एक दिवस,
जब गल जाए साबुन सारा,
और उड़ जाए सेनिटाइज़र की अलकोहल,
जब बंद हो जाएँ मास्क के छिद्र,
और दो गज दो कोस लम्बा हो जाये,
एक दिवस,
जब रेल की जगह ,
बैलगाड़ियाँ हों पटरी पर,
जब माँग सूनी हो सड़क की,
और हवाई यात्रा हो बस परिंदों की,
एक दिवस,
जब टूटी पड़ी हों,
ऑफिस की कुर्सियां,
और छत्तों की तरह लटके हों,
चमगादड़ ऊँची ऊँची बिल्डिंग में,
एक दिवस,
जब जंग लग गया हो,
नाल में बन्दूक की,
और तोप टैंकों पर खेलते हों,
बन्दर उछल उछल कर,
उस दिवस भी,
बहेगी कविता निश्छल,
और हम रहेंगे दूर उतना ही,
जितना रहते हैं इन दिनों,
उस दिवस भी रहेंगे हम अनुमान ही
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