Wednesday, November 2, 2011

अधूरा मन

कितना अजीब है,
हम मिलते हैं, यूँ ही ज़माने में,
कुछ हकीकत में, कुछ अनजाने में,
फिर जुदा हो जाते हैं,
कुछ खोने में, कुछ पाने में,
और तब,
बस ख्याल रहता है,
जो नहीं हो पाया,
उसका मलाल रहता है...

पर ये यहाँ ख़त्म नहीं होता,
इस तकनीकी दुनिया में,
सच मानो,
किसी मिलन का अंत नहीं होता,
वर्षों पश्चात,
दूसरे हालातों में,
कभी जवाबों में,
कभी सवालातों में,
कभी पहचानों में,
या  नेटवर्किंग के इंसानों में,
हम फिर मिलते हैं.....

तब दुनिया अलग होती है,
पुरानी पहचानों के बावजूद,
हमारी चेतना,
सजग होती है,
तब हम परिणाम सोचते हैं,
कितना खुलें,
इसका अंजाम सोचते हैं,
कहते हैं बहुत सा पानी बह गया,
कुछ तूफ़ान आये थे,
अरमां भी उनके संग गया,
कहते हैं तुम आगे निकल गए,
हमारे रास्ते में फिसलन थी,
बहुत कोशिशें की,
पर फिसल गए........

दोस्तों...
किसी न किसी रूप में,
ये हम सब के साथ होता है,
तब थोड़ा सा दिल जगता है,
और दिमाग सोता है,
वह कितना अच्छा समय था,
जब एक अलगाव,
हमेशा के लिए होता था,
कुछ समय तक मलाल रहता था,
पर वक़्त कहाँ सोता था,
धीरे धीरे सब ठीक हो जाता था,
जब दूसरा नज़र ही न आये,
तब सब अपना हो जाता था,
....लेकिन,
दोबारा मिलना भी,
कोई दोष नहीं है,
वक़्त की अनुकम्पा है,
अब कोई बेहोश नहीं है,
जा बाँट सकते हो बाँटो,
जो नहीं, उसे छांटो,
छोटी सी दुनिया हो गयी,
उससे भी छोटा जीवन,
क्या करोगे ले जाकर,
मरने पर, अधूरा मन......





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