एक दिन जब अड़ जाए ऊष्मा,
और शीत ढूंढ़ती रहे ठिकाना,
एक दिन जब पिघल जाएँ मेघ,
पर तर न हो पाए वसुंधरा,
एक दिन जब न उठ पाएं हम,
और सुबह सुबकी हुई आये,
एक दिन जब तुम पीछे देखो,
और पाओ पैरों के निशां,
उस दिन, केवल उस दिन,
याद करना वो एक मील,
साथ चला था जिसे,
उन बोझिल दिनों में,
उस दिन, केवल उस दिन,
जगा देना हमें,
चंद लम्हों के लिए।
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