बेफिक्र हम सोते रहे, और गालियाँ देते रहे;
सोचते थे कि एक दिन कोई रहनुमा आएगा,
अब तो जागो वरना गालियाँ भी न दे पाओगे,
कोई अन्ना रोज़ तुम्हे जगाने नहीं आएगा....
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न समय विराम का है, न समय विश्राम का है,
धूल उड़ती दिख रही है, ये समय संग्राम का है;
कोसते थे जिस प्रथा को, आज वह दुबकी पड़ी है,
हौसलों के सामने वो सहमी सी औंधी गिरी है,
चूक अब होने न पावे, बाँध लो अपनी कमर तुम,
भूल अब होने न पावे, कर दो मौके को अमर तुम,
दिख रहा है एक मंजर, संघर्ष आम इंसान का है,
खो लिया जितना था खोना, अब समय परिणाम का है.
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