बीते कुछ दिनों से एक अजीब सी आशंका ने कहीं कोने में अपनी एक चारपाई डाल दी है। अजीब इसलिए क्यूंकि ये भयभीत नहीं करती किन्तु किसी अनहोनी की एक दरी बिछा देती है उस चारपाई पर। ये ज़िंदगी ख़त्म करने का अंदेशा नहीं देती पर ज़िंदगी बढ़ने में कुछ रोड़े अटका देती है। रोज़ रात ये चारपाई मेरे करीब खिसकती रहती है, और मैं रोज़ ज़मीन पर अपना बिछौना थोड़ा और दूर कर लेता हूँ। भय से नहीं, आशंका से। यूँ भी हम स्वप्न में अनहोनी के लिए कहाँ तैयार रहते हैं, और हक़ीक़त में तो बिलकुल नहीं। पर बीते कुछ दिनों से मैं ज़मीन पर ही सोता हूँ।
सोमवार से ऑफिस खुल जाएगा शायद और उसके साथ ही समाप्त हो जायेगी दो महीने की मशक्कत जो घर बैठ कर की......... उस ऑफिस के लिए जो एक हफ्ते में हमें रिप्लेस कर देगा यदि कल हम न रहे। सब निरर्थक जान पड़ता है, कहाँ जा रहे हैं, क्यूँ जा रहे हैं , जा भी रहे हैं या वहीँ खड़े हैं....... कितने ही प्रश्न रोज़ दफ़्न हो जाते हैं और मिट्टी गीली रहती है अगले दिन भी। कोई तो है जो इसे सूखने नहीं देता.......पर कौन....... अपना बिछौना थोड़ा और खिसका लेता हूँ।
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