Friday, November 18, 2011

मर्यादा

यही करना है,
इससे डरना है,,
इतना ही ठीक है,
ज्यादा से बचना है,
आगे बढोगे,
तो मुहं की खाओगे,
लक्ष्मण रेखा से आगे,
और कहाँ जाओगे...

कल लोग जान जायेंगे,
क्या मुहं दिखाओगे,
कहीं गुमनाम अंधेरों में,
अपने दिन बिताओगे,
गैरों के चक्कर में,
अपने भी छोड़ देंगे,
जिन आइनों की बात करते हो,
दिलों से तोड़ देंगे,
कुछ अच्छा सोचो और करो,
खुद से नहीं तो,
कम से कम समाज से डरो...

हमने कितने नियम बनाये हैं,
कुछ बस सुनते हैं,
कुछ अपनाए हैं,
ये गलत है, ये सही है,
पर ये बात किसने कही है,
ये धर्म है, ये अधर्म है,
इनमे उलझा,
हमारा कर्म है,
बहुत कुछ ऐसा है,
जो सोच सकते हो,
क्योंकि विचारों का आना,
कैसे रोक सकते हो,
उसके आगे और कुछ नहीं,
यहीं उनका अंत है,
लेकिन आम आदमी आदमी है,
कहाँ संत है ...

ये दिलों के ज्वार हैं,
बाहर से दिखता सादा है,
एक बार ज़िक्र कर दो तो,
पता लगता है,
सीमाओं से कितना ज्यादा है,
हर इन्सान ने जैसे,
इच्छाओं का,
ओढा एक लबादा है,
पूरे की ख्वाहिश में,
कोई जिंदा आधा है,
ये कैसी मर्यादा है...

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