Saturday, June 13, 2020

पिछले दो दिन दर्द में गुज़रे ; दर्द जिसका कोई एक रूप नहीं होता।  जिसे कभी कभी सहन करते हुए हम पहन भी लेते हैं और फिर जल्दी उतार नहीं पाते।  लगातार दो दिन उमस से हावी रहा और शाम को आंधी बारिश की सौगात मिली; फिर साथ ही मिली बिजली की कटौती जो देर रात तक न जुड़ी।  बचपन में गांव का घर कच्चा था और रोज़ रात दुआरे खटिया डाल कर उस पर कथरी बिछा देते थे।  तारों को निहारते कहीं से नींद चुपके से आ जाती थी ; भोर हमेशा एक सौगात होती थी जो हम आम के बागों में खर्च कर देते थे। आज बिजली न होना भी दर्द हो गया है ; हालाँकि बाकी मिले दर्द से ये सब से कम था।

उमस के साथ पुरानी स्लिप डिस्क नींद से जग गयी और आज तीसरे दिन भी नहीं सोयी; ये जब भी जगती है, हफ्ते भर के पहले नहीं सोती।
तब बैठना भी किसी कठिन व्यायाम जैसा ही लगता है, एक मिनट से अधिक नहीं हो पाता। अधलेटा होकर लैपटॉप चलाने में महारत हासिल हो गयी है पिछले कुछ सालों में इसकी बदौलत। इसका दर्द एक सिहरन सी दौड़ा देता है ; जैसे कोई बिजली सी कौंधी हो अचानक पीठ से। कभी सोचा न था कि ये दर्द सच्चा साथी बन जाएगा।

एक दर्द आशंका से जन्मता है ; इस दर्द में मज़बूरी भी होती है और डर भी। ये कोरोना का भय नहीं था; किसी बेहद अपने के दिल के साथ दिल्लगी की चिकत्सीय प्रक्रिया थी। इस दर्द में आशा भी थी और आशंका भी।  ये रहेगी अभी कुछ दिन और आई सी यू के अंदर और बाहर; जीवन जीवित भी तब ही होता है जब वेंटिलेटर का साथ छोड़ देता है।

फिर एक दर्द और है जो है भी और नहीं भी।  जिस पर ऊँगली नहीं रख पाते; पर जिसे हम अनजाने में मोल ले लेते हैं किसी बिसाती से जो इसे बेचना नहीं चाहता। ये अजीब है, क्यूंकि इसे आप पर थोपा नहीं गया ; ये अजीब है क्यूंकि मिश्रित है।  ये हमें ऑक्सीजन नहीं देता पर जीने देता है।  ये तब होता है जब हम किसी को न समझ पाते हैं न ही समझा पाते हैं।  घर के अंदर भी और घर के बाहर भी; और खासकर के तब जब उम्मीद और हकीकत का समन्वय नहीं हो पाता।  जब हम जीवन से वो मांगने लगते हैं जो बिना आधे जीवन को नष्ट किये बगैर संभव नहीं होता।

पर ये सब दर्द मेरे अपने हैं ;

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