रंग जीवन के अक्सर बदलते रहे,
हम रहे गिरते उठते पर चलते रहे;
जो लिए फैसले, मोड़ जब था मिला,
चाहे मन खिन्न था या हृदय था खिला,
आज बेशक लगे, कुछ में थीं गलतियां,
किंतु तब ठीक थे, वक्त का था सिला;
जब ज़रूरत अंधेरे से लड़ने की थी,
हम उजाले की खातिर थे जलते रहे;
जब गुज़ारा हुआ, पर गुज़ारा न था,
जिसको समझे सहारा, सहारा न था,
निकले तूफान से, तब था ऐसा लगा,
कि किनारा मिला, पर किनारा न था;
जब भंवर में फंसे, या दिशाभ्रम रहा,
हम फिसलते रहे, पर संभलते रहे ;
माना किस्मत पतंगों की कटने में है,
या चरागों से जल कर के मिटने में है,
सारे सावन ये पतझड़ से कहते रहे,
कि असल जिंदगी गिर के उठने में है,
बुझती जलती रही आग, इस दौर में,
हम भी रुक रुक के थोड़ा पिघलते रहे;
रंग जीवन के अक्सर बदलते रहे,
हम रहे गिरते उठते पर चलते रहे;