Friday, August 26, 2011

बारिश का ठहरा पानी है

ये छिटके पोखर जो दिखते,
मौसम की महज़ रवानी है,
आँखों की कोई कहानी नहीं,
बारिश का ठहरा पानी है;

भावों में अक्सर बहकर,
हम दुःख को बहुत जताते हैं,
उंगली इस पानी पर रखकर,
आँखों से बहा बताते हैं;

सही समझ शुभचिंतक भी,
कुछ दयाभाव दिखलाते हैं,
पर वो भी सोचें इसके दुःख,
क्यूं बारिश में ही आते हैं;

ऐसा अधिक नहीं चलता है,
एक समय वह आता है,
आँखों का बहता दरिया,
तब बारिश ही कहलाता है;

इसीलिए मेरे प्यारे जन,
व्यर्थ न ऐसे काम करो,
सहानभूति कि लालच में,
आँखों को न बदनाम करो;

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