Thursday, August 4, 2011

सपनों से सपनों तक

मुझे आज भी नहीं भूलें हैं चंडीगढ़ के वे दिन जब पिताजी मुझे गाँव से वहां ले गए I उद्देश्य था मेरी शिक्षा I यूँ तो मैं गाँव की पाठशाला में भी कुछ दिन पढ़ा था, पर उसकी यादें अब काफी धूमिल पड़ चुकी हैं I एक तख्ती, दुद्धी (सफ़ेद स्याही) और सन की बनाई कलम लेकर क, ख, ग पढना सीखा था मैंने गाँव में I पर मेरे पिताजी घर में सदा ए, बी, सी पढाया करते I एक नन्हा सा दिमाग अचरज करता कि पाठशाला और घर की पढाई में ये अंतर क्यों है ? गाँव की पाठशाला में हमें दोपहर को कुछ खाने को मिलता I मुझे ठीक से याद तो नहीं कि वो क्या था पर उसकी शक्ल कुछ कुछ साबूदाने सी थी I हम बच्चे कतार में बैठ कर अपनी रूमाल या कोई कपड़ा या  कभी कभी बनियान सामने बिछा देते I फिर एक बंद मुट्ठी उस पर खुल जाती और हम बड़े चाव से उन दानों को खाते I एक दिन मैं रूमाल भूल गया और उस चाइनीज़ डिश को अपनी छोटी सी अंजुलि में लेते वक़्त उसके कई दाने नीचे गिर गए, जिसका मुझे काफ़ी दिनों तक अफ़सोस रहा I  एक दिन मेरी तख्ती किसी ने चुरा ली और मैं और दीदी दोनों रोते हुए घर लौटे I शायद हम वस्तुओं कि कीमतें आंकना जानते थे उन दिनों I ख़ैर इसके सिवाय मुझे कुछ याद नहीं I

हमने पाठशाला भी कहा, विद्यालय भी और स्कूल भी, जो भी आसान सा लगे I चंडीगढ़ आने के पश्चात् मुझे पता चला कि मुझे स्कूल में पढने जाना पड़ेगा I सुबह सुबह जब मैं पार्क में फिसलन पट्टी पर झूलता, तो सोचता कि यदि एक ऐसा झूला गाँव में होता तो क्या मज़ा आता I मैं छोटे बड़े बच्चों को एक सी पोशाक पहन बस्ता लिए स्कूल जाते देखता और सोचता कि इनकी पाठशाला में निश्चय ही कुछ अच्छा खाने को मिलता होगा I बचपन में पढाई के मायने अलग होते हैं I एक दिन पिताजी मुझे काफ़ी समझा बुझा कर एक स्कूल में ले गए I मेरा एडमिशन टेस्ट होना था I उस स्कूल की सारी दीवारें लाल थीं, हर खिड़की पर चमकीले शीशे लगे हुए थे, और इतने सारे फूल लगे थे की मन करता कि इन सब को तोड़कर गाँव में सरसों के खेतों में फेंक  दूँ I फिर उसमे भी रंग बिरंगे फूल हो जायेंगे; उन अनगिनत पीले फूलों के बीच I मुझे गाँव कि पाठशाला याद आई जहाँ एक बड़े पेड़ के नीचे हम सभी अधनंगे बच्चे बैठकर  क ख ग इतनी ज़ोर से चिल्लाते थे मानो लगता था आकाश धरती पर आ जाएगा I सहसा मेरे इंटरव्यू का नंबर आ गया और मुझे एक कमरे में धकेल दिया गया जहाँ स्लीवलेस ब्लाउज और चमकदार साड़ियाँ पहने दो महिलाएं बैठी थी जिन्हें टीचर कहते हैं I वो काफ़ी देर तक मुझसे प्रश्न करती रहीं और मैं चुपचाप खड़ा उनकी अवहेलना करता रहा I न मुझे उनकी भाषा समझ आती, न उन्हें मेरी I अजीब स्थिति थी; ख़ैर मैं उस  इंटरव्यू  में फेल हो गया और पिताजी ने अपना सर पीट लिया I औलाद न होने से बदतर है नालायक औलाद होना I उस समय मैं कोई पांच वर्ष का था I

कुछ दिनों बाद ही मेरा एडमिशन केंद्रीय विद्यालय सेक्टर ३१ में हो गया I यह कैसे हुआ ये तो मुझे याद नहीं पर इतना अवश्य था कि बिना नर्सरी और  के.जी पढ़े मैं सीधा पहली कक्षा में जा बैठा था I आजकल ऐसा होना अत्यंत दुर्लभ है I ज्ञान अर्जित करने हेतु कितना अधिक कम्पटीशन है ; लोअर के.जी से लेकर पी.एच. डी तक I स्कूल में जाते ही मेरी कायापलट हो गयी I पहले दस दिनों तक तो पता ही न चला कि क्या हो रहा है I मेरी ग्रामीण माँ रोज़ प्रातः मुझे नहला कर, साफ़ कपडे, काले चमकते जूते पहनाकर, ढेर सारा काजल लगाकर और मुहं पर पाउडर पोतकर स्कूल भेजती और गर्व करती कि मेरा लड़का कितना सुन्दर और साफ़ है I जब जब मैं अपनी पहली कक्षा कि ग्रुप फोटो देखता हूँ, बरबस एक हंसी आ ही जाती है I मैं एकदम आगे बैठा हूँ, तनकर, क्योंकि वह कैमरा मेरे लिए कोई जादू के पिटारे से कम आश्चर्यजनक वस्तु न थी I बिलकुल छोटे बाल जैसे उनके बढ़ने पर टैक्स लगा हो; काजलयुक्त आँखें, और एक चेहरा जिसका यदि कोई 'तेज़' है तो पाउडर ने ढक रखा है I ऊपर से उज्जवल, साफ़ पोशाक I यदि माँ का वात्सल्य तस्वीरों में झलकता है तो यह फोटो एक सजीव उदाहरण है I क्या हुआ जो उस माँ ने कभी स्कूल नहीं देखा या कभी शहर में नहीं रही ; अपने सीमित दिमाग से उसने अपने बेटे के लिए जो भी सोचा और किया वह स्वयं में एक बहुत बड़ी उपलब्धि न होते हुए भी अत्यंत मर्मस्पर्शी व वात्सल्यपूर्ण है I मन तो करता है कि उस फोटो को माँ के सामने रखूं और कहूँ कि ; माँ ये मैं नहीं तुम हो I पर मैं ऐसा नहीं करता क्योंकि अपने आसपास के लोगों कि बातों से मैं महसूस करता हूँ कि अब मैं बड़ा हो गया हूँ I पर क्या माँ से भी बड़ा हो गया हूँ !

चंडीगढ़ में मैं तीन साल पढ़ा I मेरे घर के सामने मेरे ही क्लास कि एक लड़की रहती थी; उर्मिला I कभी कभी जब खिड़की के पास बैठकर मैं होमवर्क करता तो वो मुझे अपने घर की खिड़की से चिढ़ाया करती I मुझे बहुत गुस्सा आता और मैं उसे गाली देता; 'साली' ! शहर में सीखी यह मेरी पहली गाली थी I सात बरस की उम्र में मैंने यह लफ्ज़ कहाँ से सीखा, यह तो मुझे याद नहीं पर उस समय यह एक गन्दी गाली हुआ करती थी I स्कूली बच्चों के बीच इस गाली का एक ख़ास महत्व था I आजकल गालियों में भी काफ़ी उन्नति हो गयी है I परिवर्तन प्रकृति का नियम है I फिर चाहे वह अच्छा हो या बुरा; हमें इससे क्या ? हम तो सहज भाव से कह देते हैं; ज़माना बदल गया है I इतनी बड़ी कर्त्तव्यहीनता क्या किसी और प्राणी में देखी जा सकती है ?

तीसरी कक्षा में मैं स्कूल में प्रथम स्थान पर रहा I यह एक चमत्कार से कम कुछ भी नहीं था I मेरे माता पिता बहुत खुश थे I अपने बेटे के उज्जवल भविष्य के सपने का पहला सकारात्मक कदम महसूस किया था उन्होंने I बीस साल तक माँ बाप यूँ ही सपनों को टूटते और जुड़ते देखते रहते हैं I बाद में यदि सपना साकार हो जाता है, तो बेटा कमाने विदेश चला जाता है, या लव  मैरिज कर कहीं सेटल हो जाता है I यदि सपना टूट जाता है तो बाप खिलाता है बेटे को, जब तक बाप की हड्डियाँ गल नहीं जाती I कितना सरल है यह सब I

चंडीगढ़ से मेरे पिताजी का स्थानांतरण हैदराबाद हो गया I चौथी, पांचवी और छठी कक्षा मैंने एयर फोर्स अकादमी से उत्तीर्ण की I इस स्कूल की यादें हालाँकि इतनी ताज़ी नहीं है, लेकिन फिर भी यहाँ बिताया समय मेरे आने वाले जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा I चंडीगढ़ छूटने के साथ ही मेरा क्लास में प्रथम स्थान भी छूट गया I मैं क्लास में पांचवे या छठे स्थान पर रहता और संतुष्ट भी रहता I दयनीय है वह विद्यार्थी जो अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट रहता है I यहीं पर मैंने क्रिकेट खेलना शुरू किया I हर छुट्टी में मैच खेलते; अक्सर जीतते, हारने लगते तो झगडा कर लेते I हार से बचने के लिए कोई अच्छा बहाना तो चाहिए ही था I यहीं मैंने अपने जीवन का पहला नाटक किया I स्कूल के प्रोग्राम में वह नाटक खेला गया और उसमे मेरा छोटा सा रोल था I एक परिवार का स्कूल जाने वाला एक बच्चा जिसे स्कूल ड्रेस की नेकर नहीं मिल रही I वह और उसके सात भाई बहन इकलौती माँ को परेशान कर रहे हैं; अपनी अपनी समस्याओं से I मुझे वह नाटक इसलिए अच्छा लगा क्योंकि उसमे कई बच्चे थे और बहुत हल्ला गुल्ला था I तब मुझे फॅमिली प्लानिंग के माने पता नहीं था I

इसी स्कूल में मैंने एन सी सी ज्वाइन की I उस समय बड़ा मज़ा आता जब परेड करने के बाद समोसे खाने को मिलते I हैदराबाद में मुझे जो सबसे अच्छा काम लगता था, वह था पतंग लूटना I वहां पतंगें खूब उड़ती और कटती I लगभग दस दिन असफल होने के बाद एक पतंग मेरे हाथ लग गयी और मैं उसे दो दिनों तक उड़ाता रहा I कहीं अगल बगल यदि पतंग उड़ते देखता तो फ़ौरन अपनी पतंग नीचे उतार लेता, इस डर से की कहीं मेरी पतंग कट न जाये I दस दिनों की मेहनत पर यूँ ही पानी नहीं फेरना चाहता था मैं I फिर एक दिन मैंने दो लड़कों के साथ मिलकर मांजा बनाया I कांच को पीसकर लेई के साथ मिलाकर धागे पर उसका लेप किया I अब मैं पतंग उड़ाने के लिए तैयार था I पहली ही लड़ाई में मेरी पतंग कट गयी और अपलक मैं देखता रहा अपनी मेहनत और ख्वाबों को लुटते हुए I उसके बाद मैंने पतंग कभी नहीं उड़ाई I हाँ, अक्सर बैठकर पतंगों को कटते और काटते देखता रहा I हिम्मत और मेहनत कहीं दुबकी पड़ी थी और इसका मुझे एहसास था I

यहाँ मैंने कई खेल खेले I गिल्ली डंडा, कंचे से लेकर क्रिकेट और फुटबाल तक I एक बार फुटबाल मेरे पेट पर लगी और कुछ पल के लिए मेरी सांस ही बंद हो गयी I मुझे लगा की यही अंत है ; मुझे वहां जाना है जहाँ धरती और अंबर मिलते हैं ; जहाँ धरती समाप्त हो जाती है I पर ऐसा न हुआ I मैं जीवित रहा और मैंने कई उम्मीदों को जीवित रखा I यहीं मैंने साईकिल चलाना भी सीखा I कई दिनों तक अपनी इस उपलब्धि पर मैं गर्व करता रहा I एक दिन मैं साईकिल समेत गिरा और अपनी उन चोटों को घर में छिपाने की असफल चेष्टा करता रहा जो एक अँधा भी पहचान सकता था I फिर यहाँ तो मेरी माँ थी; मेरे खुशहाल जीवन की शुभचिंतक I मैं चोटें खाता रहा और माँ उन्हें ठीक करती रही I फिर एक दिन मैं वह स्कूल, पतंग, एन सी सी सब छोड़ कर अपने माँ बाप भाई बहन के साथ बागडोगरा आ गया I

बागडोगरा बंगाल में एक छोटी जगह है सिलीगुड़ी के पास I अपने आप में यह छोटी जगह एक समूचा विश्व है; अनोखा और चमत्कारिक I यहाँ की तीस प्रतिशत जनसँख्या नेपालियों की है I किसी भी गली मोहल्ले से गुजरते वक़्त यदि बैंजो वाद्ययंत्र की धुन कानों को छेड़ दे तो निश्चित ही वहां नेपाली रहते होंगे I मुझे वहां दाखिला मिला केंद्रीय विद्यालय बेंगडुबी में, जो की एयर फोर्स स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर दूर था I आरम्भ के पांच छः महीने हम एयर फोर्स स्टेशन के बाहर रहे, किराये के मकान में I एक कमरा और किचन समेत समेत बंगला था वह जिसमे हम पांच प्राणी अडजस्ट करते थे I यह मकान पूरी तरह से लकड़ी का बना हुआ था और उसे ठोंक बजाकर यह अंदाज़ा लगाया जा सकता था की इसकी मरम्मत अगले हफ्ते करनी होगी या अगले महीने I जो भी हो यह हम बच्चों की चिंता का विषय नहीं था I मैं वहां खुश था I मकान मालिक के यहाँ नया नया टी वी आया था और माँ के मना करने के बावजूद मैं अक्सर चोरी छिपे खिड़की के परदे को थोड़ा सा हटाकर उस अद्भुत मानवीय आविष्कार को देखा करता जो आज निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों का फैमिली मेम्बर बन चुका है I हमारे घर के पीछे एक छोटी सी नदी थी; मेरी उत्सुकता का प्रमुख केंद्र I अक्सर मैं उसमे नहाता और मछुआरों को बड़े बड़े जालों में मछलियाँ पकड़ते देखता I वहां जीवन बहुत शांत और स्वच्छ था; उस नदी के शांत बहते पानी की तरह I
स्कूल ले जाने के लिए रोज़ एयर फोर्स की बस आती I यह स्कूल काफ़ी बड़ा था और इसकी बिल्डिंग बहुत ही आकर्षक I इस स्कूल में गुज़ारा समय मैं कभी नहीं भूल सकता I यहाँ मुझे पूरी छूट थी I घर स्कूल से बहुत दूर था I अक्सर हम सहपाठी मध्यान की घंटी बजते ही बाहर भाग जाते और पास ही के सिनेमा हॉल में पिक्चरों के पोस्टर देखते I या फिर घास पर बैठ कर लंच करते; और उन चीलों को भी कराते जो हमारे सर पर मंडरा रहे होते I मजाल थी की कोई रोटी का टुकड़ा ऊपर फेंक दो और वह वापस धरती पर आ जाये; यदि न्यूटन ने देखा होता तो पागल हो जाता I सातवीं कक्षा में मैं तीसरे स्थान पर रहा और खुश होकर मेरे क्लास टीचर मिस्टर मालिक ने मुझे एवं दो और विद्यार्थियों को पुरस्कार स्वरुप एक एक फोंटेन पेन दिया I वह पेन काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रहा I कुछ सालों बाद एक बार संगम पर नाव में सैर करते वक़्त वह पेन पानी में गिर गया और उसके साथ ह बह गयी वो यादें जो एक शिक्षक ने छोड़ रखी थी एक विद्यार्थी के दिल में I इस स्कूल में मैंने कई खेल खेले; पर हमारा मन पसंद खेल था गैलरी I यह खो खो से मिलता जुलता एक खेल है पर यह स्कूलों को छोड़ कर और कहीं नहीं खेला जाता I इस स्कूल में मैं आठवीं कक्षा तक पढ़ा I बागडोगरा की यादें मेरे अन्दर अभी तक ताज़ा है I ढेर सारे पहाड़ी पिकनिक स्थल, छोटी छोटी पहाड़ी नदियाँ, उनमे से पकडे हुए केकड़े, धारा के बहाव के उल्टा तैरती हिल्सा मछलियाँ, नेपाल के रास्ते का वह जंगल और उसमे रहता हाथियों का झुण्ड, वो चीता जिसे आदिवासियों ने पकड़ कर स्कूल के आस पास घुमाया था, सब याद है मुझे I बागडोगरा का वह हाट (बाज़ार) जहाँ एक रुपये में तीस नीम्बू मिलते थे और इतने ही पैसे देने पर सात अन्नानास के फल, क्या कभी भुलाया जा सकता है I कुल मिलाकर वह एक ऐसी जगह थी जिसके बारे में  लिख पाना मेरे लिए अत्यंत मुश्किल है I  कुछ जगहों को मात्र अनुभव किया जा सकता है और बागडोगरा उनमे से एक है I फिर एक दिन वह सब छूट गया I ट्रेन में बैठा हुआ मैं हरी घाटियों को पीछे छोड़ता गया I बेचैन मन यह महसूस कर रहा था की वे नदियाँ अब भी बह रही होंगी, दोस्त अब भी केकड़े पकड़ रहे होंगे, नीम्बू रुपये में तीस बिक रहे होंगे या शायद उससे भी ज्यादा, हाथी अब भी झुण्ड में निकलते होंगे; बस मैं उन सब को देख नहीं पाउँगा I मैं बहाव के उल्टा जा रहा था; हिल्सा मछली की तरह I उदास मन से मैं तब तक बागडोगरा के विषय में सोचता रहा, जब तक मैं उस नयी जगह नहीं पहुँच गया I उस जगह को देखते ही मुझे पता चल गया की यहाँ मेरा भविष्य लिखा जाएगा I माँ बाप के सपने भी शायद यहीं टूट जाएँ I और भी शायद बहुत कुछ यहीं होगा I जगह का नाम कुछ अटपटा सा था; ' कलाईकुंडा '  I  

बंगाल में ही खड़गपुर से लगभग बारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है एयर फोर्स स्टेशन कलाईकुंडा I यूँ तो यहाँ देखने लायक कुछ नहीं है पर वह व्यक्ति जो दृष्टि रखता है, उसके लिए यह जगह किसी रोम, परिस या लोस अन्जेलिस से कम नहीं है I दृष्टि, जैसा की मैंने अपने किसी लेख में लिखा था, अदृश्य वस्तुओं को देखने की कला है I गार्ड रूम से शुरू होती सड़क, जिसे हम माल रोड कहते थे, दूसरे छोर तक जाती है I इसी के अगल बगल घर, सिनेमा हॉल, स्विम्मिंग पूल, ऑडिटोरियम, अस्पताल, दुकानें सब हैं I यह माल रोड शिमला की माल रोड से किसी भी मायने में कम नहीं है I इसके किनारों पर व्याप्त जीवन हर समय और ख़ास कर के शाम को उमड़ पड़ता है इस सड़क की लम्बाई पर I गार्ड रूम से बाहर भी घर हैं, काली मंदिर की तरफ, या फिर आशु कैंप, छोटे से रेलवे स्टेशन से चिपका हुआ; सब तरफ फौज़िओं का वास है I गार्ड रूम से निकलते हुए ही स्कूल है I यहाँ दो स्कूल हैं; एक कैंप के बाहर और दूसरा अन्दर I बाहर वाले स्कूल में मेरा एडमिशन नवीं क्लास में हो गया I स्कूल की बिल्डिंग काफ़ी पुरानी थी, पर साथ में एक नई बिल्डिंग भी लगभग तैयार हो गयी थी I ये अलग बात है की उसमे पढने के लिए दो साल का इंतज़ार करना पड़ा I

इस जगह ने मुझे सब कुछ दिया; दोस्त, सफलता, असफलता, दुःख, सुख, आशा, निराशा और प्यार I यहाँ बिताये दिन मैं कभी नहीं भूल सकता I आज यदि किन्ही लम्हों को पुनः जीने की आकांशा उठती है, तो निश्चित ही यहाँ गुज़ारे पल हैं I जंगलों में घुस कर बेर तोड़ना, किसी के घर में लगे आम या अमरुद उड़ा लेना, पढने के बहाने जाकर क्रिकेट खेलना या देखना अथवा सब्जी बाज़ार से गन्ने या नारियल चुरा लेना; आज अपने आप में ये कार्य कितने ही तिरस्कृत क्यों न लगें, एक समय था जब मैं इन्हें पूरी निष्ठां और लगन से किया करता था I और उस समय मैं खुश रहता था I काम चाहे अच्छा हो या बुरा, सफलता मिलने पर ख़ुशी होना स्वाभाविक है I यही कारण था कि चाहे किसी के पेड़ के पपीते कच्चे ही क्यों न हों, हमें बड़े मीठे लगते I

स्कूल भी अजीब था I  अभी कुछ ही दिन हुए थे कि स्कूल में हड़ताल हो गयी I प्रिंसिपल व किसी टीचर में झगड़ा हो गया था I महिना भर स्कूल बंद रहा और हम बच्चों कि किस्मत खुली रही I फिर एक दिन अचानक पता चला कि समझौता हो गया है और स्कूल खुलने वाला है I मेरे लिए अब तक सुनी सब से बुरी ख़बरों में यह एक थी I नवीं कक्षा पास करने के बाद मेरे कई दोस्त बने इआज उनमे सुकेश, राजेश और सुपर्णा ही हैं जो उन दिनों कि याद को ताज़ा कर पाते हैं I यूँ तो और भी हैं जो अब तक संपर्क जोड़े हुए हैं, पर उनमे वो गुज़रे दिन नहीं झलकते I शिखा हालाँकि आज भी शुभचिंतक और निश्चल है पर उसे मात्र पत्रों के ज़रिये महसूस करना मुश्किल है I विज़ु बाईसवीं सदी कि लड़की है और मुझे दुःख है कि समय से पूर्व इस प्राचीन दुनिया में उसकी आधुनिकता का टेलेंट वेस्ट हो रहा है I अमित, सुब्रोतो, ज्योति, अर्पण, दिनेश, राकेश, जयश्री ऐसे न जाने कितने नाम रास्ते में ही खो गए I जब पुनः कोई मिला भी तो हमारे रास्ते अलग दिशाओं में जाते थे I

दसवीं कक्षा में मैं स्कूल में तीसरे स्थान पर रहा और मेरे माता पिता और टीचरों ने भी मेरे अन्दर एक उज्जवल भविष्य देखा I कुछ तो इस हद तक कह गए कि यह लड़का अद्वितीय है I पढाई और खेल के अलावा भी एक सम्पूर्ण मानव में जो खूबियाँ होनी चाहिए वो इसमें हैं I या तो वे सब मूर्ख थे जो ऐसा कह गए, या मैंने अपने गुणों को उस कोण से नहीं देखा जहाँ से वे देखते थे I आने वाले दो सालों में मेरे दो प्रेम प्रसंग हुए I यूँ शुद्ध हिंदी में इन्हें लव अफैर्स कहते हैं I आज ये मेरे लिए पुरानी बातें हैं, पर उन दिनों ये मेरी साँसे थीं I हो सकता है वो धीमी और उखड़ी हुई ही साँसें हों, पर निश्चित रूप से मैं उनमे जी रहा था I अस्सी योनियों के बाद भी यदि मुझे पुनः मानव आकृति प्राप्त हुई तो मैं उन घड़ियों को अनगिनत बार जीना चाहूँगा I चाहे प्रत्येक बार इसी तरह असफल क्यों न होना पड़े I कम से कम उतने समय एक आशा तो थी; हलकी सी ही सही पर विश्वास कि मज़बूत बुनियाद पर टिकी हुई I

बाराहंवी क्लास तक पहुँचते पहुँचते मेरी पढाई चौपट हो चुकी थी I नतीजा यह हुआ कि बारहंवी कक्षा में मैं एक विषय में फेल हो गया I स्कूल कि रिज़ल्ट की भाषा में इसे 'कम्पार्टमेंट' कहते हैं I 'फेल' और 'पास' के बीच का वह सत्य, जिसमे न प्रोत्साहन है और न ही सहानुभूति, और जिसे धोने के लिए पुनः उसी विषय का इम्तिहान देना पड़ता है, जो इस रिज़ल्ट का कारण है I यदि मैंने जीवन को बहुत पास से देखा है तो अवश्य उन दिनों ही था I माँ चुप रहती जैसे मौन व्रत हो, पिताजी की अवस्था अचानक ही बीस साल अधिक लगने लगी, टीचर ऐसी त्रिअस्कृत निगाहों से देखते मानो उनका प्रमोशन मेरे कारण रुक गया हो, दोस्त वहां थे ही नहीं, जो थे उनकी पहचान हो गयी I कोई यह न कहता की क्या करो; सब यही कहते की क्या कर दिया ; और समय लगता था तब रुक गया हो I चार साल का आनंद एक ही पल में याद आ गया मुझे I दोस्त, सफलता, असफलता, दुःख, सुख, आशा, निराशा, प्यार सब खोखले लगने लगे I मुझे लगा की मुझे स्वयं से घृणा हो गयी है I जब सपने टूटते हैं तो आवाज़ नहीं करते; और शायद इसीलिए ज्यादा चोट करते हैं I मुझे वह समय भी याद आया जब एक तख्ती लेकर उस पर काला रंग पोतता रहता था ताकि सफ़ेद स्याही और सफ़ेद दिखे I वहां से यहाँ तक का सफ़र काफ़ी लम्बा था पर मुझे अफ़सोस रहा कि इतना लम्बा रास्ता तय करने के बाद भी मैंने स्वयं को वहीँ खड़ा पाया जहाँ तेरह साल पहले खड़ा था I यदि यह स्थिरता का उदहारण नहीं है तो विश्व में कुछ भी स्थिर नहीं है I

आज यदि मुझे अपनी इस स्कूल लाइफ के अंतिम चरण को पुनः जीने का मौका मिले तो मैं निस्संकोच जिऊंगा I ऐसा इसलिए कि उस समय मैंने एक कायरता का परिचय दिया था जिसे मैं सुधारना चाहता हूँ I मैंने किसी तरह  बाराहंवी पास कि थी और वायु सेना में भारती हो गया था I हार कर नहीं, झुंझला कर I यूँ कहने को तो मैंने नौकरी कर ली थी पर आज भी साधे पांच साल बाद मैं यह जानता हूँ कि मैं तब भाग खड़ा हुआ था जब मुझे टिक कर लड़ना था I

लगभग एक महीने पश्चात् मेरा विवाह होना तय हुआ है I कुछ समय बाद मैं भी अपने बच्चों के लिए सपने देखूंगा ; वैसे ही जैसे मेरे माता पिता मेरे लिए देखते आये हैं I 'सपनों  से सपनों  तक' के इस सफ़र में यदि मैं स्वयं से प्रश्न करता हूँ कि मैंने क्या पाया तो उत्तर मिलता है 'कुछ नहीं' I पर शायद मुझसे उम्मीद रखने वालों ने बहुत कुछ खो दिया है I या तो मैं दोषी हूँ या फिर उम्मीद करना एक पागलपन है I यदि दूसरी बात सत्य है तो इसमें कोई शक नहीं कि यह दुनिया एक बहुत बड़ा पागलखाना है , जहाँ सब उम्मीद में जीते हैं I आशा और शंका के बीच सिकुड़कर I श्रृष्टि क्रम टूटे नहीं इसलिए इस सफ़र को यूँ ही चलना है I " सपनों से सपनों तक " I

                             
                                               neeraj tripathi (written on 03 May 1993, about a month before my marriage)
                                                                              

No comments:

Post a Comment