Sunday, August 28, 2011

आशा की किरण

सिआचेन ग्लेशियर से कुछ हज़ार फुट ऊपर,
ये एक फौजी चौकी है,
एक टेंट है, अधलेटा हुआ,
और उसमे है बैठा लांस नायक राम अधार,
हाथ में दूरबीन, बगल में रखी लोडेड इंसास रायफल,
सौ राउंड्स, एक स्लीपिंग बैग, स्नो बूट्स, एक स्टोव,
एक हाई फ्रिक्वेंसी रेडियो सेट, कुछ बर्तन, मिटटी का तेल,
कुछ काजू, बादाम भी, और कुछ बर्फीले कपड़े,
ये सब सजते हैं इस छोटे से टेंट में,
आज अट्ठाईस दिन हो गए नहाए हुए,
दाढ़ी किसी बाबा कि तरह बढ़ चुकी है,
बस तीन दिन और...
और फिर समतल ज़मीन दिखेगी,
वह एक अगस्त से ड्यूटी पर है,
बर्फ और बर्फ...सब तरफ बर्फ,
सूर्य यहाँ कभी क्यों नहीं दिखता,
अपने बटुए में से एक मुड़ी सी फोटो निकालता है,
और देखता रहता है अपलक,
बूढ़े माँ बाप, छोटी बहन, आँखों में प्रार्थना लिए पत्नी,
और एक फूल सी बच्ची,
सब हैं इस फोटो में,
अब आँखों में ज्वारभाटा नहीं आते,
बस चिंता सताती है,
कोई खबर नहीं आई,
दस दिन पहले हेलीकाप्टर आया था,
ऊपर से थैला गिराया था,
पर उसमे कोई चिट्ठी न थी,
बस काजू थे, और बिस्कुट थे,
दो डब्बे भी थे; भोजन के,
और एक डब्बा लड्डुओं का,
पंद्रह अगस्त का बड़ा खाना था वह,
पर चिट्ठी नहीं थी,
वह सब ऐसे ही पड़ा है,
उसे यहाँ भूख नहीं लगती,
बस चिंता सताती है....
माँ की आँख में मोतियाबिंद,
ऑपरेशन होना था,
शहर ले जाना था सरकारी अस्पताल में,
कैसे गए होंगे,
पिता के घुटनों का दर्द चलने नहीं देता,
गाँव से एक सरकारी बस चलती तो है,
पर अक्सर नहीं आती,
और अस्पताल में कर्मचारी,
कहते थे पाँच सौ दो,
तभी बेड मिल पायेगा,
कैसा सरकारी अस्पताल है....
अगले साल वो उन्हें जम्मू लाएगा,
और मिलिट्री अस्पताल में इलाज़ कराएगा,
क्या पिताजी को राशन मिल पाया होगा,
या फिर राशन वाले ने उल्टा बोला होगा,
और दो किलो चीनी कम तोला होगा,
क्या बहन का स्कूल अब भी बंद होगा,
या टीचर आ रहे होंगे,
कितना शौक है उसे विज्ञान का,
क्या वे उसे पढ़ा रहे होंगे...
और उसकी प्यारी सी बीवी,
क्या दिन भर चौका ही करती होगी,
क्या उसे अब भी गिला होगा,
जब मनीआर्डर मिला होगा,
क्या उसने बिटिया को टीका लगवाया होगा,
उसके लिए तो डॉक्टर,
गाँव में ही आता है हर शुक्रवार,
पर गाँव के सरकारी दवाखाने में,
अक्सर नर्स नहीं रहती,
कभी उसका इंतज़ार रहता है,
कभी दवाई नहीं रहती,
क्या पिता को ज़मीन की नक़ल मिली होगी,
कहते थे पटवारी दारु की बोतल मांगता था,
क्या बरसात होती होगी,
बीज, खाद, यूरिया...क्या सब मिला होगा,
या सहकारी दुकानों में,
बस ताश का दौर ही चला होगा,
क्या वकील ने मुकद्दमे की,
नई तारीख ली होगी,
या पट्टीदार से ही मिलकर,
कोई नई चाल चली होगी,
क्या ऐसा हुआ होगा...क्या वैसा हुआ होगा..
क्या...क्या...क्या....
ये 'क्या' की जिंदगी है,
क्यों कुछ भी निश्चित नहीं है,
क्यों आम जिंदगी रोज़ तकलीफ में पलती है,
और कितनी भी कोशिश कर लो,
क्यों सरकार की व्यवस्था नहीं चलती है...
वह फोटो वापस बटुए में रख देता है,
दूरबीन से टेंट की खिड़की से दूर तक देखता है,
कोई दुश्मन नहीं है...कहीं भी इस बर्फ के सिवा...
पर आज कुछ अलग है शायद,
ये आसमां कुछ खुला खुला सा है,
एक हलकी सी रोशनी....
ये कैसी सुबह है...कहीं सूर्य है शायद,
एक किरण कहीं से फूट कर बर्फ पर पड़ती है,
और बर्फ चाँदी की तरह चमकती है,
उफ़ ! कितनी ख़ुशी...सूर्य की एक किरण..और इतनी आशा,
ख़ुशी में अपना रेडियो सेट खोलता है,
आज वह पहले कोई गाना सुनेगा,
खुले मौसम में श्रीनगर स्टेशन पकड़ता है,
आज वो रिपोर्टिंग बाद में करेगा,
कोशिश करने पर रेडियो घर्राता है,
कोई शोर में कुछ समाचार बताता है,
कहता है, आज जनता जीती है,
सरकार झुकी है,
अब अच्छी हुकूमत का,
इंतज़ार बस थोड़ा है,
कोई अन्ना हजारे है,
जिसने अनशन तोड़ा है,


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