Tuesday, November 29, 2011

मूक सी चलती हैं सुइयां घड़ियों की,
मूक रहती है कहानी परियों की,
मूक है मुझको 'मेरा' कहने वाला,
मूक रहता है तेरे घर का ताला,
सब है रहते मूक इस जादूगरी में,
पर किसी का अक्स है जो बोलता है
रोज़मर्रा जिंदगी का ये पिटारा,
कैसे कैसे राज़ देखो खोलता है,

Sunday, November 20, 2011

जाड़े का कुहासा

वो बागों के सुनहरे वृक्ष नहीं जो दीखते हैं,
आँखों का नहीं है भ्रम, ये जाड़े का कुहासा है,
जो नयनों से छलकते थे कभी ख्वाबों में घुल कर के,
बड़े सूखे से बैठे हैं, कि जैसे जल ही प्यासा है,
कि यूँ खामोशियों के दलदलों में डूबते क्यों हो,
अभी तो रात बाकी है अभी से क्या निराशा है,
नहीं ग़मगीन रखना दिल, रहे वीरानियाँ जितनी,
जो रेतों में रहोगे तो ही जानोगे पिपासा है,
हवाओं के समंदर में नज़र जो ऋतु नहीं आती,
अभी जिंदा हैं साँसों में, अभी नयनों में आशा है....

Friday, November 18, 2011

ज़रा सा छेड़ दो तो ये कहाँ चुपचाप सहती हैं,
ज़रा बिखरी, ज़रा जिद्दी, ज़रा मशरूफ़ रहती हैं,
कसक हैं ये मियादों की, ये इक मुद्दत की यादें हैं,
मेरे दिल के घरोंदों में बड़ी महफूज़ रहती हैं,
वीरान रातों में दिये नहीं टिमटिमाते,
जुगनू अब जैसे दिन में निकलते हैं,
सोचा था कभी तो तन्हा होऊंगा पर,
ये सन्नाटे हमशक्ल से, साथ चलते हैं.....

मर्यादा

यही करना है,
इससे डरना है,,
इतना ही ठीक है,
ज्यादा से बचना है,
आगे बढोगे,
तो मुहं की खाओगे,
लक्ष्मण रेखा से आगे,
और कहाँ जाओगे...

कल लोग जान जायेंगे,
क्या मुहं दिखाओगे,
कहीं गुमनाम अंधेरों में,
अपने दिन बिताओगे,
गैरों के चक्कर में,
अपने भी छोड़ देंगे,
जिन आइनों की बात करते हो,
दिलों से तोड़ देंगे,
कुछ अच्छा सोचो और करो,
खुद से नहीं तो,
कम से कम समाज से डरो...

हमने कितने नियम बनाये हैं,
कुछ बस सुनते हैं,
कुछ अपनाए हैं,
ये गलत है, ये सही है,
पर ये बात किसने कही है,
ये धर्म है, ये अधर्म है,
इनमे उलझा,
हमारा कर्म है,
बहुत कुछ ऐसा है,
जो सोच सकते हो,
क्योंकि विचारों का आना,
कैसे रोक सकते हो,
उसके आगे और कुछ नहीं,
यहीं उनका अंत है,
लेकिन आम आदमी आदमी है,
कहाँ संत है ...

ये दिलों के ज्वार हैं,
बाहर से दिखता सादा है,
एक बार ज़िक्र कर दो तो,
पता लगता है,
सीमाओं से कितना ज्यादा है,
हर इन्सान ने जैसे,
इच्छाओं का,
ओढा एक लबादा है,
पूरे की ख्वाहिश में,
कोई जिंदा आधा है,
ये कैसी मर्यादा है...

Sunday, November 13, 2011

जड़ें

बरगद की झूलती लताएं धरती का स्पर्श चाहती हैं,
बोलती नहीं, पर आस लिए नीचे को बढ़ती हैं.
वहां जहाँ इनके अस्तित्व की जड़ें रहती हैं,
क्या हम अपनी जड़ें पहचानते हैं?
या बस सुनते हैं और मानते हैं.......

Friday, November 4, 2011

परिवर्तनशील जिंदगी

कमरे में  कुर्सियों की पहचान बदल जाती है,
दूधवाले भैया की मुस्कान बदल जाती है,
चिड़ियों के सुरों की तान बदल जाती है,
रोज़मर्रा के चीज़ों की दुकान बदल जाती है,

बदल जाती है सरसराहट नल के आने की,
बदल जाती आवाज़ दरवाज़ा खटखटाने की,
बदल जाती जगह अखबार को पाने की,
बदल जाती है खिड़की रोशनी अन्दर आने की,

घर खुला रखने की परेशानी बदल जाती है,
किसी के घर में होने की निशानी बदल जाती है,
महज़ एक मकान बदल लेने से,
हमारी कितनी जिंदगानी बदल जाती है,

दोस्तों, यूँ तो बदलाव की अपनी मीठी थकान है,
पर हमारा जीवन भी एक किराए का मकान है,
ठहराव है, बदलाव है, रोज़ नया आयाम है,
परिवर्तनशील जिंदगी, तुझे मेरा सलाम है.

Wednesday, November 2, 2011

अधूरा मन

कितना अजीब है,
हम मिलते हैं, यूँ ही ज़माने में,
कुछ हकीकत में, कुछ अनजाने में,
फिर जुदा हो जाते हैं,
कुछ खोने में, कुछ पाने में,
और तब,
बस ख्याल रहता है,
जो नहीं हो पाया,
उसका मलाल रहता है...

पर ये यहाँ ख़त्म नहीं होता,
इस तकनीकी दुनिया में,
सच मानो,
किसी मिलन का अंत नहीं होता,
वर्षों पश्चात,
दूसरे हालातों में,
कभी जवाबों में,
कभी सवालातों में,
कभी पहचानों में,
या  नेटवर्किंग के इंसानों में,
हम फिर मिलते हैं.....

तब दुनिया अलग होती है,
पुरानी पहचानों के बावजूद,
हमारी चेतना,
सजग होती है,
तब हम परिणाम सोचते हैं,
कितना खुलें,
इसका अंजाम सोचते हैं,
कहते हैं बहुत सा पानी बह गया,
कुछ तूफ़ान आये थे,
अरमां भी उनके संग गया,
कहते हैं तुम आगे निकल गए,
हमारे रास्ते में फिसलन थी,
बहुत कोशिशें की,
पर फिसल गए........

दोस्तों...
किसी न किसी रूप में,
ये हम सब के साथ होता है,
तब थोड़ा सा दिल जगता है,
और दिमाग सोता है,
वह कितना अच्छा समय था,
जब एक अलगाव,
हमेशा के लिए होता था,
कुछ समय तक मलाल रहता था,
पर वक़्त कहाँ सोता था,
धीरे धीरे सब ठीक हो जाता था,
जब दूसरा नज़र ही न आये,
तब सब अपना हो जाता था,
....लेकिन,
दोबारा मिलना भी,
कोई दोष नहीं है,
वक़्त की अनुकम्पा है,
अब कोई बेहोश नहीं है,
जा बाँट सकते हो बाँटो,
जो नहीं, उसे छांटो,
छोटी सी दुनिया हो गयी,
उससे भी छोटा जीवन,
क्या करोगे ले जाकर,
मरने पर, अधूरा मन......