Monday, August 8, 2011

कैसा न्याय है विधाता

लगातार बत्ती जलती रही,
छाया रहा अँधेरा,
पता ही न लगा,
कब भोर,
कब रात हुई,
जब भी आँख खुली,
बाहर बरसात हुई....

आसमां कैसा है,
पनाह देता है बादलों को,
और देखता है,
तरल होती है धरती,
हरी होती है परती,
आसमां कुछ नहीं पाता,
कैसा न्याय है विधाता....

ऐसा ही जीवन है,
किसी को निचोड़ देता है,
तो कोई सोख लेता है,
किसी पर गरजता है,
तो किसी पर बरसता है,
और कोई सबकुछ देकर,
उम्र भर तरसता है.....

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