय मुझे कुछ याद नहीं I

हमने पाठशाला भी कहा, विद्यालय भी और स्कूल भी, जो भी आसान सा लगे I चंडीगढ़ आने के पश्चात् मुझे पता चला कि मुझे स्कूल में पढने जाना पड़ेगा I सुबह सुबह जब मैं पार्क में फिसलन पट्टी पर झूलता, तो सोचता कि यदि एक ऐसा झूला गाँव में होता तो क्या मज़ा आता I मैं छोटे बड़े बच्चों को एक सी पोशाक पहन बस्ता लिए स्कूल जाते देखता और सोचता कि इनकी पाठशाला में निश्चय ही कुछ अच्छा खाने को मिलता होगा I बचपन में पढाई के मायने अलग होते हैं I एक दिन पिताजी मुझे काफ़ी समझा बुझा कर एक स्कूल में ले गए I मेरा एडमिशन टेस्ट होना था I उस स्कूल की सारी दीवारें लाल थीं, हर खिड़की पर चमकीले शीशे लगे हुए थे, और इतने सारे फूल लगे थे की मन करता कि इन सब को तोड़कर गाँव में सरसों के खेतों में फेंक  दूँ I फिर उसमे भी रंग बिरंगे फूल हो जायेंगे; उन अनगिनत पीले फूलों के बीच I मुझे गाँव कि पाठशाला याद आई जहाँ एक बड़े पेड़ के नीचे हम सभी अधनंगे बच्चे बैठकर  क ख ग इतनी ज़ोर से चिल्लाते थे मानो लगता था आकाश धरती पर आ जाएगा I सहसा मेरे इंटरव्यू का नंबर आ गया और मुझे एक कमरे में धकेल दिया गया जहाँ स्लीवलेस ब्लाउज और चमकदार साड़ियाँ पहने दो महिलाएं बैठी थी जिन्हें टीचर कहते हैं I वो काफ़ी देर तक मुझसे प्रश्न करती रहीं और मैं चुपचाप खड़ा उनकी अवहेलना करता रहा I न मुझे उनकी भाषा समझ आती, न उन्हें मेरी I अजीब स्थिति थी; ख़ैर मैं उस  इंटरव्यू  में फेल हो गया और पिताजी ने अपना सर पीट लिया I औलाद न होने से बदतर है नालायक औलाद होना I उस समय मैं कोई पांच वर्ष का था I

कुछ दिनों बाद ही मेरा एडमिशन केंद्रीय विद्यालय सेक्टर ३१ में हो गया I यह कैसे हुआ ये तो मुझे याद नहीं पर इतना अवश्य था कि बिना नर्सरी और  के.जी पढ़े मैं सीधा पहली कक्षा में जा बैठा था I आजकल ऐसा होना अत्यंत दुर्लभ है I ज्ञान अर्जित करने हेतु कितना अधिक कम्पटीशन है ; लोअर के.जी से लेकर पी.एच. डी तक I स्कूल में जाते ही मेरी कायापलट हो गयी I पहले दस दिनों तक तो पता ही न चला कि क्या हो रहा है I मेरी ग्रामीण माँ रोज़ प्रातः मुझे नहला कर, साफ़ कपडे, काले चमकते जूते पहनाकर, ढेर सारा काजल लगाकर और मुहं पर पाउडर पोतकर स्कूल भेजती और गर्व करती कि मेरा लड़का कितना सुन्दर और साफ़ है I जब जब मैं अपनी पहली कक्षा कि ग्रुप फोटो देखता हूँ, बरबस एक हंसी आ ही जाती है I मैं एकदम आगे बैठा हूँ, तनकर, क्योंकि वह कैमरा मेरे लिए कोई जादू के पिटारे से कम आश्चर्यजनक वस्तु न थी I बिलकुल छोटे बाल जैसे उनके बढ़ने पर टैक्स लगा हो; काजलयुक्त आँखें, और एक चेहरा जिसका यदि कोई 'तेज़' है तो पाउडर ने ढक रखा है I ऊपर से उज्जवल, साफ़ पोशाक I यदि माँ का वात्सल्य तस्वीरों में झलकता है तो यह फोटो एक सजीव उदाहरण है I क्या हुआ जो उस माँ ने कभी स्कूल नहीं देखा या कभी शहर में नहीं रही ; अपने सीमित दिमाग से उसने अपने बेटे के लिए जो भी सोचा और किया वह स्वयं में एक बहुत बड़ी उपलब्धि न होते हुए भी अत्यंत मर्मस्पर्शी व वात्सल्यपूर्ण है I मन तो करता है कि उस फोटो को माँ के सामने रखूं और कहूँ कि ; माँ ये मैं नहीं तुम हो I पर मैं ऐसा नहीं करता क्योंकि अपने आसपास के लोगों कि बातों से मैं महसूस करता हूँ कि अब मैं बड़ा हो गया हूँ I पर क्या माँ से भी बड़ा हो गया हूँ !

चंडीगढ़ में मैं तीन साल पढ़ा I मेरे घर के सामने मेरे ही क्लास कि एक लड़की रहती थी; उर्मिला I कभी कभी जब खिड़की के पास बैठकर मैं होमवर्क करता तो वो मुझे अपने घर की खिड़की से चिढ़ाया करती I मुझे बहुत गुस्सा आता और मैं उसे गाली देता; 'साली' ! शहर में सीखी यह मेरी पहली गाली थी I सात बरस की उम्र में मैंने यह लफ्ज़ कहाँ से सीखा, यह तो मुझे याद नहीं पर उस समय यह एक गन्दी गाली हुआ करती थी I स्कूली बच्चों के बीच इस गाली का एक ख़ास महत्व था I आजकल गालियों में भी काफ़ी उन्नति हो गयी है I परिवर्तन प्रकृति का नियम है I फिर चाहे वह अच्छा हो या बुरा; हमें इससे क्या ? हम तो सहज भाव से कह देते हैं; ज़माना बदल गया है I इतनी बड़ी कर्त्तव्यहीनता क्या किसी और प्राणी में देखी जा सकती है ?

तीसरी कक्षा में मैं स्कूल में प्रथम स्थान पर रहा I यह एक चमत्कार से कम कुछ भी नहीं था I मेरे माता पिता बहुत खुश थे I अपने बेटे के उज्जवल भविष्य के सपने का पहला सकारात्मक कदम महसूस किया था उन्होंने I बीस साल तक माँ बाप यूँ ही सपनों को टूटते और जुड़ते देखते रहते हैं I बाद में यदि सपना साकार हो जाता है, तो बेटा कमाने विदेश चला जाता है, या लव  मैरिज कर कहीं सेटल हो जाता है I यदि सपना टूट जाता है तो बाप खिलाता है बेटे को, जब तक बाप की हड्डियाँ गल नहीं जाती I कितना सरल है यह सब I

चंडीगढ़ से मेरे पिताजी का स्थानांतरण हैदराबाद हो गया I चौथी, पांचवी और छठी कक्षा मैंने एयर फोर्स अकादमी से उत्तीर्ण की I इस स्कूल की यादें हालाँकि इतनी ताज़ी नहीं है, लेकिन फिर भी यहाँ बिताया समय मेरे आने वाले जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा I चंडीगढ़ छूटने के साथ ही मेरा क्लास में प्रथम स्थान भी छूट गया I मैं क्लास में पांचवे या छठे स्थान पर रहता और संतुष्ट भी रहता I दयनीय है वह विद्यार्थी जो अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट रहता है I यहीं पर मैंने क्रिकेट खेलना शुरू किया I हर छुट्टी में मैच खेलते; अक्सर जीतते, हारने लगते तो झगडा कर लेते I हार से बचने के लिए कोई अच्छा बहाना तो चाहिए ही था I यहीं मैंने अपने जीवन का पहला नाटक किया I स्कूल के प्रोग्राम में वह नाटक खेला गया और उसमे मेरा छोटा सा रोल था I एक परिवार का स्कूल जाने वाला एक बच्चा जिसे स्कूल ड्रेस की नेकर नहीं मिल रही I वह और उसके सात भाई बहन इकलौती माँ को परेशान कर रहे हैं; अपनी अपनी समस्याओं से I मुझे वह नाटक इसलिए अच्छा लगा क्योंकि उसमे कई बच्चे थे और बहुत हल्ला गुल्ला था I तब मुझे फॅमिली प्लानिंग के माने पता नहीं था I

इसी स्कूल में मैंने एन सी सी ज्वाइन की I उस समय बड़ा मज़ा आता जब परेड करने के बाद समोसे खाने को मिलते I हैदराबाद में मुझे जो सबसे अच्छा काम लगता था, वह था पतंग लूटना I वहां पतंगें खूब उड़ती और कटती I लगभग दस दिन असफल होने के बाद एक पतंग मेरे हाथ लग गयी और मैं उसे दो दिनों तक उड़ाता रहा I कहीं अगल बगल यदि पतंग उड़ते देखता तो फ़ौरन अपनी पतंग नीचे उतार लेता, इस डर से की कहीं मेरी पतंग कट न जाये I दस दिनों की मेहनत पर यूँ ही पानी नहीं फेरना चाहता था मैं I फिर एक दिन मैंने दो लड़कों के साथ मिलकर मांजा बनाया I कांच को पीसकर लेई के साथ मिलाकर धागे पर उसका लेप किया I अब मैं पतंग उड़ाने के लिए तैयार था I पहली ही लड़ाई में मेरी पतंग कट गयी और अपलक मैं देखता रहा अपनी मेहनत और ख्वाबों को लुटते हुए I उसके बाद मैंने पतंग कभी नहीं उड़ाई I हाँ, अक्सर बैठकर पतंगों को कटते और काटते देखता रहा I हिम्मत और मेहनत कहीं दुबकी पड़ी थी और इसका मुझे एहसास था I

यहाँ मैंने कई खेल खेले I गिल्ली डंडा, कंचे से लेकर क्रिकेट और फुटबाल तक I एक बार फुटबाल मेरे पेट पर लगी और कुछ पल के लिए मेरी सांस ही बंद हो गयी I मुझे लगा की यही अंत है ; मुझे वहां जाना है जहाँ धरती और अंबर मिलते हैं ; जहाँ धरती समाप्त हो जाती है I पर ऐसा न हुआ I मैं जीवित रहा और मैंने कई उम्मीदों को जीवित रखा I यहीं मैंने साईकिल चलाना भी सीखा I कई दिनों तक अपनी इस उपलब्धि पर मैं गर्व करता रहा I एक दिन मैं साईकिल समेत गिरा और अपनी उन चोटों को घर में छिपाने की असफल चेष्टा करता रहा जो एक अँधा भी पहचान सकता था I फिर यहाँ तो मेरी माँ थी; मेरे खुशहाल जीवन की शुभचिंतक I मैं चोटें खाता रहा और माँ उन्हें ठीक करती रही I फिर एक दिन मैं वह स्कूल, पतंग, एन सी सी सब छोड़ कर अपने माँ बाप भाई बहन के साथ बागडोगरा आ गया I

बागडोगरा बंगाल में एक छोटी जगह है सिलीगुड़ी के पास I अपने आप में यह छोटी जगह एक समूचा विश्व है; अनोखा और चमत्कारिक I यहाँ की तीस प्रतिशत जनसँख्या नेपालियों की है I किसी भी गली मोहल्ले से गुजरते वक़्त यदि बैंजो वाद्ययंत्र की धुन कानों को छेड़ दे तो निश्चित ही वहां नेपाली रहते होंगे I मुझे वहां दाखिला मिला केंद्रीय विद्यालय बेंगडुबी में, जो की एयर फोर्स स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर दूर था I आरम्भ के पांच छः महीने हम एयर फोर्स स्टेशन के बाहर रहे, किराये के मकान में I एक कमरा और किचन समेत समेत बंगला था वह जिसमे हम पांच प्राणी अडजस्ट करते थे I यह मकान पूरी तरह से लकड़ी का बना हुआ था और उसे ठोंक बजाकर यह अंदाज़ा लगाया जा सकता था की इसकी मरम्मत अगले हफ्ते करनी होगी या अगले महीने I जो भी हो यह हम बच्चों की चिंता का विषय नहीं था I मैं वहां खुश था I मकान मालिक के यहाँ नया नया टी वी आया था और माँ के मना करने के बावजूद मैं अक्सर चोरी छिपे खिड़की के परदे को थोड़ा सा हटाकर उस अद्भुत मानवीय आविष्कार को देखा करता जो आज निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों का फैमिली मेम्बर बन चुका है I हमारे घर के पीछे एक छोटी सी नदी थी; मेरी उत्सुकता का प्रमुख केंद्र I अक्सर मैं उसमे नहाता और मछुआरों को बड़े बड़े जालों में मछलियाँ पकड़ते देखता I वहां जीवन बहुत शांत और स्वच्छ था; उस नदी के शांत बहते पानी की तरह I
स्कूल ले जाने के लिए रोज़ एयर फोर्स की बस आती I यह स्कूल काफ़ी बड़ा था और इसकी बिल्डिंग बहुत ही आकर्षक I इस स्कूल में गुज़ारा समय मैं कभी नहीं भूल सकता I यहाँ मुझे पूरी छूट थी I घर स्कूल से बहुत दूर था I अक्सर हम सहपाठी मध्यान की घंटी बजते ही बाहर भाग जाते और पास ही के सिनेमा हॉल में पिक्चरों के पोस्टर देखते I या फिर घास पर बैठ कर लंच करते; और उन चीलों को भी कराते जो हमारे सर पर मंडरा रहे होते I मजाल थी की कोई रोटी का टुकड़ा ऊपर फेंक दो और वह वापस धरती पर आ जाये; यदि न्यूटन ने देखा होता तो पागल हो जाता I सातवीं कक्षा में मैं तीसरे स्थान पर रहा और खुश होकर मेरे क्लास टीचर मिस्टर मालिक ने मुझे एवं दो और विद्यार्थियों को पुरस्कार स्वरुप एक एक फोंटेन पेन दिया I वह पेन काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रहा I कुछ सालों बाद एक बार संगम पर नाव में सैर करते वक़्त वह पेन पानी में गिर गया और उसके साथ ह बह गयी वो यादें जो एक शिक्षक ने छोड़ रखी थी एक विद्यार्थी के दिल में I इस स्कूल में मैंने कई खेल खेले; पर हमारा मन पसंद खेल था गैलरी I यह खो खो से मिलता जुलता एक खेल है पर यह स्कूलों को छोड़ कर और कहीं नहीं खेला जाता I इस स्कूल में मैं आठवीं कक्षा तक पढ़ा I बागडोगरा की यादें मेरे अन्दर अभी तक ताज़ा है I ढेर सारे पहाड़ी पिकनिक स्थल, छोटी छोटी पहाड़ी नदियाँ, उनमे से पकडे हुए केकड़े, धारा के बहाव के उल्टा तैरती हिल्सा मछलियाँ, नेपाल के रास्ते का वह जंगल और उसमे रहता हाथियों का झुण्ड, वो चीता जिसे आदिवासियों ने पकड़ कर स्कूल के आस पास घुमाया था, सब याद है मुझे I बागडोगरा का वह हाट (बाज़ार) जहाँ एक रुपये में तीस नीम्बू मिलते थे और इतने ही पैसे देने पर सात अन्नानास के फल, क्या कभी भुलाया जा सकता है I कुल मिलाकर वह एक ऐसी जगह थी जिसके बारे में  लिख पाना मेरे लिए अत्यंत मुश्किल है I  कुछ जगहों को मात्र अनुभव किया जा सकता है और बागडोगरा उनमे से एक है I फिर एक दिन वह सब छूट गया I ट्रेन में बैठा हुआ मैं हरी घाटियों को पीछे छोड़ता गया I बेचैन मन यह महसूस कर रहा था की वे नदियाँ अब भी बह रही होंगी, दोस्त अब भी केकड़े पकड़ रहे होंगे, नीम्बू रुपये में तीस बिक रहे होंगे या शायद उससे भी ज्यादा, हाथी अब भी झुण्ड में निकलते होंगे; बस मैं उन सब को देख नहीं पाउँगा I मैं बहाव के उल्टा जा रहा था; हिल्सा मछली की तरह I उदास मन से मैं तब तक बागडोगरा के विषय में सोचता रहा, जब तक मैं उस नयी जगह नहीं पहुँच गया I उस जगह को देखते ही मुझे पता चल गया की यहाँ मेरा भविष्य लिखा जाएगा I माँ बाप के सपने भी शायद यहीं टूट जाएँ I और भी शायद बहुत कुछ यहीं होगा I जगह का नाम कुछ अटपटा सा था; ' कलाईकुंडा '  I  

बंगाल में ही खड़गपुर से लगभग बारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है एयर फोर्स स्टेशन कलाईकुंडा I यूँ तो यहाँ देखने लायक कुछ नहीं है पर वह व्यक्ति जो दृष्टि रखता है, उसके लिए यह जगह किसी रोम, परिस या लोस अन्जेलिस से कम नहीं है I दृष्टि, जैसा की मैंने अपने किसी लेख में लिखा था, अदृश्य वस्तुओं को देखने की कला है I गार्ड रूम से शुरू होती सड़क, जिसे हम माल रोड कहते थे, दूसरे छोर तक जाती है I इसी के अगल बगल घर, सिनेमा हॉल, स्विम्मिंग पूल, ऑडिटोरियम, अस्पताल, दुकानें सब हैं I यह माल रोड शिमला की माल रोड से किसी भी मायने में कम नहीं है I इसके किनारों पर व्याप्त जीवन हर समय और ख़ास कर के शाम को उमड़ पड़ता है इस सड़क की लम्बाई पर I गार्ड रूम से बाहर भी घर हैं, काली मंदिर की तरफ, या फिर आशु कैंप, छोटे से रेलवे स्टेशन से चिपका हुआ; सब तरफ फौज़िओं का वास है I गार्ड रूम से निकलते हुए ही स्कूल है I यहाँ दो स्कूल हैं; एक कैंप के बाहर और दूसरा अन्दर I बाहर वाले स्कूल में मेरा एडमिशन नवीं क्लास में हो गया I स्कूल की बिल्डिंग काफ़ी पुरानी थी, पर साथ में एक नई बिल्डिंग भी लगभग तैयार हो गयी थी I ये अलग बात है की उसमे पढने के लिए दो साल का इंतज़ार करना पड़ा I

इस जगह ने मुझे सब कुछ दिया; दोस्त, सफलता, असफलता, दुःख, सुख, आशा, निराशा और प्यार I यहाँ बिताये दिन मैं कभी नहीं भूल सकता I आज यदि किन्ही लम्हों को पुनः जीने की आकांशा उठती है, तो निश्चित ही यहाँ गुज़ारे पल हैं I जंगलों में घुस कर बेर तोड़ना, किसी के घर में लगे आम या अमरुद उड़ा लेना, पढने के बहाने जाकर क्रिकेट खेलना या देखना अथवा सब्जी बाज़ार से गन्ने या नारियल चुरा लेना; आज अपने आप में ये कार्य कितने ही तिरस्कृत क्यों न लगें, एक समय था जब मैं इन्हें पूरी निष्ठां और लगन से किया करता था I और उस समय मैं खुश रहता था I काम चाहे अच्छा हो या बुरा, सफलता मिलने पर ख़ुशी होना स्वाभाविक है I यही कारण था कि चाहे किसी के पेड़ के पपीते कच्चे ही क्यों न हों, हमें बड़े मीठे लगते I

स्कूल भी अजीब था I  अभी कुछ ही दिन हुए थे कि स्कूल में हड़ताल हो गयी I प्रिंसिपल व किसी टीचर में झगड़ा हो गया था I महिना भर स्कूल बंद रहा और हम बच्चों कि किस्मत खुली रही I फिर एक दिन अचानक पता चला कि समझौता हो गया है और स्कूल खुलने वाला है I मेरे लिए अब तक सुनी सब से बुरी ख़बरों में यह एक थी I नवीं कक्षा पास करने के बाद मेरे कई दोस्त बने इआज उनमे सुकेश, राजेश और सुपर्णा ही हैं जो उन दिनों कि याद को ताज़ा कर पाते हैं I यूँ तो और भी हैं जो अब तक संपर्क जोड़े हुए हैं, पर उनमे वो गुज़रे दिन नहीं झलकते I शिखा हालाँकि आज भी शुभचिंतक और निश्चल है पर उसे मात्र पत्रों के ज़रिये महसूस करना मुश्किल है I विज़ु बाईसवीं सदी कि लड़की है और मुझे दुःख है कि समय से पूर्व इस प्राचीन दुनिया में उसकी आधुनिकता का टेलेंट वेस्ट हो रहा है I अमित, सुब्रोतो, ज्योति, अर्पण, दिनेश, राकेश, जयश्री ऐसे न जाने कितने नाम रास्ते में ही खो गए I जब पुनः कोई मिला भी तो हमारे रास्ते अलग दिशाओं में जाते थे I

दसवीं कक्षा में मैं स्कूल में तीसरे स्थान पर रहा और मेरे माता पिता और टीचरों ने भी मेरे अन्दर एक उज्जवल भविष्य देखा I कुछ तो इस हद तक कह गए कि यह लड़का अद्वितीय है I पढाई और खेल के अलावा भी एक सम्पूर्ण मानव में जो खूबियाँ होनी चाहिए वो इसमें हैं I या तो वे सब मूर्ख थे जो ऐसा कह गए, या मैंने अपने गुणों को उस कोण से नहीं देखा जहाँ से वे देखते थे I आने वाले दो सालों में मेरे दो प्रेम प्रसंग हुए I यूँ शुद्ध हिंदी में इन्हें लव अफैर्स कहते हैं I आज ये मेरे लिए पुरानी बातें हैं, पर उन दिनों ये मेरी साँसे थीं I हो सकता है वो धीमी और उखड़ी हुई ही साँसें हों, पर निश्चित रूप से मैं उनमे जी रहा था I अस्सी योनियों के बाद भी यदि मुझे पुनः मानव आकृति प्राप्त हुई तो मैं उन घड़ियों को अनगिनत बार जीना चाहूँगा I चाहे प्रत्येक बार इसी तरह असफल क्यों न होना पड़े I कम से कम उतने समय एक आशा तो थी; हलकी सी ही सही पर विश्वास कि मज़बूत बुनियाद पर टिकी हुई I

बाराहंवी क्लास तक पहुँचते पहुँचते मेरी पढाई चौपट हो चुकी थी I नतीजा यह हुआ कि बारहंवी कक्षा में मैं एक विषय में फेल हो गया I स्कूल कि रिज़ल्ट की भाषा में इसे 'कम्पार्टमेंट' कहते हैं I 'फेल' और 'पास' के बीच का वह सत्य, जिसमे न प्रोत्साहन है और न ही सहानुभूति, और जिसे धोने के लिए पुनः उसी विषय का इम्तिहान देना पड़ता है, जो इस रिज़ल्ट का कारण है I यदि मैंने जीवन को बहुत पास से देखा है तो अवश्य उन दिनों ही था I माँ चुप रहती जैसे मौन व्रत हो, पिताजी की अवस्था अचानक ही बीस साल अधिक लगने लगी, टीचर ऐसी त्रिअस्कृत निगाहों से देखते मानो उनका प्रमोशन मेरे कारण रुक गया हो, दोस्त वहां थे ही नहीं, जो थे उनकी पहचान हो गयी I कोई यह न कहता की क्या करो; सब यही कहते की क्या कर दिया ; और समय लगता था तब रुक गया हो I चार साल का आनंद एक ही पल में याद आ गया मुझे I दोस्त, सफलता, असफलता, दुःख, सुख, आशा, निराशा, प्यार सब खोखले लगने लगे I मुझे लगा की मुझे स्वयं से घृणा हो गयी है I जब सपने टूटते हैं तो आवाज़ नहीं करते; और शायद इसीलिए ज्यादा चोट करते हैं I मुझे वह समय भी याद आया जब एक तख्ती लेकर उस पर काला रंग पोतता रहता था ताकि सफ़ेद स्याही और सफ़ेद दिखे I वहां से यहाँ तक का सफ़र काफ़ी लम्बा था पर मुझे अफ़सोस रहा कि इतना लम्बा रास्ता तय करने के बाद भी मैंने स्वयं को वहीँ खड़ा पाया जहाँ तेरह साल पहले खड़ा था I यदि यह स्थिरता का उदहारण नहीं है तो विश्व में कुछ भी स्थिर नहीं है I

आज यदि मुझे अपनी इस स्कूल लाइफ के अंतिम चरण को पुनः जीने का मौका मिले तो मैं निस्संकोच जिऊंगा I ऐसा इसलिए कि उस समय मैंने एक कायरता का परिचय दिया था जिसे मैं सुधारना चाहता हूँ I मैंने किसी तरह  बाराहंवी पास कि थी और वायु सेना में भारती हो गया था I हार कर नहीं, झुंझला कर I यूँ कहने को तो मैंने नौकरी कर ली थी पर आज भी साधे पांच साल बाद मैं यह जानता हूँ कि मैं तब भाग खड़ा हुआ था जब मुझे टिक कर लड़ना था I

लगभग एक महीने पश्चात् मेरा विवाह होना तय हुआ है I कुछ समय बाद मैं भी अपने बच्चों के लिए सपने देखूंगा ; वैसे ही जैसे मेरे माता पिता मेरे लिए देखते आये हैं I 'सपनों  से सपनों  तक' के इस सफ़र में यदि मैं स्वयं से प्रश्न करता हूँ कि मैंने क्या पाया तो उत्तर मिलता है 'कुछ नहीं' I पर शायद मुझसे उम्मीद रखने वालों ने बहुत कुछ खो दिया है I या तो मैं दोषी हूँ या फिर उम्मीद करना एक पागलपन है I यदि दूसरी बात सत्य है तो इसमें कोई शक नहीं कि यह दुनिया एक बहुत बड़ा पागलखाना है , जहाँ सब उम्मीद में जीते हैं I आशा और शंका के बीच सिकुड़कर I श्रृष्टि क्रम टूटे नहीं इसलिए इस सफ़र को यूँ ही चलना है I " सपनों से सपनों तक " I

                             
                                               neeraj tripathi (written on 03 May 1993, about a month before my marriage)
                                                                              

Monday, August 1, 2011

कोई भी नहीं बेदाग़ यहाँ

क्यों टूट गया कोई धागा, भाषा में क्या कड़वाहट थी,
बोझिल नैनों में क्यों जागा, परिचित सी कोई आहट थी,
अब भी पदचाप सुने है मन, अब भी सिसकारी भरता है,
रहते हैं जिंदा स्वप्न मगर, एहसास रोज़ इक मरता है,
इस कलयुग में द्वापर युग के तुम भाव कहाँ से लाओगे,
अब रोज़ हरण होती सीता, तुम कितने राम बनाओगे,
नकली चेहरों के दर्पण से, गाते हैं नित इक राग नया,
पर सच कहता हूँ उनमे से कोई भी नहीं बेदाग़ यहाँ,
दिल ढूंढे है फिर उनको ही जो प्रेम सुधा बरसाते थे,
बेशक वो थोड़े गूंगे थे पर गीत हमारे गाते थे,
वह कितने निश्चल रिश्ते थे, खुद ही  बन जाया करते थे,
तब भाव हमारे सच्चे थे, हम ह्रदय से गाया करते थे,
देखो कुछ दिल के कोनों में, अब भी जीवित हैं भाव वही,
कुछ त्यागो मोह, विलासा को, कुछ जी लो जीवन कभी कभी.