Monday, August 1, 2011

कोई भी नहीं बेदाग़ यहाँ

क्यों टूट गया कोई धागा, भाषा में क्या कड़वाहट थी,
बोझिल नैनों में क्यों जागा, परिचित सी कोई आहट थी,
अब भी पदचाप सुने है मन, अब भी सिसकारी भरता है,
रहते हैं जिंदा स्वप्न मगर, एहसास रोज़ इक मरता है,
इस कलयुग में द्वापर युग के तुम भाव कहाँ से लाओगे,
अब रोज़ हरण होती सीता, तुम कितने राम बनाओगे,
नकली चेहरों के दर्पण से, गाते हैं नित इक राग नया,
पर सच कहता हूँ उनमे से कोई भी नहीं बेदाग़ यहाँ,
दिल ढूंढे है फिर उनको ही जो प्रेम सुधा बरसाते थे,
बेशक वो थोड़े गूंगे थे पर गीत हमारे गाते थे,
वह कितने निश्चल रिश्ते थे, खुद ही  बन जाया करते थे,
तब भाव हमारे सच्चे थे, हम ह्रदय से गाया करते थे,
देखो कुछ दिल के कोनों में, अब भी जीवित हैं भाव वही,
कुछ त्यागो मोह, विलासा को, कुछ जी लो जीवन कभी कभी.


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