आज फिर सूरज नहीं निकला,
जैसे रह गया हो हिसाब कोई पिछला,
कहीं भी न गरीब कि गुहारें दिखीं,
जहाँ तक देखा रेशमी फुहारें दिखीं,
कहीं तो न फ़िक्र कि उसका भीगता जूता है,
कहीं टीन की छत से अब भी पानी चूता है,
कहीं पर भीगा कोई अब भी सपन रोता है,
कहीं कोई बारिशों में ओढ़ चादर सोता है,
कहीं कोई छतरियों की ओट में निकला,
कहीं कोई चढ़ शिखर पर अंत में फिसला,
आज फिर सूरज नहीं निकला,
जैसे रह गया हो हिसाब कोई पिछला,
जैसे रह गया हो हिसाब कोई पिछला,
कहीं भी न गरीब कि गुहारें दिखीं,
जहाँ तक देखा रेशमी फुहारें दिखीं,
कहीं तो न फ़िक्र कि उसका भीगता जूता है,
कहीं टीन की छत से अब भी पानी चूता है,
कहीं पर भीगा कोई अब भी सपन रोता है,
कहीं कोई बारिशों में ओढ़ चादर सोता है,
कहीं कोई छतरियों की ओट में निकला,
कहीं कोई चढ़ शिखर पर अंत में फिसला,
आज फिर सूरज नहीं निकला,
जैसे रह गया हो हिसाब कोई पिछला,
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