इस मौसम में गाँव में आना एक बेहद सुखद अनुभूति है। बारिशें रुक रुक कर आती रहती हैं.... कुछ वैसे ही जैसे अपने शहर के घर में दरवाज़ा खुला रखने पर वह बिल्ली का बच्चा बार बार घुस जाता है। इस समय हरियाली हर तरफ यूँ लगती है मानो किसी ने हरा ब्रश फेर दिया है हवा में और उस हवा ने रंग दिया है सब कुछ। इस हलके से पहाड़ी गाँव के भी दो हिस्से हैं ; एक जो थोड़ा ऊपर को है और जहाँ अधिकतर घर हैं। वहां बारिश का पानी नहीं टिकता और बह कर थोड़ा नीचे तलहटी में आ जाता है जहाँ पर खेत हैं। यूँ तो यहाँ के मकानों में ईंट और सीमेंट का भी प्रयोग हुआ है पर ढेर सारे मकान पत्थरों के भी हैं ; चितकबरे और काले पत्थर जो आसपास की बंजर पहाड़ियों में आराम फरमा रहे थे। ये सस्ते भी मिल जाते हैं और अपने से भी लगते हैं, और घरों की बाउंड्री बनाने में इनका बेपनाह इस्तेमाल हुआ है।
इन्हीं घरों के किनारों से ये पतली सड़क नीचे उतरती है , दिखने में तो ये सड़क एक चौड़ी पगडण्डी सी लगती है पर इसके रख रखाव पर हर साल ध्यान दिया जाता है। किसी समय इस सड़क पर बजरी डाली गयी थी और काली मिटटी से मिलकर यह अब काफी ठोस हो गयी है। सड़क की हलकी ढलान की उतरन पर दोनों तरफ के खेत पानी से भरे हुए हैं। यूँ तो बारिश का पानी भी इन खेतों में इकठ्ठा होता है, पर खेती के लिए समुचित पानी न होने पर आसपास की ट्यूबवेल लगातार चलती हैं। धरती के पेट से पानी खींच कर धरती की छाती पर फैलाया जाता है। चूँकि खेत ऊपर नीचे हैं इसलिए हर खेत में पानी पहुंचाने की गाँव की अपनी लोकल व्यवस्था है। सड़क को और मेड़ों को काटकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि पानी वहां पहुँच सके जहाँ उसकी दरकार है। सड़क के बीच कहीं कहीं जहाँ हलके गड्ढे हो गए हैं वहां पानी इकठ्ठा हो गया है, जैसा अमूमन हर ऐसी सड़क पर होता है। सड़क के किनारे और मेड़ों पर हरी घास उग आयी है जो इस दृश्य की मनोहरता को और भी निखार देती है। इन्हीं खेतों के बीच से लोहे के खम्बे बिजली के तार संभाले कुछ वर्षों से खड़े हैं। ये तार बहुत दूर से यहाँ आते हैं; अपने साथ उजाला लिए हुए। पहले ये तार अक्सर सुस्ताते थे पर अब ये ज्यादातर गर्म रहते हैं। हमारे गाँव हमारा गहना भी हैं और कभी कभी हमारी लज्जा भी। पर यह सब सुन्दर है, बहुत सुन्दर....और शहर से आने के बाद तो ये दूसरी दुनिया सा ही है। एक माँ और उसके पांच साल के बेटे के लिए इस सड़क पर निकलना प्रकृति से मिलना भी है और अपनी जड़ों को पहचानना भी।
इस बच्चे के लिए ये एक कौतूहल भरी दुनिया है। वह भाग कर माँ से आगे निकल जाता है क्यूंकि सड़क पर बीच कहीं कहीं इकठ्ठा पानी उसके लिए एक छोटा स्विमिंग पूल है और माँ के लिए एक व्यवधान, जिससे कपड़ों को बचाना है। बच्चा उत्साहित है , अब वह समझता है कि वह समझ सकता है। उसके अपने प्रश्न हैं इन दिनों ;
बच्चा : माँ देखो कितना सारा पानी है
माँ : बेटा ये खेत हैं
खेत क्या होता है
जहाँ लोग खेती करते हैं, अनाज पैदा करते हैं
इसमें क्या बड़े बड़े पेड़ होंगे
नहीं छोटे छोटे पौधे होंगे जिन्हे फसल कहते हैं
ये लोग पानी में घास क्यों लगा रहे हैं
ये घास नहीं है, ये धान के पौधे हैं, ये धान लगा रहे हैं
धान क्या होता है
धान.... धान अनाज होता है, इससे चावल बनता है
चावल ! वह जो तुम रोज़ मुझे खिलाती हो
हाँ बेटा वही चावल
बच्चा कुछ सेकण्ड्स के लिए रुक जाता है और ध्यान से उन अधनंगे लोगों को देखने लगता है जो पानी में धान की रोपाई कर रहे हैं। अब वो चुप है और अपनी समझ से समझ रहा है। फिर पूछ बैठता है;
ये सारा धान हो जाएगा फिर तो इससे ढेर सारा चावल बनेगा
हाँ बेटा ढेर सारा चावल
फिर तो इन लोगों के पास बहुत सारा चावल होगा खाने के लिए
इस बार माँ चुप हो जाती है। प्रश्नों के पाँव नहीं होते पर कुछ प्रश्न अक्सर लम्बी दूरी तक साथ रहते हैं। वो शायद उत्तर नहीं माँगते और हमारी निरुत्तरता में ही उनका उत्तर निहित होता है। ये सब कितना सरल दिखता है पर इसकी बनावट कितनी जटिल है। कुछ ही समय में बच्चा फिर अपनी धुन में भागने लगता है। धान की रोपाई तब भी ज़ारी थी, अब भी है और आगे भी रहेगी। चावल का पता नहीं।