एक दिन खिलौना टूट गया,
और फिर जुड़ा नहीं,
बच्चा रोया घंटा भर,
फिर भूल गया,
रोने में नहीं था कोई सम्मान,
भला कहीं खिलौने में भी ,
होती है जान !
एक दिन किसी अपने की,
टूट गयी सांसें,
फिर न लौटीं,
हमने भी इंतज़ार नहीं किया,
पता था की टूटी सांसें,
फिर जुड़ती नहीं,
बस दिल में बसा ली यादें,
जीवन भर के लिए !
एक दिन टूट गया दिल,
और लगा की फिर जुड़ेगा नहीं,
पर ऐसा हुआ नहीं,
वक़्त से साथ पता लगा,
दिल की तो फितरत है,
जुड़ना टूटना और फिर जुड़ना !
हम भूल जाते हैं कि,
मायूसी की उमर,
अधिक से अधिक
एक रात होती है,
उसके बाद की ग्लानि,
हमारे अपने हौसले पर,
आघात होती है।
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