देखा होगा अक्सर,
राह चलती गाय को,
चबाते पॉलिथीन,
या फिर यूरिआ के अल्सर,
पेट में पाले हुए,
खेतों के चेहरे ग़मगीन;
देखा होगा अक्सर,
लोकल ट्रेनों में,
खचाखच भरे लोग,
या बच्चों से भरे घर,
न ही शिक्षा का योग,
न भोजन का संयोग,
फिर बड़ों का अनूठा पराक्रम,
और बुढ़ापे का वृद्धाआश्रम;
देखा होगा और भी बहुत कुछ,
रोज़ घटते बाग़ बाग़ान,
लुप्त होते,
जंगलों के परिधान,
सड़कों पर कूड़े का अम्बार,
बजबजाती नालियाँ,
मलेरिया डेंगू के सामान,
देखा ही होगा,
घटती और बेमौसम बारिशें,
फिर भी जगह जगह बाढ़,
हवा में घुलती कालिख,
फेफड़ों पर बढ़ता भार,
बचपन की आँखों पर चश्मे,
जवानी में मधुमेह की मार,
एंटीबायोटिक का कोर्स,
उच्च रक्तचाप का संसार,
और साथ ही देखा होगा,
ऊँची अट्टालिकायें,
गगनचुम्बी मूर्तियां,
क्रूज की नौकाएँ,
देखी ही होगी गति,
और छोटी होती दूरियां,
तेज़ भागता समय,
और उसको पकड़ने की मज़बूरियां,
देखा होगा मोबाइल,
और गायब होती लोरियाँ;
हमने अपने लिए,
कितना साज़ो सामान जुटाया है,
पर भूल जाते हैं हम,
कि कितना कुछ लुटाया है,
कल हम और जुटायेंगे,
और अधिक डेवलप्ड कहलायेंगे,
यूँ तो चढ़ते रहते हैं हम,
कभी न ख़त्म होने वाली,
सीढ़ियों पर,
पर छोड़ जाते हैं,
अपनी लापरवाहियों के निशां,
आने वाली पीढ़ियों पर।
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