Friday, June 19, 2020

जब से डर था कि मौसम रहे न रहे,
तब से बूंदों में बदरी बहक आयी है।
रात भर आँधियों में छुपी सिसकियाँ,
दिन में पलकों पे सिहरन सिमट आयी है।
प्रीत के पाँव में जब से छाले पड़े,
तब से राहों की किस्मत उभर आयी है।

एक उम्मीद में है ये कैसा असर,
घर से लेने उसे पालकी आयी है।

धूप में तर बतर जो थे अरमां हुए,
चांदनी में फ़िज़ां देखो छत आयी है।
उसके रहने का ऐसा असर कुछ हुआ,
फिर से चेहरे पे रंगत निखर आयी है।

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