Monday, August 8, 2011

प्रतीक्षा (written on 30-12- 1992)

एक चिथड़ा भी कितना बड़ा सुख हो सकता है यह मैंने उस रात जाना था I उस रात जब निर्मल वर्मा की उस किताब से मैं पल भर भी आँखें नहीं उठा सका था I सुबह उठा तो अनायास ही एक बेचैनी मन में समा आई थी I बाहर सब सफ़ेद था; वह आमों का बाग़, स्कूल जाने वाली पगडण्डी, लाल टीन की छत वाला मकान, कुछ भी नहीं दिखाई देता मकान के छज्जे से I सब तरफ कोहरा; सफ़ेद, धुंधला तैरता हुआ सा बेचैन कोहरा I कितना आश्चर्यजनक था कि जब मैं सोता रहा, तो कोहरा धीरे धीरे सिमटता रहा धरती कि छाती पर I
 'दृष्टि' अदृश्य वस्तुओं को देखने कि कला है, जिसका मेरे अन्दर सदा अभाव रहा है I कहीं से सूर्य कि एक किरण चीर देती है कोहरे को; लाल तीन कि छत कि रुपरेखा बह आती है वातावरण कि ढलान पर I बगल का कुआं अभी भी अदृश्य है; मौन, निश्तब्ध क्योंकि बाल्टियों कि खडखडाहट कहीं से भी सुनाई नहीं पड़ती I आज भी वह छोटी लड़की खड़ी होगी फुटपाथ पर, बस्ता लेकर साथियों कि प्रतीक्षा में; 'प्रतीक्षा' अंतहीन और निरंतर......!
कोहरा शायद थक गया है क्योंकि भागने लगा है; थकने के बाद भागना मुझे मुश्किल प्रतीत होता है I जो दूसरों के लिए आसान होता है वो सदा मुझे मुश्किल क्यों प्रतीत लगता आया है ? गेहूं के हरे पौधों पर ओस कि बूंदें एक मृगतृष्णा सा भ्रम देती हैं आँखों को; ....फिर वह नज़र आती है जिसे मैं रोज़ देखता हूँ कुएं पर; वह मुझे छज्जे पर खड़ा देखती है और आँखें नीची कर पानी भरने लगती है I अचानक लगता है जीवन फिर चलने लगा है; उत्सुक परन्तु थोड़ा सा आतंकित.....! बच्चों की भीड़ पगडण्डी पर उतर आती है; ये अब स्कूल जायेंगे और रास्ते में आंवले की बाग़ से भरपूर आंवले तोड़ेंगे; कुछ को खायेंगे, कुछ से खेलेंगे I कोई दांत दे तो गाली अलग से सुने I तब वह काया उतर आती है कुएं के चबूतरे से; कमर में गगरी और एक हाथ में बाल्टी; एक दौड़ती सी नज़र ऊपर आती है और फिर गड़ जाती है ज़मीं पर, मगर खिसकती रहती है I पानी और शर्म के बोझ तले वह निगाह सरकती जाती है और मुझे पुनः इंतज़ार रहता है अगली सुबह का I
जाड़ा...और जाड़ा ! रात भर का सिकुड़ा शरीर जब सुबह थोड़ा फैलता है तो अदभुत जान पड़ता है; कैसे सिकोड़ लेते हैं हम इतने बड़े शरीर को चंद चीथड़ों में; शाम होते ही...सवेरे तलक I जाड़े की धूप से प्यारी वस्तु शायद आशायुक्त असफलता ही होती है,; ऐसा मेरा सोचना है I हल्की सी धूप अलसाई आकृतियों पर उभर आई है; फिर वह तीन मिटटी के घड़े दिखाई देते हैं ; लटके हुए आम के पेड़ पर...प्रतीक्षा करते हुए I आज भी इन्हें ऐसे ही झूलते रहना है I कल इन्हें फोड़ दिया जाएगा और साथ ही समाप्त हो जायेगी तीनो बेटों की डयूटियां मरे हुए पिता के प्रति I वह व्यक्ति जो बहुत बड़ा पहलवान हुआ करता था, कितना बेबस था मृत्यु के समय ! आँखें सब गीली थीं; कुछ चिंता से, कुछ राहत से I कभी कभी किसी के मर जाने से कितनी राहत मिलती है, यह मैंने उस दिन महसूस किया था I  अग्नि में समा गया था वह हड्डियों का ढांचा नब्बे सावन झेलने के बाद :   बिना किसी प्रतिरोध के, मानो इसी की प्रतीक्षा थी I
अचानक दिन भागने लगा है; खेत सींचता वह किसान, घास काटती वह लड़की और उपले बनती वह स्त्री, सब देखते हैं इस भागते हुए दिन को I मैं छज्जे से उतर आटा हूँ पर सोचता रहता हूँ उन लटके हुए मटकों के बारे में; और उस सरसराती निगाह के बारे में जिसका मुझे पुनः इंतज़ार रहेगा I
भूल जाता हूँ उस जाड़े की रात जब एक किताब लेकर कई घंटे लालटेन को कष्ट पहुँचाता रहा और फिर उसे यूँ बुझा दिया जैसे यह मेरा हक़ था; बरबस, क्रूरता से I
दिन चढ़ आया है और मैं उन कारीगरों और मजदूरों को देखता हूँ, जो मेरा मकान तैयार कर रहे हैं I उनके लिए हर दिन एक सा है ; ईंट, सीमेंट, रेत और मिटटी; और उनके बीच दबी दो रोटी और अचार, या शायद एक प्याज....I इनकी प्रतीक्षा रोटी की बुनियाद पर तैरती है I ईंट से ईंट जुड़ते देखता हूँ और वर्षों से कहीं दिल में छिपी प्रतीक्षा को मुस्कुराते देखता हूँ I हर ईंट पड़ोसियों के कलेजे पर भी पड़ते देखता हूँ और बरबस एक दुःख मिश्रित हंसी होठों को घेर लेटी है I सब बेकार लगता है; बाजरे की फसल की तरह जो खेतों में ही सूख रही है और जिसे अब भी प्रतीक्षा है कट जाने की I  कब तक ! आखिर कब तक इंतज़ार रहेगा; सुबह तो रोज़ आएगी; कभी धुंधली तो कभी भीगी हुई I  अनायास पुनः सब भागने लगता है; आँखों के सामने I कुँए पर बाल्टियों की खडखडाहट, कोहरे को चीरता वह आमों का बाग़, लाल टीन की छत, वह छोटी लड़की, फुटपाथ पर खड़ी हुई, बस्ता संभाले....प्रतीक्षा करती हुई............I  
Neeraj   30 December 1992

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