Tuesday, December 29, 2020

अब यह मन है, अपने मन का अनमन बदले,
जो  विषाक्त हो रहे थे उनका तन मन बदले; 
अबलाओं की विवश दशा का विवश भी बदले,
जिनके भोर अंधेर रहे वह दिवस भी बदले;

भौतिकता तक सीमित यह अभिलाषा बदले,
कार्यालय में सम्बोधन की भाषा बदले;
वोटों के प्रेमी प्रतिनिधि का प्राज्ञ भी बदले
जिस हलधर का अन्न है उसका भाग्य भी बदले;

दीन जनों पर मात्र दया का अर्पण बदले,
जिसमे न मुस्कान दिखे वो दर्पण ​बदले;
मनुज प्रणय से वंचित रहा ह्रदय भी बदले,
अब की साल, साल ही नहीं समय भी बदले।

 

Saturday, December 26, 2020

कौन समझेगा इसे,
ये कोई शख्स नहीं, कोई जगह भी नहीं,
कोई वस्तु नहीं, कोई कलह भी नहीं,
कोई मिलन नहीं, कोई गिरह भी नहीं,
कोई प्रीत नहीं, कोई विरह भी नहीं,
किसी धन दौलत की लालसा नहीं,
किसी अपने का कोई हादसा भी नहीं,
ये वो भी नहीं जो दिखाई दे,
वो भी नहीं जो सिर्फ सुनाई दे,
कौन समझेगा इसे,
कि क्यूँ आवश्यक है किन्ही ज़ज़्बों में,
ढीठ होना,
और आज भी लाठियों से अधिक ज़रूरी है,
पीठ होना।

 

Tuesday, December 22, 2020

दरख़्त बोलते नहीं,
डोलते हैं तूफानों में,
झोंक देते हैं,
अपना सारा लचीलापन,
कि खड़े रह सकें,
तूफानों के बाद भी ...
खड़े रहते हैं निश्चल,
भीषण ऊष्मा में,
सोख कर अपने ही पसीने को,
और देखते हैं उपयोग,
अपनी छाया का,
चुपचाप......
उजड़ते रहते हैं पत्तियों से,
फिर संवरते हैं,
अनवरत, साल दर साल,
लगाते हैं गले,
बारिश, शीत सब.....
पर इस सब के लिए,
बढ़ना होता है उन्हें,
जमीन के ऊपर,
जमीन के भीतर,
निरंतर.......
कैसे कर पाते हैं,
ये सब,
दरख्त जो बोलते नहीं,
समझो कभी उनकी भी भाषा,
किन्हीं चुप्पियों में,
फिर करो कोशिश,
दरख़्त बनो,
तूफ़ान तो सब हैं।

 

आज भी वैसा ही दिन वैसी ही रात,
न भरोसा न दिलासा न ही बात,
रोज़ फल कर रोज़ पक जाता हूँ मैं,
रोज़ ज़रा सा और थक जाता हूँ मैं,
सपन लेकिन थकन से कितना बड़ा है,
उठ चलो कि दिवस मुँह बाये खड़ा है ।

 

 

कुछ समय तक धूल आँधी लू सब भाती है,
फिर समय है बीतता ज़िद्द कम हो जाती है,
जब लगा देते हैं हम इन खिड़कियों पर जालियाँ,
तब हवा और धूप दोनों छन के आती हैं।

Sunday, December 20, 2020

मास्क में छुपी है पर मुस्कराहट है वही,
कुछ वक़्त ही बीता है, ज़िंदगी नहीं,
जल्द ही फिर होगी टपरी, चाय, चुस्की,
तब नहीं कहना नहीं नहीं नहीं नहीं।

 

Tuesday, December 8, 2020

थोड़ी सिहरन,
उम्मीदें ढेर सारी,
कुछ ज़मीनी दूरियां,
पर भावनाओं की सवारी,
कभी आशंकाओं की हथेली,
कभी नई पहेली,
ठान रखी है हमने भी,
जीने की ज़िद्द वही,
सब्र की रहगुज़र में,
आँखों में आशा वही,
क़ुबूल है जंग इस साल से,
जो गुज़रता नहीं,
रुका रहता है,चलता नहीं,

हमारे हौसलों के काफिले,
रहेंगे साथ हरदम ,
चाहे हो धूल समय पर,
ये हों साँसों के ग़म,
ज़िंदगी रहे बेशक,
ज़रूरत से कुछ कम,
देखेंगे बाज़ी किसकी,
ये ठहरा साल और हम।

 

Monday, December 7, 2020

जब सफर में शान्ति का लहरा रहा परचम खड़ा,
किन्तु फिर उन्माद क्यों है राह में बिखरा पड़ा,
प्रेम की बोली के यूँ तो हम सभी हक़दार हैं पर,
युद्ध के अवसान पर है लग गया पहरा कड़ा। 

जब समस्या मूल से हट राजनैतिक रंग ले ले,
प्रक्रिया संवाद भी जब हठ की कोई जंग ले ले,
साक्षी इतिहास है कि जो दिशाभ्रम में अड़ा,
वह समय से हार बैठा, है समय सब से बड़ा।

क्षीण पड़ जाती दशा जैसे समय है बीतता,
अब नहीं कोई मनुज है हार कर के जीतता,
हो कृषक तुम या हो सैनिक या कोई नेता बड़ा,
धराशायी हो गया हठ, अंत तक था जब लड़ा।

 

 

Tuesday, December 1, 2020

ढेर सारी नमी सहेज ह्रदय में,​
और कुछ आँचल में,
वह रही रिसती पूरी बरसात,
न कोई उलाहना, न संताप,
न अपनी तक़दीर पर पश्चाताप,
बस अपनी सीलन को,
वह सहती रही चुपचाप,
शायद यह सोचकर,
कि कमी रह गयी कहीं जुड़ाव में,
जब छत से उसका हुआ था मिलाप,
वो छत जो है उसके सर पर सवार,
ये घर की दक्खिनी दीवार।

बरसात रुकी पर रह गयी सीलन,
बहुत दिनों तक,
फिर धूप ने सेंका उसे,
पपड़ियाँ पर गयीं दीवार पर,
उखड़ गए सब रंग,
वह अब भी न बोली कुछ,
फिर हमने छत की मरम्मत कराई,
कुछ और सुखाया दीवार के आँचल को,
और रंग दिया फिर नया सा।

अब भी मौन है दीवार,
पहले जैसी ही नयी हो गयी है,
अब आँचल में नमी नहीं दिखती,
पर वह नमी जो ह्रदय में थी उसके,
कहाँ सुखा पायी उसे धूप भी,
वह अब भी है उसके अंदर,
उसकी अपनी सीलन,
उसे रखना चाहती है वो,
किसी निशानी की तरह,
जिस तरह रख लेते हैं हम,
बुरे समय को सहेज कर,
अपनी दक्खिनी दीवार में।

 

Friday, November 13, 2020

कर्म की माटी,
लगन से साँची,
त्याग की बाती,
स्नेह है लाती,
प्रेम का तेल,
त्याग से मेल,
मेहनत की दियासलाई,
विचारों में जगभलाई,
तब होगी लौ विश्वास की,
हमारे, आपके, सबके आस की,
यही वातावरण हर घड़ी पलता रहे
आपके जीवन का दिया यूँ ही जलता रहे । 





 

Tuesday, November 10, 2020

इस मौसम में गाँव में आना एक बेहद सुखद अनुभूति है। बारिशें रुक रुक कर आती रहती  हैं.... कुछ वैसे ही जैसे अपने शहर के घर में दरवाज़ा खुला रखने पर वह बिल्ली का बच्चा बार बार घुस जाता है। इस समय हरियाली हर तरफ यूँ लगती है मानो किसी ने हरा ब्रश फेर दिया है हवा में और उस हवा ने रंग दिया है सब कुछ।  इस हलके से पहाड़ी गाँव के भी दो हिस्से हैं ; एक जो थोड़ा ऊपर को है और जहाँ अधिकतर घर हैं।  वहां बारिश का पानी नहीं टिकता और बह कर थोड़ा नीचे तलहटी में आ जाता है जहाँ पर खेत हैं।  यूँ तो यहाँ के मकानों में ईंट और सीमेंट का भी प्रयोग हुआ है पर ढेर सारे मकान  पत्थरों के भी  हैं ; चितकबरे और काले पत्थर जो आसपास की बंजर पहाड़ियों में आराम फरमा रहे थे।  ये सस्ते भी मिल जाते हैं और अपने से भी लगते हैं, और घरों की बाउंड्री बनाने में इनका बेपनाह इस्तेमाल हुआ है।

इन्हीं घरों के किनारों से ये पतली सड़क नीचे उतरती है , दिखने में तो ये सड़क एक चौड़ी पगडण्डी सी लगती है पर इसके रख रखाव पर हर साल ध्यान दिया जाता है। किसी समय इस सड़क पर बजरी डाली गयी थी और काली मिटटी से मिलकर यह अब काफी ठोस हो गयी है। सड़क की हलकी ढलान की उतरन पर दोनों तरफ के खेत पानी से भरे हुए हैं।  यूँ तो बारिश का पानी भी इन खेतों में इकठ्ठा होता है, पर खेती के लिए समुचित पानी न होने पर आसपास की ट्यूबवेल लगातार चलती हैं।  धरती के पेट से पानी खींच कर धरती की छाती पर फैलाया जाता है। चूँकि खेत ऊपर नीचे हैं इसलिए हर खेत में पानी पहुंचाने की गाँव की अपनी लोकल व्यवस्था है। सड़क को और मेड़ों को काटकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि पानी वहां पहुँच सके जहाँ उसकी दरकार है। सड़क के बीच कहीं कहीं जहाँ हलके गड्ढे हो गए हैं वहां पानी इकठ्ठा हो गया है, जैसा अमूमन हर ऐसी सड़क पर होता  है। सड़क के किनारे और मेड़ों पर हरी घास उग आयी है जो इस दृश्य की मनोहरता को और भी निखार देती है। इन्हीं खेतों के बीच से लोहे के खम्बे बिजली के तार संभाले कुछ वर्षों से खड़े हैं। ये तार बहुत दूर से यहाँ आते हैं; अपने साथ उजाला लिए हुए। पहले ये तार अक्सर सुस्ताते थे पर अब ये ज्यादातर गर्म रहते हैं।  हमारे गाँव हमारा गहना भी हैं और कभी कभी हमारी लज्जा भी। पर यह सब सुन्दर है, बहुत सुन्दर....और शहर से आने के बाद तो ये दूसरी दुनिया सा ही है। एक माँ और उसके पांच साल के बेटे के लिए इस सड़क पर निकलना प्रकृति से मिलना भी है और अपनी जड़ों को पहचानना भी। 

इस बच्चे के लिए ये एक कौतूहल भरी दुनिया है। वह भाग कर माँ से आगे निकल जाता है क्यूंकि सड़क पर बीच कहीं कहीं इकठ्ठा पानी उसके लिए एक छोटा स्विमिंग पूल है और माँ के लिए एक व्यवधान, जिससे कपड़ों को बचाना है। बच्चा उत्साहित है , अब वह समझता है कि वह समझ सकता है।  उसके अपने प्रश्न हैं इन दिनों ;
बच्चा : माँ देखो कितना सारा पानी है
माँ : बेटा ये खेत हैं
खेत क्या होता है
जहाँ लोग खेती करते हैं, अनाज पैदा करते हैं
इसमें क्या बड़े बड़े पेड़ होंगे
नहीं छोटे छोटे पौधे होंगे जिन्हे फसल कहते हैं
ये लोग पानी में घास क्यों लगा रहे हैं
ये घास नहीं है, ये धान के पौधे हैं, ये धान लगा रहे हैं
धान क्या होता है
धान.... धान अनाज होता है, इससे चावल बनता है
चावल ! वह जो तुम रोज़ मुझे खिलाती हो
हाँ बेटा वही चावल

बच्चा कुछ सेकण्ड्स के लिए रुक जाता है और ध्यान से उन अधनंगे लोगों को देखने लगता है जो पानी में धान की रोपाई कर रहे हैं।  अब वो चुप है और अपनी समझ से समझ रहा है।  फिर पूछ बैठता है;

ये सारा धान हो जाएगा फिर तो इससे ढेर सारा चावल बनेगा
हाँ बेटा ढेर सारा चावल
फिर तो इन लोगों के पास बहुत सारा चावल होगा खाने के लिए

इस बार माँ चुप हो जाती है। प्रश्नों के पाँव नहीं होते पर कुछ प्रश्न अक्सर लम्बी दूरी तक साथ रहते हैं।  वो शायद उत्तर नहीं माँगते और हमारी निरुत्तरता में ही उनका उत्तर निहित होता है। ये सब कितना सरल दिखता है पर इसकी बनावट कितनी जटिल है। कुछ ही समय में बच्चा फिर अपनी धुन में भागने लगता है।  धान की रोपाई तब भी ज़ारी थी, अब भी है और आगे भी रहेगी। चावल का पता नहीं।


 

Sunday, November 8, 2020

भूलने लगे हो या कोई दिशाभ्रम है तुम्हे,
इल्म नहीं था कि इस तरह दग़ा दोगे हमें,
बेवक़्त की ख़ामोशी का अंजाम दिखाई देगा, ,
दफ़न वो भी हैं वरदान था अमरत्व का जिन्हें,

तुम्हारी चुप्पी पर वह क्यों न शर्मिन्दा हो,
कैसे यकीन करें कि तुम अब भी ज़िंदा हो;

 

Saturday, October 10, 2020

तुम्हारे हर सितम सह गया हूँ मैं,
वक़्त के पानी सा बह गया हूँ मैं,

इस संसद में तुम्हारी नुमाइंदगी से,
बिन बोले ही सब कह गया हूँ मैं,

तुम्हारी सियासत की किताबों के,
किन्ही सफ़ों में तह गया हूँ मैं,

कैसे इन चुनावों के नतीजे में,
'आप' से 'वह' बन गया हूँ मैं,

अब भी चाहो तो मुझे खर्च करो,
ये जो थोड़ा सा रह गया हूँ मैं;

 

Wednesday, October 7, 2020

 

जब डगर में तुम नहीं थे,
रात थी, अंजुम नहीं थे,
मित्रसूची में हमारी,
हम तो थे पर तुम नहीं थे,

लोचनों की मूक बानी,
दृष्टिगत थी पर न मानी,​
रच रहे थे हम स्वयं ही,
कोई मिथ्या सी कहानी;

तुम जो होते तब कथा में,
घुल ही जाते उस प्रथा में,
देख मेरी विवश काया,
विघ्न बन जाते व्यथा में;

किन्तु जीवनमार्ग जल थल,
ढूँढना पड़ता स्वयं बल,
है अनिश्चित राह चलना,
ले कर आशाओं से सम्बल;

Tuesday, September 29, 2020

भेद किंचित भी नहीं था जब नियति ने था गढ़ा,
पर सुप्त थीं सब कोशिकायें था नशा कुछ यूँ चढ़ा,
इन विसंगतियों के नाते में नहीं कुछ सूझता था,
आँख भी तब ही खुली जब सूर्य पश्चिम को बढ़ा ;

किन्तु जीवन ध्येय है कुछ सृजन का, संज्ञान का,
कर सको यदि दूर शंका स्वयं के प्रज्ञान का,
सत्य है, समुचित नहीं है मन भ्रमण, पर याद हो,
आज जो विस्तृत नहीं वह है विषय विज्ञान का,

मौन यद्यपि रहे विचलित धैर्य लेकिन बोलता है,
संकुचित मन की गिरह को धैर्य ही फिर खोलता है,
आज लघु कल दीर्घ होगा, कुछ भी आकस्मिक नहीं है,
पूर्व भी जगने से पहले रात्रि का मन डोलता है;



 

Monday, September 28, 2020

हर मलाल में भी रखा, और हर मलाल से अलग भी,
हर ख्याल में भी रखा, और हर ख्याल से अलग भी;

सज़ा न होकर भी हो, इसलिए ऐ ज़िंदगी तूने,
हर फसाद में भी रखा, और हर फसाद से अलग भी;

न सुलझाना पड़े अकेले ही, इसलिए तुमने,
हर सवाल में भी रखा, और हर सवाल से अलग भी;

थी फ़िक्र पर लाना था ज़िक्र, इसलिए,
हर जवाब में भी रखा, और हर जवाब से अलग भी ;

न लगे इल्ज़ाम, फिर भी हों बदनाम, इसलिए,
हर हिसाब में  भी रखा, और हर हिसाब से अलग भी;

 

Tuesday, September 22, 2020

सूखे उपवन उजड़े वन को,
साँसों की उखड़ी धड़कन को,
बोझ लदे इस टूटे तन को,
चलो संवारें बिखरे मन को। ​

 

Thursday, September 17, 2020

धूप, छाँव, घन, घटा, बरसात हैं ढोते,
आ ही जाते हैं कभी भी जागते सोते,
पूछती है हर गिरह यूँ नमक से धुलकर,
क्यों नहीं जज़्बातों के अवकाश हैं होते;

 

कैद करके चंगुलों में,
एक दुनिया हम विचरते,
ऐब सारे कर इकट्ठे,
खुद पर थे कितना इतरते,
सोचते थे छोड़ देंगे,
राह जब अपनी मिलेगी,
जब हथेली पर हमारी,
सांझ मर्ज़ी से ढलेगी,
राह चलते थक गए, वह मोड़ न आया,
जब मिले हम स्वयं को तब छोड़ना आया;

सोचते बस हम हैं अव्वल,
लोग हैं पर हमसे कम हैं,
राह भी बस वो ही सच है,
रखते जिस पर हम कदम हैं,
व्योम में हम सैर करते,
पंख जैसे थे पगों में,
जुड़ न पाए हम किसी से,
था अहं जब तक रगों में,
इल्म था अब तक हमारा तोड़ न आया,
जब घटाया स्वयं को तब जोड़ना आया;

 

Tuesday, September 15, 2020

मान कितना पा गए हैं,
झूठ पर इतरा गए हैं,
लांघ कर अपनी विरासत,
ये कहाँ हम आ गए हैं;

वो जो मुख न खोलते हैं,
जो सभी कुछ तोलते हैं,
बोध है अपराध उनको,
वो जो कुछ न बोलते हैं;

आज रुतबे की दमक है,
पर ये मायावी चमक है,
क्यों निरुत्तर हो स्वयं से,
दिल में जो गहरी कसक है;

कुर्सियों की ये हवस है,
आज फिर भाषा विवश है,
भय ग्रसित हैं रात से सब,
क्या पता कब तक दिवस है;

 

Thursday, September 3, 2020

वो बातें,
जो हमने कभी कही नहीं,
पर सुनते रहे जिन्हें,
आँखों से,
वो बातें,
जो घुली रहती हैं,
उन हवाओं में,
जो साक्षी हैं उस रास्ते के,
जिसे हम साथ चलते थे,
वो बातें,
जिन्हे वक़्त लगता है,
न कहने के लिए,
जो एक समझ के बाद आती हैं,
वो बातें अक्सर याद आती हैं,

​आज बस वो बातें हैं,​
और है उनका अनमनापन,
जिनके न कहने में,
था एक अपनापन,
जिसमे महका हुआ था इकरार,
वो बातें,
जिन्हें आज तुम,
कर देते हो इंकार,

अब उन बातों में,
एक टीस सी लगती है,
जिसमें कभी थी छुवन,
एक चुभन सी लगती है,
जब की तुम रहे वही,
अब भी तुम ही सही,
हमारी ज़िंदगी,
एक ख़लिश ही रही,
तुम नहीं तो क्या,
तुम्हारी चुभन ही सही।

Monday, August 31, 2020

जो लम्हे न हुए कैद उन हया सरीखी बातों में,
रहे साथ वो एक समय तक उजली पिघली रातों में,
सूख गए हैं पवन वेग से मिले हुए आघातों में,
टांग दिए थे दिन जो हमने बेमौसम बरसातों में,

Saturday, August 29, 2020

मैं तुमसे पहले आया था,
तुमसे ज्यादा चला भी,
चल रहा हूँ अब भी.... 
तुम बाद में आये बहुत,
और रुके रहे अक्सर,
रुके हुए हो अब भी,

मुझ पर खर्च हुआ थोड़ा,
पर मुझे इस्तेमाल किया ढेर सारा,
जब जिसका मन किया  ....
तुम पर खर्च हुआ ढेर सारा ,
पर तुम्हे इस्तेमाल किया थोड़ा
जब सबका मन किया,

मेरा रख रखाव भी आसान है,
एक कपडे से झाड़ कर,
कभी कहीं भी रख दिया  ....
तुम्हारा रख रखाव आसान नहीं,
एक निश्चित जगह रहे तुम,
और तकनीकी लोग रहे तुम्हारी सेवा में,

जब कि एक ही घर परिवार घराना,
फिर क्यों है ये भेद करते सभी,
मेरी शिद्दत में तो कोई कमी नहीं,
फिर जाना कि मैं शीतल नहीं,
तुम्हारी तरह,
बस यही कसूर है मेरा,

अब सुकून है ज़िंदगी में,
हमारा अपना स्वभाव है,
अपनी किस्मत भी,
तभी तो तुम बन गए,
स्प्लिट ए सी,
और हम रह गए पेडस्टल फैन ....

Tuesday, August 25, 2020

मेले में कितने झूले हैं,
कुछ को हाथ बढ़ा छू ले हैं,
कुछ की देख अजब सी काया,
अपने हाथ पाँव फूले हैं,

कुछ तेज़ी से ऊपर जाते,
पर फिर लौट धरा को आते,
कोशिश करते रहते हैं पर,
ऊपर ज्यादा टिक न पाते,

कुछ झूले हैं गोल घुमाते,
चक्कर उसपर बहुत हैं आते,
जब वो आखिर में रुक जाता,
उतर देर तक हम पछताते।

कुछ झूले लेकिन सादे हैं,
उनके नहीं बड़े वादे हैं,
उनपर वो चुपचाप बैठते,
जिनके पास सिर्फ यादें हैं।

हर झूले की अपनी मति है,
पर कुछ से अपनी सहमति है,
समझा झूलों के अनुभव से,
हर झूले की अपनी गति है।

सबकी है नाव तलैया में,
अंतर है महज़ रवैया में,
चला गया कोई छला गया,
मेलों की भूल भुलैया में। 

Sunday, August 16, 2020

कुछ इस तरह से चल रही है लेखनी जैसे,
किसी ने फिर भर दी हो स्याही दावात में,

दिन में भी लगातार गिरता है पानी जैसे,
बरस न पायी हों आँखे समूची रात में,

ज़ख्मों का दर्द भी सिमट न पाया धरा तक,
तभी रो रहा है देखो अम्बर आघात में,

हम समझते रहे वो शक्ल हमारी थी पर,
संवर रहा था सिर्फ दर्पण ज़ज़्बात में,

अब तो लगता है कसक मुकम्मल तब होगी,
जब फिर हो मुलाकात, पर दूसरे हालात में,

यूँ ही ये मौसम मददगार नहीं होते नीरज,
कुछ तो गयी बात होगी इस बरसात में।

Thursday, August 13, 2020

वक़्त से थी कामनायें,
थी बहुत सी योजनायें,
वक़्त खुद ही रूठ बैठा,
वक़्त को कैसे मनायें। 

चुक गयी बातें हमारी,
जो इकट्ठी की थीं सारी,
अब नहीं है भोर आती,
है पलक पर रात भारी।

ये नज़ारे वो नहीं हैं,
ये फुहारें वो नहीं हैं,
कैद है बूंदों में सावन,
ये बहारें वो नहीं हैं।

अब नहीं कोई कसर है,
इन दिनों हम बेअसर हैं,
अब सही से है ये जाना,
बेअसर में भी बसर है।

आज कुछ ज़िद्द पर अड़ी है,
पर ये केवल इक घड़ी है,
वक़्त ने ही था बताया,
ज़िंदगी कितनी बड़ी है।

आज बेशक दिवस खाली,
पर जगेगा जल्द माली,
जब नए प्राची के पट पर,
फिर दिखाई देगी लाली।

 

Friday, July 17, 2020

जो दबायी थी ज़मीं में उम्मीद, वो बेपरवाह सोती है,
कितना भी दो खाद पानी, कुछ बीज़ किस्मत बोती है,
वक़्त कुछ हवाओं से सहमा हुआ है इस कदर,
मास्क उतार दें तो सांस लेने में तकलीफ़ होती है।

Wednesday, July 15, 2020

पल जो आया था, पल गया यूँ ही,
कल जो आया था, कल गया यूँ ही,
ज़िंदगी फिर से तेरी चाहत में,
एक दिन और ढल गया यूँ ही।

वो सुबह का इक बड़ा सपना,
हमको लगता था जो सदा अपना,
आज सपना बदल गया यूँ ही,
एक दिन और ढल गया यूँ ही।

जो गुज़र जाती थीं हमें थामें,
वो किनारा वो अधबुनी शामें,
सोच उनको मचल गया यूँ ही,
एक दिन और ढल गया यूँ ही।

Monday, July 13, 2020

एक से हैं ये दिन, एक सी रात हैं,
तुम ये कैसे समय संकुचित कर गए;

बंद बाज़ार, सड़कें भी सूनी रहीं,
खुद चमन भी दशा देख हैरान थे,
हमने कमरों की नापी ज़मीं रोज़ ही,
घर से निकले नहीं थे, परेशान थे,

हमने फैलाये पर थे गगन में सदा,
तुम ये कैसे हमें संतुलित कर गए;

जिन ख्यालों को हम थे संजोये हुए,
वो हकीकत की इक दास्ताँ कह गए,
हाथ को हमने साबुन से धोया बहुत,
दिल में जो झाग थे, जस के तस रह गए;

राज़ जो थे छिपे राज़ ही रह गए,
तुम हमारा ह्रदय ही भ्रमित कर गए;

कुछ गगन की तरंगें भी अनजान थीं,
कुछ धरा को थे हम भी बढ़ाये हुए,
बात करते भी कैसे इस आवाज़ में,
हमने मुख पर थे कपड़े चढ़ाये हुए ;

​मौन ही मौन में हमने सब कुछ कहा,
तुम भाषाओं को, संगठित कर गए ;

​भूल बैठे मिलन की हैं रंगीनियां,​
है ये ख्वाहिश कि फिर रूबरू बात हो,
अबकी तम जो हटे तो रहे रौशनी,
​अबकी फिर से न ऐसी घनी रात हो,

अब तो आशाओं की बाट जोहेंगे हम,
तुम ऐसे हमें संक्रमित कर गए।

Saturday, July 11, 2020

ये जो सफ़ेद धब्बे हैं न,
तुम्हारी उजली पोशाक में दिखाई नहीं देते,
ये सुबकते हैं धीरे से पर सुनाई नहीं देते,
इनमें कितनी ही चीखें हैं,
जो अब गूंगी हो चली हैं,
कितनी ही आँखें हैं, बह कर,
अब सूखी हो चली हैं;
इन धब्बों में सपने हैं, झुलसाए हुए,
कितने ही बचपन हैं, मुरझाये हुए,
और ये जो काले धब्बे हैं न,
टी वी पर, समाचारों में,
जिनकी प्रचलित हैं कहानियां अत्याचारों में,
​आज कहते हो कि ये काला धब्बा ,
समाज की ​बीमारी है ,
पर तुम जानते हो,
कि इस काले रंग में स्याही तुम्हारी है;
​और ये सफ़ेद धब्बे तुम्हारे,
क्या तुम्हे इनका आभास है,
नहीं न, कहते हो मेरी पोशाक साफ़ है;
यूँ होना तो इन धब्बों का रंग लाल है,
पर सफ़ेद कर दिया, तुम्हारा कमाल है;
और कमाल है हमारा,
कि नहीं पहुँचती हम तक,
उस सुबकने की आवाज़ भी,
और चुनते ही रहते हैं हम,
सफ़ेद धब्बे ; आज भी।

Tuesday, June 30, 2020

उम्र की वीरानियों से,
सीख ये हमको मिली थी,
जो दिखती सच की गोलियां थी,
झूठ में पोसी पली थी,
तब हमारी चाहतें भी,
वक़्त से काफी बड़ी थी,
आज लगता झूठ था वो,
खुद में ही बातें बनाना,
झूठ था वो पाठ जिसमें,
राज़ था पैसे कमाना;

उँगलियों पर जो कसे थे,
सोने चांदी के कवच में,
लाल पीले रत्न जैसे,
खर्च जिसमें हुए पैसे,
आज भी बेसुध पड़े हैं,
जो लड़े हम खुद लड़े हैं,
आज लगता झूठ था वो,
रत्न से किस्मत बनाना,
झूठ था वो ज्योतिषी का,
हाथ पर रेखा गिनानां;

अब भी दरिया के किनारे,
लोग दिखते कितने सारे,
पर कहाँ वो दीखते हैं,
जो थे तिनकों के सहारे,
पाँव हमने भी धरे थे,
​पर लहर की गति से हारे,​
आज लगता झूठ था वो,
​​रेत पर खींची बहारें,
झूठ था मौज़ूदगी का,
वादा जब भी हम पुकारें;

ये मनुज की खासियत है,
जब भी पड़ता है अकेला,
जब कोई दूजा न दिखता,
ख़त्म हो जाता है मेला,
तब वो पानी खींचता है,
खुद ही खुद को सींचता है,
आज लगता झूठ था वो,
​​आसरे में कैद होना,
झूठ था सपनों को अपने,
हौसलों से न सँजोना;

Monday, June 29, 2020

न ही देर तक साथ चलने की अपेक्षा थी,
न ही दूसरी राह मुड़ने का वियोग था,
हमारा राही होना तो पहले से तय था,
तुम्हारा राह में होना एक संयोग था।

Friday, June 26, 2020

देखा होगा अक्सर,
राह चलती गाय को,
चबाते पॉलिथीन,
या फिर यूरिआ के अल्सर,
पेट में पाले हुए,
खेतों के चेहरे ग़मगीन;

देखा होगा अक्सर,
लोकल ट्रेनों में,
खचाखच भरे लोग,
या बच्चों से भरे घर,
न ही शिक्षा का योग,
न भोजन का संयोग,
फिर बड़ों का अनूठा पराक्रम,
और बुढ़ापे का वृद्धाआश्रम;

देखा होगा और भी बहुत कुछ,
रोज़ घटते बाग़ बाग़ान,
लुप्त होते,
जंगलों के परिधान,
सड़कों पर कूड़े का अम्बार,
बजबजाती नालियाँ,
मलेरिया डेंगू के सामान,

देखा ही होगा,
घटती और बेमौसम बारिशें,
फिर भी जगह जगह बाढ़,
हवा में घुलती कालिख,
फेफड़ों पर बढ़ता भार,
बचपन की आँखों पर चश्मे,
जवानी में मधुमेह की मार,
एंटीबायोटिक का कोर्स,
उच्च रक्तचाप का संसार,

और साथ ही देखा होगा,
ऊँची अट्टालिकायें,
गगनचुम्बी मूर्तियां,
क्रूज की नौकाएँ,
देखी ही होगी गति,
और छोटी होती दूरियां,
तेज़ भागता समय,
और उसको पकड़ने की मज़बूरियां,
देखा होगा मोबाइल,
और गायब होती लोरियाँ;

हमने अपने लिए,
कितना साज़ो सामान जुटाया है,
पर भूल जाते हैं हम,
कि कितना कुछ लुटाया है,
कल हम और जुटायेंगे,
और अधिक डेवलप्ड कहलायेंगे,
यूँ तो चढ़ते रहते हैं हम,
कभी न ख़त्म होने वाली,
सीढ़ियों पर,
पर छोड़ जाते हैं,
अपनी लापरवाहियों के निशां,
आने वाली पीढ़ियों पर।
इस कोरोना ने हम सब को,
कुछ यूँ दिया है झटका,
 
जैसे भरते रहे ऊपर से,
पर नीचे फूटा हो मटका,

जैसे गिरा हो आसमान से,
पर रहे ख़जूर पर अटका,

जैसे लटकाई हो नीम्बू मिर्च,
पर फेल हो गया हो टोटका, 

जैसे चढ़ाया हो मास्क,
और थूक दिया हो गुटखा,

Wednesday, June 24, 2020

एक दिन खिलौना टूट गया,
और फिर जुड़ा नहीं,
बच्चा रोया घंटा भर,
फिर भूल गया,
रोने में नहीं था कोई सम्मान,
भला कहीं खिलौने में भी ,
होती है जान !

एक दिन किसी अपने की,
टूट गयी सांसें,
फिर न लौटीं,
हमने भी इंतज़ार नहीं किया,
पता था की टूटी सांसें,
फिर जुड़ती नहीं,
बस दिल में बसा ली यादें,
जीवन भर के लिए !

​एक दिन टूट गया दिल,
और लगा की फिर जुड़ेगा नहीं,
​पर ऐसा हुआ नहीं,
वक़्त से साथ पता लगा,
दिल की तो फितरत है,
जुड़ना टूटना और फिर जुड़ना !

हम भूल जाते हैं कि,
मायूसी की उमर,
अधिक से अधिक
एक रात होती है,
उसके बाद की ग्लानि,
हमारे अपने हौसले पर,
आघात होती है।

Saturday, June 20, 2020

अबकी,
जो गए तुम,
तो आये हो,
फूलों से लदे,
बड़की ट्रक में,
कितनी बड़ी फोटू लगी है,
तुम्हारी हर जगह,
बीसन गांव के लोग,
सड़क पर जमा हैं,
बड़ी जयकार हुई है,
तोहरे नाम की,
बाबू न कहते थे,
बड़े गाजा बाजा के साथ,
आएगा एक दिन,
तिलक बेटवा का,
पर अबकी माई,
शरबत न घोली,
न ही माठा गुड़ लाई,
बस बैठी रही दुआरे,
दूसरी औरतन के बीच,
अबकी बाबू भी न बोले कुछ,
​उनको झण्डा मिला है,
जन गन मन वाला,​
बड़के ओसारे में,
खूँटी के ऊपर,
है फोटू तुम्हारी,
और खूँटी पर,
टांग दिया है हैंगर में,
वो चितकबरी वर्दी,
जो थी,
तुम्हारी दूसरी चमड़ी।  

Friday, June 19, 2020

जब से डर था कि मौसम रहे न रहे,
तब से बूंदों में बदरी बहक आयी है।
रात भर आँधियों में छुपी सिसकियाँ,
दिन में पलकों पे सिहरन सिमट आयी है।
प्रीत के पाँव में जब से छाले पड़े,
तब से राहों की किस्मत उभर आयी है।

एक उम्मीद में है ये कैसा असर,
घर से लेने उसे पालकी आयी है।

धूप में तर बतर जो थे अरमां हुए,
चांदनी में फ़िज़ां देखो छत आयी है।
उसके रहने का ऐसा असर कुछ हुआ,
फिर से चेहरे पे रंगत निखर आयी है।

Wednesday, June 17, 2020

हमारे मूंह का निवाला ही तुम्हारे शाम की बोटी है,
ये जो परदों पर कहते हो तुम, हर एक बात खोटी है,
कोई तो बड़ा डर तुम्हें ज़रूर रहा होगा वरना,
हमारी तो हसरत भी तुम्हारी कामयाबी से छोटी है।

Saturday, June 13, 2020

पिछले दो दिन दर्द में गुज़रे ; दर्द जिसका कोई एक रूप नहीं होता।  जिसे कभी कभी सहन करते हुए हम पहन भी लेते हैं और फिर जल्दी उतार नहीं पाते।  लगातार दो दिन उमस से हावी रहा और शाम को आंधी बारिश की सौगात मिली; फिर साथ ही मिली बिजली की कटौती जो देर रात तक न जुड़ी।  बचपन में गांव का घर कच्चा था और रोज़ रात दुआरे खटिया डाल कर उस पर कथरी बिछा देते थे।  तारों को निहारते कहीं से नींद चुपके से आ जाती थी ; भोर हमेशा एक सौगात होती थी जो हम आम के बागों में खर्च कर देते थे। आज बिजली न होना भी दर्द हो गया है ; हालाँकि बाकी मिले दर्द से ये सब से कम था।

उमस के साथ पुरानी स्लिप डिस्क नींद से जग गयी और आज तीसरे दिन भी नहीं सोयी; ये जब भी जगती है, हफ्ते भर के पहले नहीं सोती।
तब बैठना भी किसी कठिन व्यायाम जैसा ही लगता है, एक मिनट से अधिक नहीं हो पाता। अधलेटा होकर लैपटॉप चलाने में महारत हासिल हो गयी है पिछले कुछ सालों में इसकी बदौलत। इसका दर्द एक सिहरन सी दौड़ा देता है ; जैसे कोई बिजली सी कौंधी हो अचानक पीठ से। कभी सोचा न था कि ये दर्द सच्चा साथी बन जाएगा।

एक दर्द आशंका से जन्मता है ; इस दर्द में मज़बूरी भी होती है और डर भी। ये कोरोना का भय नहीं था; किसी बेहद अपने के दिल के साथ दिल्लगी की चिकत्सीय प्रक्रिया थी। इस दर्द में आशा भी थी और आशंका भी।  ये रहेगी अभी कुछ दिन और आई सी यू के अंदर और बाहर; जीवन जीवित भी तब ही होता है जब वेंटिलेटर का साथ छोड़ देता है।

फिर एक दर्द और है जो है भी और नहीं भी।  जिस पर ऊँगली नहीं रख पाते; पर जिसे हम अनजाने में मोल ले लेते हैं किसी बिसाती से जो इसे बेचना नहीं चाहता। ये अजीब है, क्यूंकि इसे आप पर थोपा नहीं गया ; ये अजीब है क्यूंकि मिश्रित है।  ये हमें ऑक्सीजन नहीं देता पर जीने देता है।  ये तब होता है जब हम किसी को न समझ पाते हैं न ही समझा पाते हैं।  घर के अंदर भी और घर के बाहर भी; और खासकर के तब जब उम्मीद और हकीकत का समन्वय नहीं हो पाता।  जब हम जीवन से वो मांगने लगते हैं जो बिना आधे जीवन को नष्ट किये बगैर संभव नहीं होता।

पर ये सब दर्द मेरे अपने हैं ;

Friday, June 12, 2020

जो साथ बिताये लम्हे हैं, वो सब तो याद रहेंगे ही,
जो साथ बिताया दुरी से, तुम उसको नहीं भुला देना।

वो बातें जो गुपचुप से की, उनकी ठंडी तासीर रही,
वो जम जायेंगी चुप्पी में, उन्हें थोड़ा हिलाडुला देना।

जो धुएँ में लिपटे लम्हे थे, जो कांच सरीखा शामें थी,
वो अलग अलग हो जायेंगे, उनको भी मिलाजुला देना।

अंदेशा कुछ पहले से था, जो राज़ बताये थे तुमने,
मैंने भी ठान लिया था तब, बस सुनकर उन्हें सुला देना।

वो साथ ठिठोली बातों का, वो मस्त ठहाका जीवन का,
मैं साथी मुक्त हँसी का हूँ, तुम मुझको नहीं रुला देना।

Thursday, June 11, 2020

एक दिवस,
जब गल जाए साबुन सारा,
और उड़ जाए सेनिटाइज़र की अलकोहल,
जब बंद हो जाएँ मास्क के छिद्र,
और दो गज दो कोस लम्बा हो जाये,

एक दिवस,
जब रेल  की जगह ,
बैलगाड़ियाँ हों पटरी पर,
जब माँग सूनी हो सड़क की,
और हवाई यात्रा हो बस परिंदों की,

एक दिवस,
जब टूटी पड़ी हों,
ऑफिस की कुर्सियां,
और छत्तों की तरह लटके हों,
चमगादड़ ऊँची ऊँची बिल्डिंग में,

एक दिवस,
जब जंग लग गया हो,
नाल में बन्दूक की,
और तोप टैंकों पर खेलते हों,
बन्दर उछल उछल कर,

उस दिवस भी,
बहेगी कविता निश्छल,
और हम रहेंगे दूर उतना ही,
जितना रहते हैं इन दिनों,
उस दिवस भी रहेंगे हम अनुमान ही 


Saturday, June 6, 2020

बीते कुछ दिनों से एक अजीब सी आशंका ने कहीं कोने में अपनी एक चारपाई डाल दी है। अजीब इसलिए क्यूंकि ये भयभीत नहीं करती किन्तु किसी अनहोनी की एक दरी बिछा देती है उस चारपाई पर। ये ज़िंदगी ख़त्म करने का अंदेशा नहीं देती पर ज़िंदगी बढ़ने में कुछ रोड़े अटका देती है। रोज़ रात ये चारपाई मेरे करीब खिसकती रहती है, और मैं रोज़ ज़मीन पर अपना बिछौना थोड़ा और दूर कर लेता हूँ। भय से नहीं, आशंका से।  यूँ भी हम स्वप्न में अनहोनी के लिए कहाँ तैयार रहते हैं, और हक़ीक़त में तो बिलकुल नहीं। पर बीते कुछ दिनों से मैं ज़मीन पर ही सोता हूँ। 

सोमवार से ऑफिस खुल जाएगा शायद और उसके साथ ही समाप्त हो जायेगी दो महीने की मशक्कत जो  घर बैठ कर की......... उस ऑफिस के लिए जो एक हफ्ते में हमें रिप्लेस कर देगा यदि कल हम न रहे। सब निरर्थक जान पड़ता है, कहाँ जा रहे हैं, क्यूँ जा रहे हैं , जा  भी रहे हैं या वहीँ खड़े हैं....... कितने ही प्रश्न रोज़ दफ़्न हो जाते हैं और मिट्टी गीली रहती है अगले दिन भी। कोई तो है जो इसे सूखने नहीं देता.......पर कौन....... अपना बिछौना थोड़ा और खिसका लेता हूँ।

Friday, June 5, 2020

मंज़र हसीन था पर देर तक रहा नहीं,
एक सच वो भी है जो हमने कहा नहीं,
बात आंकने की वजह ज़रूर होगी पर,
एक सच वो भी है जो तुमने सुना नहीं;

Tuesday, June 2, 2020

वो जो तुम कहते थे कि ये वक़्त न चुकेगा,
और कुछ भी हो मौसम पर प्रेम न झुकेगा,
वो सब अब थोड़ा खोखला लगता है मगर,
मेरा इंतज़ार भी तुम्हारे चलने तक रुकेगा।

Monday, June 1, 2020

एक दिन जब अड़ जाए ऊष्मा,
और शीत ढूंढ़ती रहे ठिकाना,
एक दिन जब पिघल जाएँ मेघ,
पर तर न हो पाए वसुंधरा,
एक दिन जब न उठ पाएं हम,
और सुबह सुबकी हुई आये,
एक दिन जब तुम पीछे देखो,
और पाओ पैरों के निशां,
उस दिन, केवल उस दिन,
याद करना वो एक मील,
साथ चला था जिसे,
उन बोझिल दिनों में,
उस दिन, केवल उस दिन,
जगा देना हमें,
चंद लम्हों के लिए।

Saturday, May 23, 2020

वज़न हो शायरी, पर दर्द तोला जा नहीं सकता,
तुम्हारी महफ़िलों में भी वह बोला जा नहीं सकता,
किसी भी ज़िद्द के आगे झुक तो हम जाते हैं लेकिन,
ये कुछ राज़ ऐसा है कि खोला जा नहीं सकता।

किसी दिन बैठ तीरे देख लेंगे सूर्य का ढलना,
और लहर की गोद में फिर चाँद का पलना,
तब समझ जाना जो अब तक होंठ न बोले,
हाथ थामे रेत में तब दूर तक चलना।

कुछ राज़ हैं ऐसे जो अक्सर दिल में हैं सोते,
जब मिले हम सा कोई चुपचाप हैं रोते,
शोर कितना भी मचायें महफ़िलों में हम,
दिल के सबसे बोल मीठे मूक हैं होते।




Thursday, May 21, 2020

जैसे जैसे कोरोना के केस देश में बढ़ते जा रहे हैं, वैसे वैसे ही जीवन कुछ कुछ आम होता जा रहा है। अब हम उतनी सतर्कता भी नहीं बरत रहे हैं  जितनी शुरूआती दिनों में बरत रहे थे। अब अर्थव्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गयी है , शायद कहीं ज्यादा। जेबों में कुछ पैसे रहेंगे तो शायद लड़ सकें किसी भी बीमारी से। पर किनकी जेबों में ? खैर ! मुहँ ढंकने से ज़िंदगी तो नहीं ढंकी जा सकती।

घर बैठे ऑफिस का काम करते करते यह एहसास हुआ की वक़्त अब भी सीमित है, पहले की तरह।  घर के काम की अहमियत अब  भी नहीं है, पहले की तरह।  छत की टंकी का पानी अब भी ख़त्म हो जाता है, पहले की तरह।  और कुल मिलकर हम अब भी वहीँ हैं, जहाँ पहले थे, पहले की तरह।

पर कुछ तो बदला है, किसी के लिए तो बदला है।  उनके लिए बदला है जिनके घर के लोग पीड़ित हुए या पीड़ित के इलाज़ में सहयोग कर रहे हैं। उनके लिए बदला है जिनके पैरों में चलते चलते छाले पड़ गए।  उनके लिए बदला है जिनका भविष्य अपने भूतकाल में चला गया है।  कितनी ही कहानियाँ आगे सुनाने के लिए तैयार हो गयी हैं , हो रही हैं। अधिकतर दुखदायी हैं , न तो कोई राजकुमार घोड़े पर बैठ कर किसी को बचाने आता है, न ही कोई मेंढक किसी राजकुमारी के छूने से राजकुमार बनता है।  अलबत्ता लकड़हाड़े की कुल्हाड़ी ज़रूर खो जाती है..... और फिर मिलती नहीं।

बाहर लगे पौधे में रोज एक नया कड़ी पत्ता बढ़ जाता है ; हल्का और मुलायम , पर अपनी निश्चित महक लिए हुए।  ये किसी विश्वास की आशा है....या शायद आशा का विश्वास।

Monday, May 18, 2020



जिसके श्रम पर नाज़ करता नभ ये सारा था,
वो जो बस टूटे हुए तारों से हारा था,
आत्मनिर्भर यूँ बना वो काली सड़कों का,
रात में जिसका सदा जुगनू सहारा था।

​अब दिशाभ्रम है, तिमिर का जागता भय है,
और पैरों में कहाँ वो पहली सी लय  है,​
​फंस चुकी है अब भंवर में इस कदर ​नौका,
​किनारे पर पहुँचने के लिए अब डूबना तय है। ​
चाँद नींदों में कहीं ढलता तो होगा,
हाथ जो खाली रहे खलता तो होगा,
चाँदनी को जिस तरह सब ने दुलारा है,
सूर्य भी संताप में जलता तो होगा।

Sunday, May 17, 2020

एक दिन घर से निकल हम,
राह लम्बी पर चले थे,
थे ये पग छोटे हमारे,
हम भी दीवाने बड़े थे।

पर जो हम निकले अकेले,
सोच कर चलना अकेले,
राह  में मिलते रहेंगे,
इल्म न था इतने मेले।

रास्तों की दूरियों में,
कितने ही जन पास आये,
कितनो ने फिर राह बदली,
कितने ही चल साथ आये।

फूल कितनों ने बिखेरे,
कितनों ने काँटे बिछाये,
कितनों ने रोशन किया पथ,
कितनों ने मलहम लगाये।

जो सफ़र तय कर चुके हैं,
उसमें कुछ निश्चित नहीं था,
जो सफ़र अब बच गया है,
उसमें कुछ निश्चित नहीं है।

है ज़िन्दगी लेकिन बताती,
राह सब की तय है निश्चित,
दूरियाँ हों कम या ज्यादा,
इक सफ़र सब का सुनिश्चित।

एक दिन रुक जाएंगे हम,
नींद में सूत जाएंगे हम,
चाहे जितना तब पुकारो,
फिर नहीं चल पाएंगे हम।

तब न कुछ फ़रियाद रखना,
कुछ न दिल में बात रखना,
जो सफ़र थे संग चले हम,
उस सफर को याद रखना।

Friday, May 15, 2020

आज दूध फट गया ; सुबह की शुरुआत ने ही बता दिया की आज पनीर जैसा कुछ खायेंगे ; हम आसानी से स्वयं को ढाँढस दे देते हैं कि हर छोटी दुर्घटना में एक सुखद घटना छिपी है। यह आम इंसानी प्रवृत्ति है.....कुछ वैसे ही जैसे गर्मी में धुल भरी आंधी चलने पर घर की पुनः सफाई करनी पड़ती है पर हमें संतोष रहता है कि मौसम तो थोड़ा ठंडा हो गया।  आप सोचोगे कि दूध फटने की छोटी सी घटना को इतना तूल क्यों, पर यकीन मानिये, इस लॉकडाउन में दो लीटर दूध आसानी से नहीं आता।  आसानी से तो बस इन दिनों पसीना आता है और कोरोना के समाचार देखते देखते शरीर के अंदर तक सूख जाता है। कभी ध्यान से सोचा न था कि ये खारापन जो बाहर निकल रहा है, ये हमारे अंदर भरा हुआ है।

तीसरे लॉकडाउन की अवधि समाप्त होने को है ; चौथा एक सस्पेंस है जिसे मोदी जी ने पिछले प्रवचन में इसलिए नहीं बताया क्यूंकि उन्हें भी मालूम नहीं था। रोज़ वित्त मंत्री शाम चार बजे आर्थिक पैकेज को समझाती हैं और किसी को समझ नहीं आता ; खुद उन्हें भी नहीं।  किसी भी घोषणा का सबसे अहम् पहलु उसका क्रियान्वयन होता है और यहीं पहुंचकर हमारे राशन कार्ड ऑउटडेटेड हो जाते हैं।  मज़दूरों का पलायन इन सभी घोषणाओं से अनभिज्ञ रहता है ; सड़क की लम्बाई और परिवार की चौड़ाई नापना ही इस समय उनका उद्देश्य है और ज़रूरत भी।   किसी दिन अगर पेट भरा होगा तो पेट ढंकने की भी सोचेंगे ।

कितनी ही आशंकायें घिर आयी हैं जिनका जवाब महज़ अपनी अपनी समझ है ; क्या जीवन फिर वैसा हो पायेगा जैसा था? पर वैसा क्यों चाहते हो ; याद नहीं उस समय इसी जीवन को कितना कोसा करते थे।  कमी अहमियत का एहसास भी है और विज्ञान का आविष्कार भी। सांस लेने के लिए मास्क लगाना भी है और उतारना भी; समय की माँग जीने की लालसा के साथ एक एग्रीमेंट कर चुकी है।  इंसान एडजस्ट कर रहा है।  कभी फिर से वह प्रकृति पर भारी होगा; इतना आसान नहीं है हमें कोई पाठ पढ़ाना ।

कहीं दूर किसी गांव में एक परिवार दो हज़ार किलोमीटर का सफर कर अपने घर पहुँचता है।  हिम्मत अपनों से लिपट कर फफक कर रो पड़ती है।
दालान की कच्ची दीवार पर कुछ आँसुओं के धब्बे कई सालों तक नहीं सूखेंगें ।

Wednesday, May 13, 2020

एक और गर्म दिन गुजरने की कगार पर है ; अब कुछ नया होता भी है तो नया नहीं लगता।  आज एक कारीगर जिसकी कुछ रकम बकाया थी, अचानक ही आ पहुंचा और अपना चेक लेकर गया।  लॉकडाउन के एकाकीपन में उसे मैं लगभग भूल ही गया था , पर चूँकि वह प्रवासी कारीगर नहीं था, इसलिए आ पहुंचा। कैसे हम देना भूल जाते हैं और लेना हमेशा याद रहता है।  पर पैसे की अहमियत इन दिनों वैसी नहीं रही जैसे पहले हुआ करती थी। पहले जो यकीन बचत में था अब वही बचत कम यकीन करने में है।  वक़्त की पगडण्डियों में अगर हम भीड़ में न चलें तो धूल हमारे पीछे ही उड़ती है।  थोड़ी सी आस है जो अभी संक्रमित नहीं हुई है ; इसी को रोज सैनिटाइज़ करते रहता हूँ। मोबाइल पर मैसेज बताता है कि मेरे अकाउंट से साढ़े छह हज़ार रुपये कम  हो गए।  गज़ब की फुर्ती दिखाई बैंक की कारीगिरी ने।  खैर दिन निकल ही गया ; ऊपर के कमरे का पंखा आज भी आराम न कर पाया।

कॉलोनी में किसी का जन्म दिन था और हर घर में उसने केक और वेजिटेबल पफ पहुंचा दिए।  कहने लगा की बाहर से आर्डर पर बनवाया है। मैंने भी ऐसी कृतज्ञ आँखों से उसे देखा जिससे उस की उम्र कम से कम एक लॉकडाउन जितनी तो बढ़ ही गयी होगी। अब जीभ का क्या है, चखती है तभी तो बोलती भी है। शाम की चाय तुलसी के सानिध्य में अदरक और थोड़ी सी काली मिर्च के साथ जब खौलती है तो और काली दिखती है ; पर दूध के आलिंगन से उसका भी रंग निखर जाता है। हमारे रंग साथ ढूँढ़ते हैं; उन रंगों का जो हमें हल्का या गाढ़ा कर सकें। यह सब इतना सरल है कि रोज़मर्रा में दिखाई ही नहीं देता।  सरलता सदा से अपनी मौजूदगी में अदृश्य रही है ; उन्हें कोई नहीं जानता जो खुद को दिखा नहीं पाते हैं। आज दिन भर एक  ए सी बंद होता और चलता रहा।  कृत्रिम ठंडक प्राकृतिक ग्रीष्मा से खिलवाड़ करती रही। अचानक मन में ख्याल आया की किसी समय यदि पारा हद से ज्यादा बढ़ जाए तो ये ए सी भी काम करना बंद कर देगा।  यूँ ही कोरोना न आया होगा। याद आया कि अभी हाल में पढ़ा था कहीं ; शायद हम इंसान इस धरती के वायरस हैं और कोरोना है वैक्सीन।

Tuesday, May 12, 2020

इस बार आयी गर्मी में पसीना नहीं रुकता , कितनी ही जगह आंधी और बारिश हुई पर मज़ाल है कि यहाँ सूर्य के समक्ष कोई टिक पाए।  आज कुछ बादल ज़रूर नज़र आये..... छिटके हुए जैसे मज़दूर पलायन कर रहे हों इन दिनों।  अचानक ही गायब भी हो गए , या फिर शायद कोई रेल की पटरी हो वहाँ भी ; आखिर मज़दूर तो कहीं भी मज़दूर ही रहता है।

कुछ रात पहले चाँद बहुत उज्जवल दिखाई दे रहा है, शायद करीब आ गया था  कुछ धरती से ; अब उसे भी सोशल डिस्टैन्सिंग के मायने पता लग गए।  ये समय जो करा दे कम है। मेरे मोबाइल फोन की बैटरी भीष्म पितामह बन चुकी है , मृत्यु शैय्या पर अक्सर उसे बिजली की ऊर्जा देकर जीवित रखना पड़ रहा है।  अंतिम साँसे तकलीफ भी हो सकती हैं और राहत भी ; ये इस पर निर्भर करता है की इन अंतिम घड़ियों में पहुँचने के लिए किस हद तक की पीड़ा से गुज़रना पड़ा है।  दूर कहीं मालगाड़ी की आवाज़ पटरियों को जीवित रखती है।

मोदी जी आये और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा कर चले गए ; कह गए की लोकल को ब्रांडेड बनाना है।  कह गए कि आपदा भी एक अवसर है खासकर के तब जब आपदा का जीवन काल निर्धारित नहीं हो।   मुझे लगता है कि  यह अवसर कम है और मज़बूरी अधिक ; पर सीमित विकल्पों के मध्य संयम कब तक अपनी ही परीक्षा लेता रहेगा। बीस लाख करोड़ रुपयों से एक देश की आत्मनिर्भरता की नींव रखी जायेगी; मुझे इसका मतलब नहीं पता। वाणिज्य और अर्थशास्त्र से मेरा नाता मेरे बैंक के खाते की पासबुक तक ही सीमित है..... और उसकी भी स्थिति कुछ कुछ मेरे मोबाइल फ़ोन की बैटरी जैसी ही है।

कहीं से दो पैग मिल जाते तो नींद को आत्मनिर्भर बना पाता। 

Monday, May 11, 2020

कभी इतना शोर नहीं था कि  कानों को सुनाई ही न पड़े; कभी ऐसा समां भी न था कि आँखों को दिखाई ही न पड़े। दहलीज़ की चौखट पर हथेलियों के निशान उभर आये हैं। किसी का भी तो इंतज़ार नहीं है, फिर वहां क्यूँ बैठे रहे जहाँ पायदान रहा करता था। वह सब जो इतना आसान था कि कभी उस बारे में सोचते भी न थे, अब अपना मुहं बाये खड़ा रहता है। आशंकाओं का दौर धीरे धीरे कोई हादसा बनकर पेशानी पर दिखाई देने लगा है।
सब चुप रहते हैं ; अनमने मन से अनमने से काम अपनी गति से अंजाम पाते रहते हैं। जिन बातों को करने में एक उम्र काम पड़ती थी वो कुछ दिनों में ही हमें खाली कर गयी। ये वक़्त की करवट है या इंसानी गुरुर की पर अब हर दिन का सूरज कुछ खिसियाया हुआ ही निकलता है। 
कहते हैं अब इसी के साथ जीना है, कहते हैं कि बहुत दिनों तक हमारे मुहँ ढके रहेंगे। कहते हैं कि बहुत दिनों तक ख़ामोशी की सांसें किसी कोलाहल का मोहताज़ रहेंगी।

Saturday, May 9, 2020

हमारे स्वप्न को मज़बूर ये भरपूर करता है,
इकठ्ठा हो गया था जो अहं वो चूर करता है,
कभी सोचा न था परदों से होगा इतना याराना,
ये कैसा रोग है नज़दीकियों को दूर करता है,

Thursday, May 7, 2020

जब परिन्दा पंख से ही बेखुदी कर ले,
या शमा भी शाम को ही ख़ुदकुशी कर ले,
डूब जाए यदि अमावस से ही पहले चाँद भी,
और ग़म अपने ही दिल से बुज़दिली कर ले,

तब किसी से मिल भी लें तो रूबरू क्या है,
तब ह्रदय में रौशनी की ज़ुस्तज़ू क्या है,
हार हमने मान ली जब खुद की ही खुद से,
तब आरज़ू क्या है, तब गुफ्तगू क्या है

पर अगर हम हौसलों से काम लेंगे पंख का,
और मन में प्रज्जवलित करते रहेंगे ये शमा,
फिर उजाले रात में नहीं चाँद का मोहताज़ होंगे,
दिल्लगी तारों से करके गम करेंगे हम ज़ुदा,

तब किसी से मिल भी लें तो रूबरू सुख है,
तब ह्रदय की रौशनी की ज़ुस्तज़ू सुख है,
हार जो हमने न मानी जब विषम में भी,
तब आरज़ू सुख है, तब गुफ्तगू सुख है

Wednesday, May 6, 2020

याद है उन दिनों जब शहतूत फलते थे,
गिलहरियों को पहले मिल जाते थे,
और हम हाथ मलते थे।
फिर हमने तरीका सीखा,
संतुष्टि को अँजुरियों में रोपना सीखा,
हमने सीखा कि,
गिलहरियों का भी अपना मान है,
और हमारी संतुष्टि में ही,
हमारा सम्मान है,
पर तब हम छोटे थे।

बड़े होते होते सीख लिया हमने,
खुद भी कमाना,
थोड़ा सा खर्च करना,
और बाकी को,
हया की ओट में छिपाना,
सोचा था खर्च करेंगे इसे,
जब आएगा अपना ज़माना,
सच छिपाया, झूठ छिपाया,
छिपाई कुछ बातें खरी,
पता था, नींद में है गिलहरी।

इतना छिपाया की भूल गए,
भूल गए कि कहाँ क्या रख दिया,
कहाँ रख दिया वो जाम जो तब न पिया,
वो आधा लड़कपन जो तब न जिया,
कहाँ रख दी सच की वो सादी कहानी,
कहाँ रख दी झूठी पर थोड़ी जवानी,
कहाँ रख दी कमाई जो की उम्र भर,
कहाँ रख दी शामें, कहाँ रख दी सहर ।

ये जो हम रख कर खर्च करना भूल गए,
ये वो लम्हे थे जो कमाए, पर फ़िज़ूल गए,
एक दिन नींद खुल जायेगी गिलहरी की,
और ढूंढ लेगी वो सारे अखरोट,
छिपा रखें थे जिन्हे,
इसकी ओट....उसकी ओट ।

Sunday, May 3, 2020


तब तक ही तो असल कांति है,
जब तक चारों ओर शांति है,
यदि विरोध ये बादल कर दें,
तब तुम सजल बरस जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ आंधी,
मेरा बवण्डर बन जाना। 

मन की गति कितनी अस्थिर है,
इसमें इच्छायें गर्भित हैं,
जब मनचला समय हो जाए,
तुम निर्विवाद संयम हो जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ हावी,
मेरा 'निरंतर' बन जाना।

आज सँजोया कितना कुछ है,
लेकिन ये क्षणभंगुर सुख है,
जब भी नियति ग्रास मुख खोले,
तब कुबेर तुम हो जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ त्यागी ,
मेरा समंदर बन जाना।

जब इंकार दिशाएं कर दें,
या हुंकार हवाएं भर दें,
जब आभास भी संभव न हो,
तब तुम धृव तारा हो जाना
जिस दिन मैं हो जाऊँ बागी,
मेरा दिगन्तर बन जाना।

एक दिवस जब सफर ओढ़ लें,
पैमानों से नज़र मोड़ लें,
जब रस्ता हो जाए कलंदर
साफ़ कमलजल बन जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ जोगी,
मेरा कमण्डल बन जाना।