Monday, August 22, 2011

गिर कर संभलती है

मेरे कानों से घुलकर जो कभी छम छम सरकती थी,
तेरे पायल की आहट, अब ज़रा दब कर निकलती है;

हया है, या है गम, या शायद इल्म है मेरे इरादों का,
जो थी मदहोश सांसें, अब ज़रा घबरा के चलती है;

जो बातें गेसुओं सी, राह में सरगम लुटाती थीं,
सुरों को खोजती सी, अब ज़रा खामोश रहती है;

मिलन के आस की बदरी, सांझ अक्सर भिगोती थी,
विरह की ज़ुल्म बारिश, अब ज़रा खुलकर बरसती है;

निकल जाती थी आँखों से जो पल में बिजलियों सी,
पलक पर रात भारी, अब ज़रा रुक कर गुज़रती है;

मेरी किस्मत है ऐसी, या समय मजबूरियों का है,
जो गाती थी दिशायें, अब ज़रा छिप कर सुबकती हैं;

मगर ये भ्रम न रखना, आइनों सा टूट जाऊंगा,
बड़ी जिद्दी शक़ल है, अब ज़रा फिर से संवरती है;

बहुत देखी हैं रातें, गम बहुत सा पी लिया नीरज,
मेरी फ़ितरत है ऐसी, अब ज़रा गिर कर संभलती है;


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